

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नए विश्लेषण ने अफ्रीका में बढ़ती तंबाकू खेती को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
2012 से 2024 के बीच जहां दुनिया में तंबाकू की पत्तियों का उत्पादन करीब 19 फीसदी घटा, वहीं अफ्रीका में यह 9 फीसदी बढ़ गया। 2024 में महाद्वीप ने 6.39 लाख टन से अधिक तंबाकू का उत्पादन किया, जो वैश्विक उत्पादन का करीब 11 फीसदी है।
हैरानी यह है कि कच्चा तंबाकू उगाने और निर्यात करने के बावजूद अफ्रीका का सिगरेट आयात बिल इसी अवधि में 83.3 करोड़ डॉलर से बढ़कर 177 करोड़ डॉलर हो गया।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, तंबाकू की खेती को सिर्फ आर्थिक गतिविधि के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके साथ किसानों की सेहत, कर्ज, बच्चों की पढ़ाई, मिट्टी की गुणवत्ता, पानी, वनों की कटाई और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन जैसे गंभीर सवाल जुड़े हैं।
गीली तंबाकू की पत्तियों के संपर्क में आने से किसानों में ‘ग्रीन टोबैको सिकनेस’ का खतरा भी रहता है। संगठन ने देशों से तंबाकू पर निर्भरता घटाने और किसानों को बेहतर, सुरक्षित और टिकाऊ वैकल्पिक फसलों व आजीविका की ओर ले जाने की अपील की है।
दुनिया के कई हिस्सों में तंबाकू की खेती घट रही है, लेकिन अफ्रीका में इसका उलटा रुझान देखने को मिल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नए विश्लेषण के मुताबिक, 2012 से 2024 के बीच दुनिया में तंबाकू की पत्तियों का उत्पादन करीब 19 फीसदी घट गया है।
वहीं दूसरी ओर इसी अवधि के दौरान अफ्रीका में इसके उत्पादन में करीब 9 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया है।
चिंता सिर्फ इतनी नहीं। अफ्रीकी देश जहां एक तरफ बड़ी मात्रा में अपने खेतों में कच्चा तंबाकू उगाकर उसका निर्यात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तैयार सिगरेट खरीदने पर पहले से कहीं ज्यादा पैसा खर्च कर रहे हैं। रुझानों से पता चला है कि इस अवधि में अफ्रीका का सिगरेट आयात बिल 83.3 करोड़ डॉलर से बढ़कर 177 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, यह केवल तंबाकू के नियंत्रण से जुड़ा मुद्दा नहीं है। इसके तार स्वास्थ्य, किसानों की आजीविका, व्यापार, पर्यावरण और सतत विकास से भी जुड़े हैं।
कौन चुका रहा है कीमत?
डब्ल्यूएचओ की तंबाकू मुक्त पहल के प्रमुख डॉक्टर विनायक प्रसाद का कहना है, तंबाकू की खेती किसानों और उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम पैदा करती है। खेती से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है और इसके चलते कई किसान कर्ज के ऐसे दुष्चक्र में फंस सकते हैं, जिससे निकलना आसान नहीं होता।
वहीं, अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाएं उन सिगरेटों के आयात पर ज्यादा पैसा खर्च कर रही हैं, जो लोगों में लत बढ़ाती हैं और बीमारी व समय से पहले मौत का कारण बनती हैं। यानी एक तरफ खेतों में मेहनत करने वाले किसान तंबाकू उगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ उसी तंबाकू से बनी सिगरेट लोगों की सेहत छीन रही है।
पांच देशों में पैदा हो रहा है अफ्रीका में तंबाकू का बड़ा हिस्सा
रिपोर्ट से पता चला है कि 2024 में अफ्रीका ने 6.39 लाख टन से ज्यादा तंबाकू की पत्तियों का उत्पादन किया। यह दुनिया के कुल उत्पादन का करीब 11 फीसदी है। अफ्रीका में तंबाकू का उत्पादन कुछ देशों में ही ज्यादा केंद्रित है। जिम्बाब्वे, मलावी, तंजानिया, मोजाम्बिक और युगांडा महाद्वीप के सबसे बड़े तंबाकू उत्पादक हैं।
अकेले पूर्वी अफ्रीका में ही अफ्रीका में पैदा होने वाली तंबाकू की करीब 90 फीसदी पत्तियों का उत्पादन हो रहा है।
खेतों में भी खतरा, दांव पर किसानों की सेहत
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक तंबाकू की खेती सिर्फ जमीन और पानी पर दबाव नहीं डालती, बल्कि किसानों के स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम पैदा करती है। तंबाकू की गीली पत्तियों को हाथ से संभालने के दौरान निकोटीन त्वचा के जरिए शरीर में पहुंच सकता है।
इससे ‘ग्रीन टोबैको सिकनेस’ यानी हरे तंबाकू से होने वाली बीमारी का खतरा रहता है। इसके अलावा किसानों को कीटनाशकों और तंबाकू की धूल के संपर्क में भी रहना पड़ता है।
इसका असर बच्चों पर भी पड़ता है। कुछ कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में गरीब परिवारों के बच्चे घर की आमदनी बढ़ाने के लिए तंबाकू के खेतों में काम करते हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ता है और कई बच्चे स्कूल से दूर हो जाते हैं।
तंबाकू की खेती सिर्फ खेतों में एक फसल उगाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह जमीन, पानी, पर्यावरण और किसानों की आजीविका की बड़ी कीमत से जुड़ा सवाल है। जिस उपजाऊ जमीन और पानी का इस्तेमाल तंबाकू उगाने में हो रहा है, उसी संसाधन से खाद्य फसलें उगाई जा सकती थीं और पर्यावरण के अनुकूल आजीविका के रास्ते खोले जा सकते थे।
तंबाकू की खेती मिट्टी की सेहत को नुकसान पहुंचाती है और इसके साथ कीटनाशकों का बढ़ता इस्तेमाल, वनों की कटाई और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी जुड़ा है। तंबाकू की पत्तियों को सुखाने के लिए भी बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत पड़ती है, जिससे इसका पर्यावरण पर बोझ और बढ़ जाता है।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं कि दुनिया में कितना तंबाकू उगाया जा रहा है। असल सवाल यह है कि इसके बदले किसान क्या खो रहे हैं, परिवारों पर कितना बोझ पड़ रहा है, जमीन और पानी कितने दबाव में हैं और आने वाली पीढ़ियों को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
तंबाकू से होने वाली कमाई का दावा भी कमजोर
डब्ल्यूएचओ का विश्लेषण उस दावे पर भी सवाल उठाता है कि तंबाकू अधिकांश देशों के लिए बेहद जरूरी आर्थिक फसल है। रिपोर्ट के मुताबिक, केवल कुछ देशों, जैसे मलावी और जिम्बाब्वे में तंबाकू की पत्तियों का निर्यात सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक फीसदी से ज्यादा है।
वहीं ज्यादातर देशों के लिए तंबाकू उत्पादन और व्यापार का आर्थिक योगदान सीमित है, जबकि इससे होने वाली स्वास्थ्य, सामाजिक और पर्यावरणीय लागत काफी बड़ी है।
डॉक्टर प्रसाद के मुताबिक देशों को ऐसी आर्थिक व्यवस्था से बाहर निकलने के लिए मदद की जरूरत है, जो एक ऐसे उत्पाद पर निर्भर है जो लोगों की सेहत, किसानों और पर्यावरण, तीनों को नुकसान पहुंचाता है।
तंबाकू छोड़कर दूसरी फसलों की ओर बढ़ने की जरूरत
डब्ल्यूएचओ ने देशों से तंबाकू पर आर्थिक निर्भरता कम करने और किसानों के लिए बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने की अपील की है। संगठन का कहना है कि किसानों और खेतिहर मजदूरों को ऐसी वैकल्पिक आजीविका और फसलें उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिनसे उनकी आमदनी सुरक्षित रहे और पर्यावरण पर भी कम दबाव पड़े।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के तंबाकू नियंत्रण संबंधी समझौते के अनुच्छेद 17 और 18 के तहत भी देशों से तंबाकू किसानों और श्रमिकों के लिए आर्थिक रूप से बेहतर वैकल्पिक आजीविका को बढ़ावा देने तथा तंबाकू की खेती से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की रक्षा करने का आह्वान किया गया है।
देखा जाए तो अफ्रीका में तंबाकू की बढ़ती खेती को सिर्फ उत्पादन और कारोबार के आंकड़ों से नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे किसानों की सेहत, परिवारों की मजबूरी, बच्चों का छूटता बचपन, घटती मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण पर बढ़ता संकट भी छिपा है।
इसलिए चुनौती सिर्फ तंबाकू की खेती घटाने की नहीं, बल्कि किसानों को ऐसी फसलों और आजीविका की ओर ले जाने की है, जो उनकी आय भी सुरक्षित रखें और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी। आखिर ऐसी अर्थव्यवस्था कितनी टिकाऊ हो सकती है, जिसकी कमाई से ज्यादा उसकी कीमत इंसानों और प्रकृति को चुकानी पड़े?