

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की नई रिपोर्ट एक बार फिर यह चेतावनी देती है कि जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हर घर की रसोई का भी संकट बनता जा रहा है।
जुलाई 2026 में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 131.1 अंक पर पहुंच गया, जिसकी मुख्य वजह भीषण गर्मी, अल नीनो, ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल और युद्ध से प्रभावित आपूर्ति श्रृंखला रही।
गेहूं, मक्का, खाद्य तेल और चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि मांस और डेयरी उत्पादों में कुछ राहत मिली। गेहूं की कीमतें ब्लैक सी क्षेत्र में निर्यात बाधाओं और प्रमुख उत्पादक देशों में गर्मी से प्रभावित फसलों के कारण बढ़ीं।
खाद्य तेल चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए, वहीं अल नीनो और सूखे की आशंकाओं ने चीनी को भी महंगा कर दिया।
रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि चरम मौसम और भू-राजनीतिक तनाव का सबसे पहला असर आम आदमी की थाली पर पड़ता है। यदि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आपूर्ति संकट पर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई और अधिक गंभीर रूप ले सकती है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की नई रिपोर्ट के मुताबिक जुलाई महीने में वैश्विक स्तर पर खाने-पीने की चीजों के दाम फिर बढ़ गए हैं।
आसमान से बरसती आग, अल नीनो की दस्तक, ऊर्जा की बढ़ती कीमतें और जंग के बीच फंसी सप्लाई चेन ने मिलकर थाली को थोड़ा और महंगा कर दिया है। स्थिति यह है कि मांस और डेयरी उत्पादों के सस्ते होने के बावजूद गेहूं, तेल और चीनी की कीमतों में आए उछाल ने आम आदमी के बजट को बिगाड़ दिया है।
सयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रुझानों से पता चला है कि जुलाई 2026 में खाद्य मूल्य सूचकांक यानी फूड प्राइस इंडेक्स बढ़कर 131.1 अंक पर पहुंच गया, जो जून की तुलना में 0.6 फीसदी और पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में एक प्रतिशत अधिक है।
हालांकि राहत की बात सिर्फ इतनी है कि यह मार्च 2022 में बने अपने रिकॉर्ड स्तर से अभी भी 18.2 फीसदी नीचे है।
गर्मी, अल नींनो और युद्ध की चिंता से महंगे हुए गेहूं, चीनी, मक्का
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अनाज मूल्य सूचकांक में जुलाई के दौरान 3.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही यह पिछले साल के मुकाबले 6.9 फीसदी बढ़ गया है।
गौरतलब है कि अनाज मूल्य सूचकांक 110 से बढ़कर जुलाई 2026 में 113.8 अंकों पर पहुंच गया। इस दौरान सबसे अधिक बढ़ोतरी गेहूं की कीमतों में देखी गई, जो जून 2026 के मुकाबले 5.8 फीसदी बढ़ गई।
इसकी प्रमुख वजह ब्लैक सी (काला सागर) क्षेत्र से निर्यात में आ रही बाधाओं, वहां के बुनियादी ढांचे पर असर और प्रमुख उत्पादक देशों में पड़ रही भीषण गर्मी के कारण फसल उत्पादन के घटने की आशंका रही।
इसी तरह मक्के के दाम में 3.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अमेरिका की कॉर्न बेल्ट में गर्म और शुष्क मौसम तथा ऊर्जा बाजार में तेजी ने इसकी कीमतों को सहारा दिया। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में धान की कीमतें लगभग स्थिर रहीं। इससे एशियाई देशों को बड़ी राहत मिली है।
चार साल के रिकॉर्ड स्तर पर खाद्य तेल
एफएओ के अनुसार, वनस्पति तेल मूल्य सूचकांक जुलाई में 2 फीसदी बढ़कर 195.7 अंकों को पार कर गया। बता दें कि यह सूचकांक जून में 192 अंकों के करीब था। चिंता की बात है कि यह जून 2022 के बाद के अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
पाम ऑयल की कीमतों में लगातार दूसरे महीने बढ़ोतरी हुई है। इंडोनेशिया में बायोडीजल की मजबूत मांग और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने इसे समर्थन दिया।
वहीं सोयाबीन तेल की कीमतें भी अमेरिका में मजबूत मांग और वैश्विक आयात बढ़ने से चढ़ीं। हालांकि सूरजमुखी और रेपसीड तेल के दाम नई फसल और बेहतर उत्पादन की उम्मीद के कारण कुछ नरम पड़े हैं।
मांस और डेयरी उत्पादों से मिली थोड़ी राहत
जून में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने के बाद मांस मूल्य सूचकांक जुलाई में 2.8 फीसदी घट गया। यह इस साल दर्ज पहली मासिक गिरावट है। बता दें कि मांस मूल्य सूचकांक जो जून में 131.3 अंक दर्ज किया गया था, वो जुलाई में घटकर 127.7 अंकों पर पहुंच गया है।
ब्राजील से निर्यात बढ़ने के कारण पोल्ट्री (चिकन) के दाम गिरे, जबकि यूरोपीय यूनियन में पर्याप्त आपूर्ति और कमजोर मांग के चलते सूअर के मांस की कीमतों में भी कमी आई है।
इसी तरह डेयरी मूल्य सूचकांक में भी जुलाई में 0.7 फीसदी की गिरावट आई है। खाद्य एवं कृषि संगठन के मुताबिक डेयरी मूल्य सूचकांक 117 से घटकर जुलाई में 116.2 पर पहुंच गया। इस दौरान मक्खन और दूध पाउडर के दाम कम हुए, जबकि एक वर्ष बाद पहली बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीज की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई।
अल नीनो और सूखे की आशंका से उछले चीनी के दाम
रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि वैश्विक बाजार में चीनी के दामों में 5.6 फीसदी की बढ़ोतरी आई है। चीनी मूल्य सूचकांक जो जून 2026 में 90 दर्ज किया गया था, वो जुलाई 2026 में बढ़कर 95 पर पहुंच गया है।
हालांकि इससे पहले मई की तुलना में जून में चीनी की कीमतों में अच्छी खासी गिरावट आई थी।
इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह यूरोप में लगातार गर्म और शुष्क मौसम तथा भारत सहित एशिया के प्रमुख उत्पादक देशों में अल नीनो के कारण उत्पादन प्रभावित होने की आशंका रही।
इसके अलावा ब्राजील में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने के फैसले से भी चीनी की कीमतों को समर्थन मिला, क्योंकि इससे गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी के बजाय एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो सकता है।
ब्राजील के प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में बेहतर कटाई की स्थिति ने कीमतों को और अधिक बढ़ने पर कुछ रोक लगाई है।
जब खेत में मौसम बिगड़ता है और सीमाओं पर तनाव बढ़ता है, तो उसका पहला असर इंसान की थाली और उसकी रसोई के बजट पर पड़ता है। ऐसा ही कुछ इस बार भी हो रहा है। रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि मौसम की मार और वैश्विक संकट की हर नई लहर का सबसे पहला बोझ आम आदमी की थाली पर पड़ता है।
ऐसे में यदि जलवायु संकट और आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई और भी गंभीर रूप ले सकती है।