

क्या सिर्फ मिट्टी का रंग देखकर उसकी सेहत जानी जा सकती है? मोरक्को में हुए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इस पारंपरिक मान्यता को मजबूत आधार दिया है।
जर्नल कार्बन रिसर्च में प्रकाशित शोध के मुताबिक, मिट्टी के रंग का डिजिटल विश्लेषण कर उसमें मौजूद जैविक पदार्थों का अनुमान लगाया जा सकता है।
यह तरीका पारंपरिक रासायनिक जांच की तुलना में 96 प्रतिशत तक सस्ता है और इसमें जहरीले रसायनों की जरूरत भी नहीं पड़ती।
हालांकि यह तकनीक अभी पूरी तरह रासायनिक जांच का विकल्प नहीं बनी है, लेकिन शुरुआती स्क्रीनिंग टूल के रूप में यह किसानों के लिए सस्ती, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल समाधान बन सकती है। जलवायु परिवर्तन के दौर में, मिट्टी में कार्बन का सटीक आकलन खेती और पर्यावरण दोनों के लिए नई उम्मीद जगाता है।
किसानों ने सदियों से मिट्टी को देखकर उसकी हालत समझी है। गहरी, काली मिट्टी को उपजाऊ माना जाता है, जबकि फीकी और धूल भरी जमीन चिंता का संकेत देती है। लेकिन क्या सचमुच मिट्टी का रंग उसकी सेहत का वैज्ञानिक पैमाना बन सकता है?
मोरक्को में किए एक नई शोध ने इस पारंपरिक समझ को मजबूत वैज्ञानिक आधार दिया है। जर्नल कार्बन रिसर्च में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, मिट्टी के रंग का डिजिटल विश्लेषण करके उसमे मौजूद जैविक पदार्थों की मात्रा का अनुमान लगाया जा सकता है। अच्छी खबर यह है कि यह तरीका पारंपरिक रासायनिक जांच की तुलना में 96 फीसदी तक सस्ता है।
यह शोध यासीन बौसलीहिम के नेतृत्व में मोरक्को के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इस अध्ययन का मकसद यह समझना था कि क्या डिजिटल “कलोरीमेट्रिक” तकनीक खासकर कम बारिश वाले कृषि क्षेत्रों में पारंपरिक रासायनिक जांच की जगह ले सकती है।
क्यों अहम है मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थ?
मिट्टी के जैविक पदार्थ दरअसल पौधों और सूक्ष्म जीवों के सड़े-गले अवशेषों से बने कार्बन-समृद्ध तत्व होते हैं। यही तत्व मिट्टी को पानी रोकने की क्षमता देते हैं। पोषक तत्वों को संजोकर रखते हैं। जड़ों के विकास के लिए हवा और जगह उपलब्ध कराते हैं साथ ही मिट्टी को भुरभुरी और उपजाऊ भी बनाते हैं।
लेकिन बहुत अधिक जुताई, गर्मी और लगातार फसल उगाने से यह जैविक पदार्थ धीरे-धीरे घटते जाते हैं। ऐसे में जब तक किसान इस गिरावट को समझते हैं, तब तक उत्पादन पर असर दिखने लगता है। ऐसे में सस्ती और बार-बार की जा सकने वाली जांच किसानों के लिए बेहद जरूरी है।
रंगों से कैसे बनता है आंकड़ा?
परंपरागत ‘वॉकली-ब्लैक’ जैसी जांच तकनीकों में जहरीले रसायनों का इस्तेमाल होता है, जिससे खतरनाक कचरा बनता है। इसके विपरीत, रंग आधारित तकनीक में सिर्फ एक डिजिटल सेंसर और कंप्यूटर की जरूरत होती है, मतलब कि न जहरीले रसायन, न प्रदूषण।
वहीं दूसरी तरफ इस तकनीक में वैज्ञानिकों ने मिट्टी के नमूनों को एक डिजिटल उपकरण “कलोरीमीटर” से स्कैन किया। यह उपकरण मिट्टी पर रोशनी डालता है और लौटने वाली रोशनी के रंग को संख्याओं में बदल देता है।
अध्ययन के मुताबिक सूखी मिट्टी में रंग और जैविक पदार्थों के बीच मजबूत संबंध देखा गया, जबकि “ह्यू” यानी प्रमुख रंग (जैसे लाल, पीला या नारंगी) जैविक पदार्थों का सबसे भरोसेमंद संकेतक साबित हुए। हालांकि गीली मिट्टी में सटीकता थोड़ी कम हो गई, क्योंकि नमी मिट्टी को स्वाभाविक रूप से गहरा बना देती है।
वैज्ञानिकों ने “रैंडम फॉरेस्ट” नामक मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल किया, जिससे सूखी मिट्टी में करीब 60 फीसदी तक सटीक अनुमान संभव हुआ।
रसायनों से मुक्ति, खर्च में भारी कमी
वैज्ञानिकों ने बताया है कि मिट्टी की परंपरागत जांच, जैसे वॉकली-ब्लैक तकनीक, में खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल होता है। इससे जहरीला कचरा पैदा होता है और लैब में काम करने वालों के लिए जोखिम बढ़ जाता है।
इसके विपरीत, रंगों के डिजिटल विश्लेषण में किसी भी जहरीले रसायन की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें केवल एक स्कैनर और कंप्यूटर का उपयोग किया जाता है, जिससे लैब में बनने वाले कचरे में बड़ी कमी आती है और प्रक्रिया अधिक सुरक्षित बनती है।
इस अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसका आर्थिक विश्लेषण है। यदि कोई लैब साल में मिट्टी के 5,000 नमूनों की जांच करती है, तो रंग आधारित यह तकनीक उसे बड़ा वित्तीय फायदा दे सकती है।
इससे कुल लागत में करीब 96 फीसदी तक की कमी आ सकती है, क्योंकि मजदूरी, रसायनों और उपकरणों पर होने वाला खर्च काफी घट जाता है। तकनीक पर किया गया शुरुआती निवेश चार महीने से भी कम समय में वसूल हो सकता है। इतना ही नहीं, पांच साल में निवेश पर मिलने वाला लाभ लगभग 940 फीसदी तक पहुंच सकता है।
क्या रासायनिक जांच की जगह ले सकती है यह तकनीक?
अब सवाल यह है कि क्या यह तकनीक पूरी तरह रासायनिक जांच की जगह ले सकती है? इसका उत्तर है फिलहाल नहीं।
अध्ययन में महज 74 नमूने शामिल थे, इसलिए इसे पूरी तरह अंतिम समाधान नहीं माना जा सकता। अलग-अलग इलाकों में मिट्टी का रंग खनिजों, लवण या उर्वरकों से भी बदल सकता है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि हर क्षेत्र को अपना स्थानीय डेटा मॉडल बनाना होगा। समय-समय पर रासायनिक जांच से मिलान जरूरी रहेगा। इसके लिए बड़े पैमाने पर और अध्ययन की जरूरत है
हालांकि फिलहाल यह तरीका “स्क्रीनिंग टूल” की तरह काम कर सकता है, यानी पहले रंग की जांच, और जरूरत होने पर ही पूरी रासायनिक टेस्टिंग।
जलवायु बदलाव के दौर में बड़ी उम्मीद
मिट्टी में कार्बन का सही आकलन जलवायु परिवर्तन से लड़ने में भी अहम है। अगर किसान सस्ती और आसान जांच से अपनी जमीन की हालत समझ सकें, तो वे फसल अवशेषों को बेहतर तरीके से प्रबंधित कर सकते हैं। कवर क्रॉप अपना सकते हैं, साथ ही सिंचाई और जुताई में बदलाव ला सकते हैं और कार्बन भंडारण में योगदान दे सकते हैं।
रबात से आया यह संदेश साफ है, मृदा विज्ञान का भविष्य डिजिटल, सुरक्षित और किफायती हो सकता है। जो मिट्टी का रंग कभी केवल किसानों के अनुभव का हिस्सा था, वह अब वैज्ञानिक आंकड़ों में बदल रहा है।
यदि आगे के शोध इस पद्धति को और पुख्ता साबित करते हैं, तो यह किसानों के लिए अपनी जमीन की सेहत को समझने, समय रहते जरूरी बदलाव करने और भविष्य की पैदावार सुरक्षित रखने का सस्ता, तेज और भरोसेमंद जरिया बन सकता है।