

बढ़ती गर्मी अब सिर्फ खेतों में फसल को नहीं, बल्कि आम आदमी की रसोई और थाली को भी प्रभावित कर सकती है।
नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने चेताया है कि यदि वैश्विक तापमान तीन डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो गंभीर और व्यापक सूखे के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की औसत कीमतें 2010 के स्तर की तुलना में तीन गुना तक पहुंच सकती हैं।
स्टडी के अनुसार, 2000 से 2021 के बीच गेहूं की कीमतों में सालाना करीब 74 फीसदी उतार-चढ़ाव गंभीर जल संकट से जुड़ा रहा है।
वैज्ञानिकों की चिंता उन स्थितियों को लेकर है, जब दुनिया के कई प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्र एक साथ सूखे की चपेट में आएं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। अन्य अध्ययनों के अनुसार, दो डिग्री तापमान वृद्धि पर देश में गेहूं उत्पादन 6.9 फीसदी तक घट सकता है और कीमतें 36 फीसदी से अधिक बढ़ सकती हैं।
यह चेतावनी साफ है—जलवायु संकट की कीमत केवल किसानों को नहीं, बल्कि रोटी खरीदने वाले हर परिवार को चुकानी पड़ सकती है।
थाली की रोटी से नाश्ते के पास्ता तक, हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में गेहूं की मौजूदगी इतनी आम है कि हम शायद ही कभी सोचते हैं कि हजारों किलोमीटर दूर सूखते खेतों की तपिश एक दिन हमारी रसोई तक भी पहुंच सकती है।
लेकिन अब एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने चेताया है कि बढ़ता जलवायु संकट भविष्य में गेहूं को आम आदमी की पहुंच से दूर कर सकता है। यदि दुनिया के प्रमुख गेहूं उत्पादक इलाकों में सूखा पड़ा, तो उसकी कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, और इसका सीधा असर उस रोटी पर पड़ेगा, जो आज करोड़ों लोगों की थाली का सबसे बुनियादी सहारा है।
प्रतिष्ठित जर्नल ‘अर्थ्स फ्यूचर’ में प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक, यदि दुनिया के कई प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में एक साथ या कम समय के अंतराल में भीषण सूखा पड़ता है, तो वैश्विक बाजार में गेहूं की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
तीन डिग्री गर्मी, तीन गुनी कीमत
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वैश्विक तापमान में तीन डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की औसत कीमतें 2010 के स्तर की तुलना में तीन गुणा तक उछल सकती हैं।
डेनमार्क के आरहूस विश्वविद्यालय के कृषि पारिस्थितिकी विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष जॉर्गन ई ओलेसन समेत अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने जलवायु, फसल उत्पादन क्षेत्रों और वैश्विक बाजार में कीमतों के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण किया है। इस अध्ययन के निष्कर्ष बेहद चौंकाने वाले हैं। आंकड़ों से साबित हुआ है कि 2000 से 2021 के बीच दुनिया में गेहूं की कीमतों में हर साल होने वाले करीब 74 फीसदी उतार-चढ़ाव को केवल गंभीर जल संकट से जोड़ा जा सकता है।
प्रोफेसर ओलेसन के मुताबिक, हम लंबे समय से जानते हैं कि बदलते मौसम का असर फसलों की पैदावार पर पड़ता है, लेकिन इस नए अध्ययन ने दुनिया भर में फैलते सूखे और आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ने वाले सीधे आर्थिक बोझ के बीच एक स्पष्ट और डरावना संबंध स्थापित कर दिया है।
क्यों दूसरे अनाजों से ज्यादा सूखे के प्रति संवेदनशील है गेहूं?
शोधकर्ताओं ने इसे समझने के लिए 'सीवियर वॉटर स्कारसिटी' यानी गंभीर जल संकट नाम का एक नया संकेतक विकसित किया। यह पैमाना नापता है कि फसल के विकास के सबसे संवेदनशील महीनों में दुनिया के कितने फीसदी कृषि क्षेत्र सूखे से झुलस रहे हैं।
अध्ययन की खास बात यह है कि इसमें किसी एक क्षेत्र के सूखे को अलग-थलग देखकर नहीं, बल्कि उस स्थिति को समझने की कोशिश की गई है जब उत्तरी अमेरिका, यूरोप या एशिया के कई बड़े कृषि क्षेत्र एक साथ सूखे की चपेट में आ जाएं, तो उसका क्या परिणाम होगा। गर्म होती दुनिया में ऐसे व्यापक और एक-दूसरे से जुड़े सूखे अधिक आम होने की आशंका है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, गेहूं पर इसका असर अन्य प्रमुख फसलों की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट है। जल संकट और कीमतों के बीच संबंध मक्का के मुकाबले गेहूं में कहीं मजबूत पाया गया, जबकि चावल के मामले में ऐसा स्पष्ट संबंध नहीं मिला।
तापमान बढ़ेगा, तो महंगी होगी रोटी?
ऐतिहासिक आंकड़ों से पता चला है कि किसी सामान्य वर्ष में दुनिया के करीब पांच फीसदी गेहूं उत्पादक क्षेत्र गंभीर जल संकट का सामना करते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के साथ यह खतरा बढ़ रहा है। 2000, 2010, 2012 और 2020 जैसे बेहद सूखे वर्षों में तो प्रभावित क्षेत्रों का यह आंकड़ा बढ़कर 15 फीसदी से अधिक हो गया था।
जलवायु मॉडल के आधार पर भविष्य का अनुमान लगाते हुए शोधकर्ताओं ने पाया है कि तापमान बढ़ने के साथ दुनिया के कहीं अधिक गेहूं उत्पादक क्षेत्र गंभीर जल संकट की चपेट में आ सकते हैं।
भविष्य के जलवायु मॉडलों के आधार पर वैज्ञानिकों ने अनुमान जताया है कि तापमान में करीब दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि के साथ गेहूं की औसत कीमत करीब 273 डॉलर प्रति टन पहुंच सकती है। वहीं, तापमान में तीन डिग्री वृद्धि पर इसके करीब 364 डॉलर प्रति टन तक पहुंचने का अंदेशा है, जो 2010 में दर्ज, महंगाई के हिसाब से समायोजित वैश्विक कीमत की तुलना में करीब तीन गुणा होगी।
प्रोफेसर ओलेसन कहते हैं, “गेहूं दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। इसलिए जलवायु से जुड़ी उत्पादन समस्याएं बहुत जल्दी वैश्विक संकट का रूप ले सकती हैं।“
भारत में भी गेहूं की पैदावार और कीमतों पर दिखेगा असर
इसी तरह जर्नल वन अर्थ में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च से भी पता चला है कि यदि हम वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने में कामयाब भी हो जाएं तो भी जलवायु में आते बदलावों की वजह से गेहूं की पैदावार और कीमतों में भारी बदलाव और उतार-चढ़ाव आ सकते हैं।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बढ़ते तापमान के चलते भारत के गेहूं उत्पादन में 6.9 फीसदी तक की गिरावट आ सकती हैं, वहीं इसकी वजह से कीमतों में 36 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि होने का अंदेशा है।
जर्नल साइंस एडवांसेज में छपे शोध से भी पता चला है कि आज दुनिया के 15 फीसदी गेहूं उत्पादक क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं।
ऐसे में यदि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए अभी कदम न उठाए गए तो सदी के अंत 60 फीसदी से अधिक गेहूं उत्पादक क्षेत्र सूखे की चपेट में होंगे। जो उनकी पैदावार को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा किए अध्ययन में भी खुलासा हुआ है कि मौजूदा जलवायु बदलावों के कारण जहां गेहूं की पैदावार में दस फीसदी की गिरावट आई है। वहीं मक्के में चार फीसदी जबकि जौ की पैदाकर 13 फीसदी तक घट गई है। मतलब की यदि जलवायु परिवर्तन का असर न पड़ा होता तो इन फसलों की पैदावार 13 फीसदी तक अधिक होती।
सिर्फ किसानों का नहीं, हर घर की रसोई का सवाल
शोधकर्ता यह भी स्पष्ट करते हैं कि गेहूं की कीमत केवल सूखे से तय नहीं होती। ऊर्जा और उर्वरक की लागत, अनाज भंडार, व्यापार नीतियां और भू-राजनीतिक संघर्ष भी बाजार को प्रभावित करते हैं। फिर भी, यह अध्ययन उस जलवायु जोखिम को उजागर करता है जिसे अब तक स्पष्ट रूप से मापना मुश्किल था।
इस चेतावनी का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि किसानों को कम पैदावार मिल सकती है। असली चिंता यह है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ पड़ने वाला सूखा अंतरराष्ट्रीय बाजारों को झकझोर सकता है और उसका असर उन देशों और परिवारों तक पहुंच सकता है, जिनका उन सूखे खेतों से कोई सीधा संबंध नहीं है।
ऐसे में खाद्य सुरक्षा को अब केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रखा जा सकता कि भविष्य में फसल उत्पादन कितना घटेगा। यह समझना भी उतना ही जरूरी है कि जब एक साथ कई बड़े कृषि क्षेत्र बार-बार सूखे की चपेट में आएंगे, तो उसका असर खाद्य कीमतों, वैश्विक बाजारों और आखिरकार करोड़ों लोगों की थाली पर कितना गहरा पड़ेगा।
हमें समझना होगा कि बढ़ती गर्मी, बदलती जलवायु का संकट खेतों में शुरू जरूर होता है, लेकिन आखिरकार उसकी कीमत आम आदमी को अपनी रसोई में चुकानी पड़ती है।