

पंजाब के संगरूर जिले के बिशनपुरा खोखर गांव के किसान मलकीत सिंह अपने खेतों में पकने के लिए तैयार खड़ी गेहूं की फसल को निहार रहे हैं। वह आसमान की ओर देखकर कहते हैं, “अबकी बार सर्दी कब आई, कब गई पता ही नहीं लगा। जनवरी में तो ठंड पड़ी, लेकिन फरवरी के दूसरे सप्ताह से ही दिन गर्म होने शुरू हो गए थे। फरवरी और मार्च में अगर ज्यादा गर्मी पड़ती है तो हमारी गेहूं की फसल का झाड़ (दाना) घट जाता है। यह समय गेहूं की बालियों में दाना भरने का होता है, लेकिन तपते सूरज के कारण बालियां समय से पहले पक रही हैं, जिसके कारण दाने छोटे रह जाएंगे।”
मलकीत सिंह की तरह ही उनके पड़ौसी किसान गुरप्यार सिंह भी परेशान हैं। वे कहते हैं, “पिछले साल हमारे गांव में गेहूं का झाड़ 25-26 क्विंटल प्रति एकड़ रहा था, लेकिन इस बार कम से कम दस प्रतिशत झाड़ का फर्क पड़ेगा।”
मलकीत सिंह और गुरप्यार सिंह जैसे हजारों किसान पंजाब और हरियाणा में इस असामान्य गर्म सर्दी से जूझ रहे हैं। हरियाणा के सिरसा जिले के भरोखां गांव के किसान रमन ढाका ने बताया, “इस साल गर्मी ने गांव के अधिकतर किसानों को डरा रखा है। आमतौर पर हरियाणा-पंजाब में गेहूं की फसल में 3 पानी लगते हैं, लेकिन इस बार गर्मी के डर के कारण लोगों ने कम से कम 4 बार पानी लगाया है ताकि फसल में नमी बनी रहे और फसल जल्दी न पके। लेकिन इस बार खरपतवार का असर भी ज्यादा है, स्प्रे के बावजूद गुली-डंडा और अन्य घासे ऐसी की ऐसी खड़ी हैं। इस दोहरी मार से बचाने के लिए किसानों को कम से कम 400 रूपए बोनस प्रति क्विंटल दिया जाना चाहिए।”
जिस तरह हरियाणा के किसान रमन ने अबकी बार अपनी फसल में चार बार सिंचाई की है, उसी तरह पंजाब के किसान मलकीत सिंह ने भी अपने खेतों में चार बार पानी लगाया है।
मलकीत सिंह ने साल 2022 के सीजन को याद करते हुए बताया, “इस साल जो फरवरी-मार्च में जो गर्मी पड़ी है उसी तरीके का साल 2022 भी था। उस साल भी गर्मी पहले ही आ गई थी, जिसके कारण कनक के हमारे झाड़ पर 5-7 मण प्रति एकड़ का फर्क पड़ा था. वही डर इस बार भी सता रहा है।” एक मण 40 किलोग्राम के बराबर होता है।
साल 2022 के फरवरी और मार्च महीने में पड़ी गर्मी के कारण पंजाब और हरियाणा में उस साल 13 से 16 प्रतिशत तक कम पैदावार हुई थी. कई जिलों में तो असर और अधिक था। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर) के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर कहते हैं, "समय पर बोई गई गेहूँ में 7-8 प्रतिशत, और देर से हुई बुआई वाली फसल में 10 प्रतिशत तक का नुकसान हो सकता है अगर तापमान ऐसे ही बढ़ता रहा तो फसल सामान्य से 10-15 दिन पहले पक जाएगी।"
जनवरी-फरवरी-मार्च 2026 की इस सर्दी को देखें, तो मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह सामान्य से कहीं ज्यादा गर्म रही। पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में कृषि मौसम विज्ञान की प्रोफेसर पवनीत कौर किंगरा ने बताया, “इस साल में मौसम परिवर्तनशीलता ज्यादा रही। ग्लोबल वार्मिंग के कारण विंड पैटर्न्स और प्रेशर पैटर्न्स बदल रहे हैं और मौसम में परिवर्तनशीलता बढ़ रही है। जैसे इस बार फरवरी और मार्च के मध्य तक वेस्टर्न डिस्ट्रबेंस सिस्टम डेवलप नहीं हुआ, जिसके कारण तापमान में वृद्धि हुई और आसमान भी साफ रहा। हालांकि अभी दो दिन से तापमान में थोड़ी गिरावट देखी गई है इसलिए इसके बारे में अभी कुछ कह नहीं सकते. लेकिन हां मार्च में सामान्य से तकरीबन 5 डिग्री तक तापमान अधिक रहा है।”
पंजाब में फरवरी महीने में तापमान सामान्य से काफी अधिक रहा और सूबे में बारिश भी बहुत कम हुई। पूरे महीने में सिर्फ 0.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जोकि औसत 27.1 मिलीमीटर से 98 प्रतिशत कम थी। अमृतसर में अधिकतम तापमान 26.7 डिग्री सेल्सियस से लेकर रोपड़ और पटियाला में 29.6 डिग्री तक रहा, जो सामान्य से 5.8 डिग्री तक ऊपर था, जबकि न्यूनतम तापमान भी 11.9 से 15.5 डिग्री के बीच रहा, जोकि कई जगहों पर 4.7 डिग्री तक अधिक था।
सिर्फ पूर्वी और दक्षिणी सीमावर्ती जिले बठिंडा, फरीदकोट, होशियारपुर, लुधियाना, मानसा, पठानकोट, पटियाला, रोपड़, संगरूर और नवांशहर में ही मामूली बारिश हुई, बाकी अधिकतर जिलों में सूखा रहा. मार्च में तो पंजाब के फरीदकोट, बठिंडा और मालवा के कई इलाकों में तापमान 34 डिग्री तक पहुंत गया था जोकि सामान्य से 6 डिग्री अधिक था। फरवरी और मार्च के पहले दो सप्ताह के सूखे ने ही गेहूं और जौ जैसी रबी फसलों पर हीट स्ट्रेस का खतरा बढ़ाया और किसानों की चिंताएं गहराई रहीं।
इस गर्म सर्दी का असर कृषि पर अधिक पड़ना था, लेकिन पिछले दो दिनों में तापमान में हुई गिरावट ने उम्मीद की एक किरण दिखाई है। पीएयू के प्रधान कृषि अर्थशास्त्री डॉ हरिराम शर्मा कहते हैं, “फरवरी और मार्च में ज्यादा तापमान से रबी फसलों जैसे गेहूं, सरसों और चने पर हीट स्ट्रेस पड़ सकता था जिससे पंजाब और हरियाणा में गेहूं की उपज 10% तक कम होती, लेकिन पिछले दो दिनों से तापमान में आई गिरावट और हल्की बूंदाबादी से नुकसान कम होने की संभावना है। जो फसल पहले ही सुनहरी यानि पकने की तरफ बढ़ चुकी है उसका नुकसान तो कम नहीं होगा, लेकिन जो अभी हरी है उसको जरूर फायदा होगा. इससे पहले साल 2022 एल नीनो ईयर था, उस साल करीब 13 से 16 प्रतिशत कम पैदावार हुई थी।”
चौकस सरकारें
साल 2022 से मिले सबक के कारण इस बार हरियाणा और पंजाब के कृषि से जुड़े संस्थान अधिक चौकस दिखे. फरवरी महीने में हुई सामान्य से कम बारिश ने सभी के कान खड़े कर दिए थे।
हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में गेहूं की फसल के विशेषज्ञ डॉ विक्रम कालीरमण बताते हैं, “आजकल गेहूं की जो किस्में प्रचलित हैं, उनमें 30 डिग्री तक के तापमान का तो कोई असर नहीं आता, लेकिन अगर तापमान 35 डिग्री तक पहुंच जाए तो फिर गेहूं और जौ की फसल पर असर आता है। हरियाणा के कई इलाकों में इस बार मार्च का दूसरा सप्ताह काफी गर्म रहा इसके कारण हमने इस बार एडवाइजरी जारी कर किसानों को सलाह दी थी कि हल्की सिचाईं और 2 प्रतिशत पोटेशियम नाइट्रेट का छिड़काव करें ताकि गर्मी का असर फसलों पर कम हो सके।”
भारतीय किसान यूनियन (भगत सिंह) के प्रवक्ता तेजबीर सिंह ने बताया, “इस बार फरवरी में ज्यादातर दिन (20-25) तापमान सामान्य से ऊपर थे, जबकि मार्च के पहले दो सप्ताह में 10 दिन हीटवेव जैसे रहे। कुल मिलाकर 60 प्रतिशत से ज्यादा दिन गर्म रहे. यह स्थिति किसानों की कमर तोड़ रही है, और अगर ऐसे ट्रेंड जारी रहे, तो उत्तरी भारत की कृषि अर्थव्यवस्था पर बड़ा खतरा है. सरकारों को इस पर ध्यान देना चाहिए और राज्य सरकार से हमारी मांग रहेगी कि कम से कम 500 रूपए प्रति क्विंटल बोनस किसानों को दिया जाना चाहिए।”
इसबार हरियाणा-पंजाब के गांव-देहात में एक आम सवाल लगभग सभी के मुंह से सुनाई दिया, “सर्दी कहां गई” किसान रमन ढ़ाका कहते है, "पिछले दस-पंद्रह साल से लगातार सर्द ऋतु की अवधि कम होती जा रही है। फरवरी में ही अप्रैल महीने जैसा महसूस होने लगता है। मार्च के शुरूआती दिनों में ही मेरे जिले का तापमान 34 डिग्री हो गया था. अब हमारे इलाके में सर्दी भी सिकुड़ रही है, गेहूं की बाली भी सिकुड़ रही है और हम किसानों की आय भी।"