हिमालय में मिली जहरीले सांपों की तीन नई प्रजातियां, हिमालयन पिट वाइपर को लेकर हुआ बड़ा खुलासा

यह खोज बताती है कि हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी में छिपी कई प्रजातियां जलवायु परिवर्तन और मानवीय दबाव के कारण खतरे में हो सकती हैं।
'हिमालयन पिट वाइपर' की खोजी गई नई प्रजाति; फोटो: डॉक्टर डैनियल जैब्लोंस्की और डॉक्टर फ्रैंक टिलैक
'हिमालयन पिट वाइपर' की खोजी गई नई प्रजाति; फोटो: डॉक्टर डैनियल जैब्लोंस्की और डॉक्टर फ्रैंक टिलैक
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सारांश
  • हिमालय की बर्फीली और दुर्गम पहाड़ियों में छिपा एक जहरीला सांप 160 वर्षों तक विज्ञान को भ्रमित करता रहा। दुनिया जिसे अब तक सिर्फ ‘हिमालयन पिट वाइपर’ नाम की एक प्रजाति मानती थी, वह दरअसल पांच अलग-अलग प्रजातियों का समूह निकला है।

  • इनमें से तीन प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके बारे में विज्ञान को आज तक कोई जानकारी नहीं थी। डीएनए जांच, शरीर की बनावट और 100 साल पुराने म्यूजियम नमूनों के अध्ययन ने इस बड़े रहस्य से पर्दा उठाया है।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज केवल सांपों की नई प्रजातियों की पहचान भर नहीं है, बल्कि हिमालय की अनदेखी जैव विविधता की एक झलक भी है।

  • अध्ययन से यह भी साफ हुआ है कि एशिया के दुर्गम पर्वतीय इलाके आज भी ऐसे जीवों को छिपाए हुए हैं, जिन तक विज्ञान की पहुंच नहीं हो सकी है। लेकिन चिंता की बात यह है कि नई पहचानी गई अधिकांश प्रजातियां बेहद सीमित और नाजुक आवासों में रहती हैं, जहां जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियां उनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं।

  • वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्रकृति के इन छिपे रहस्यों को समझना और बचाना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

हिमालय की ऊंची और दुर्गम पहाड़ियों में छिपे एशिया के सबसे रहस्यमयी जहरीले सांपों में से एक ने 160 वर्षों तक वैज्ञानिकों को भ्रम में रखा। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि दुनिया जिसे अब तक सिर्फ 'हिमालयन पिट वाइपर' नाम का एक जहरीला सांप समझती थी, वह असल में एक नहीं बल्कि पांच अलग-अलग प्रजातियां हैं।

चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से तीन प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके बारे में विज्ञान को भी आज से पहले कोई जानकारी नहीं थी।

इस महत्वपूर्ण खोज के बारे में अधिक जानकारी ओपन एक्सेस पत्रिका जूकीज में प्रकाशित हुई है। गौरतलब है कि इस सांप को सबसे पहले साल 1864 में खोजा गया था। तब से यही माना जाता रहा कि पूरे हिमालय क्षेत्र में एक ही तरह का पिट वाइपर पाया जाता है।

डीएनए जांच ने बदल दी हिमालयी सांप की पहचान

लेकिन इस नए अध्ययन में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने जब आधुनिक तकनीकों की मदद से डीएनए विश्लेषण, कंकाल की संरचना, शारीरिक विशेषताओं और भौगोलिक बदलावों का अध्ययन किया तो पता चला कि ‘हिमालयन पिट वाइपर’ दरअसल कई अलग-अलग विकासवादी वंशों में बंटा हुआ है।

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वैज्ञानिकों ने कुल पांच अलग-अलग प्रजातियों की पहचान की है। इनमें मूल हिमालयन पिट वाइपर के साथ-साथ, 2022 में खोजा गया चंबा पिट वाइपर (ग्लॉयडियस चैम्बेन्सिस) और पाकिस्तान व नेपाल के अलग-अलग इलाकों में पाई गई तीन नई प्रजातियां शामिल हैं। वैज्ञानिकों को इन सांपों में डीएनए के साथ-साथ शरीर और हड्डियों की संरचना में भी स्पष्ट अंतर मिले हैं।

इस बारे में अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डेनियल जैब्लोंस्की, जो कई सालों से पाकिस्तान और अफगानिस्तान में रिसर्च कर रहे हैं, उनका कहना है, “हिमालय और आसपास की पर्वतीय प्रणालियां आज भी ऐसी जैव विविधता को छिपाए हुए हैं, जिसे विज्ञान अब तक पहचान नहीं पाया है। ये क्षेत्र एशिया की जैव-भौगोलिक संरचना को समझने की अहम कड़ी हैं।“

उन्होंने आगे कहा, “आधुनिक फील्ड रिसर्च और पुराने संग्रहालय के नमूनों के अध्ययन को जोड़कर हम उन प्रजातियों तक पहुंच सके, जो एक सदी से भी ज्यादा समय से छिपी हुई थीं”

पुराने म्यूजियम नमूनों ने सुलझाई सदियों पुरानी गुत्थी

इस खोज की सबसे हैरान करने वाली कड़ी 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में एकत्र पुराने नमूनों से निकाला गया डीएनए था। इनमें हिमालयन पिट वाइपर का मूल नमूना भी शामिल था, जिसने वैज्ञानिकों को इसकी वास्तविक पहचान समझने में मदद की। अध्ययन में यह भी सामने आया कि कई अहम सबूत दशकों से संग्रहालयों में मौजूद थे, लेकिन वैज्ञानिक तकनीक सीमित होने के कारण उन्हें पहचाना नहीं जा सका।

जर्मनी के कोएनिग म्यूजियम और लाइबनिज इंस्टीट्यूट से जुड़ी वैज्ञानिक सिल्विया हॉफमैन का कहना है, "म्यूजियम में रखे नमूने सिर्फ अतीत का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि भविष्य के विज्ञान की बुनियाद हैं। कुछ पुख्ता सबूत 100 से अधिक सालों से म्यूजियम में मौजूद थे, बस हमारे पास उन्हें पहचानने की तकनीक नहीं थी।"

पारिस्थितिकी के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं पिट वाइपर

गौरतलब है कि सांप, छिपकलियां और अन्य उभयचर जीव पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये खाद्य श्रृंखला के शिकारी होने के साथ-साथ कीटों की आबादी को नियंत्रित करने में भी मदद करते हैं। साथ ही चिकित्सा क्षेत्र के लिए भी इनका जहर बेहद अहम है।

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हिमालय के कठिन पर्वतीय इलाकों में रहने वाले पिट वाइपर इस पारिस्थितिकी तंत्र के शीर्ष शिकारी माने जाते हैं, लेकिन अब तक इन पर बहुत कम अध्ययन हुआ है।

अब भी रहस्यों से भरा है हिमालय

वैज्ञानिकों का कहना है कि एशिया के कई दुर्गम पर्वतीय इलाके आज भी जैविक रहस्यों से भरे हुए हैं। राजनीतिक अस्थिरता और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इन क्षेत्रों तक वैज्ञानिकों की पहुंच लंबे समय तक सीमित रही है। शोधकर्ताओं ने यह भी चेताया है कि नई पहचानी गई अधिकांश प्रजातियां बेहद सीमित क्षेत्रों में रहती हैं और उनका आवास काफी नाजुक है।

ऐसे में जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों से इनके अस्तित्व को खतरा हो सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि जैव विविधता की सही पहचान संरक्षण के लिहाज से बेहद जरूरी है। क्योंकि यदि यह ही स्पष्ट न हो कि किसी क्षेत्र में कितनी प्रजातियां मौजूद हैं, तो उनके संरक्षण की प्रभावी योजना बनाना संभव नहीं होगा।

सच कहें तो वैज्ञानिकों के लिए यह खोज एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन साथ ही एक चेतावनी भी कि अगर इन नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्रों को नहीं बचाया गया, तो कई अनदेखी प्रजातियां दुनिया के सामने आने से पहले ही हमेशा के लिए खत्म हो सकती हैं।

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