गैलापागोस में समुद्री कछुओं का अनोखा सफर, हजारों किलोमीटर की जगह द्वीपों के बीच ही घूमते रहे

लंबी दूरी के लिए मशहूर समुद्री कछुए गैलापागोस के आसपास ही रहे, वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट ट्रैकिंग से उनके अनोखे सफर का पता लगाया
गैलापागोस में येलो-मॉर्फ समुद्री कछुए तीन साल तक समुद्री रिजर्व से बाहर नहीं गए और सीमित क्षेत्रों में ही घूमते रहे।
गैलापागोस में येलो-मॉर्फ समुद्री कछुए तीन साल तक समुद्री रिजर्व से बाहर नहीं गए और सीमित क्षेत्रों में ही घूमते रहे।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • गैलापागोस में येलो-मॉर्फ समुद्री कछुए तीन साल तक समुद्री रिजर्व से बाहर नहीं गए और सीमित क्षेत्रों में ही घूमते रहे।

  • वैज्ञानिकों ने नौ कछुओं पर सैटेलाइट टैग लगाए और उनकी गतिविधियों पर 418 दिनों तक नजर रखकर महत्वपूर्ण जानकारी हासिल की।

  • कुछ कछुए एक द्वीप तक सीमित रहे, जबकि कुछ ने इसाबेला, सैन क्रिस्टोबाल और अन्य द्वीपों के बीच यात्रा की।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, मादा कछुए प्रजनन के लिए भविष्य में पश्चिमी प्रशांत महासागर के दूर समुद्री तटों तक जा सकती हैं।

  • अध्ययन से पता चला कि कछुओं के संरक्षण के लिए सभी द्वीपों और उनके बीच समुद्री रास्तों की सुरक्षा जरूरी है।

समुद्री कछुओं को लंबी दूरी की यात्रा करने वाले जीवों के रूप में जाना जाता है। वे भोजन की तलाश में सैकड़ों से हजारों किलोमीटर तक समुद्र में सफर करते हैं और प्रजनन के समय अक्सर उन इलाकों के पास लौटते हैं, जहां उन्होंने जन्म लिया था। लेकिन गैलापागोस द्वीपसमूह में वैज्ञानिकों को समुद्री कछुओं के व्यवहार का एक हैरान करने वाला रूप देखने को मिला है।

फ्रंटियर्स इन एम्फ़िबियन एंड रेप्टाइल साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन में पता चला है कि पीले रंग वाले ग्रीन सी टर्टल, जिन्हें ‘येलो-मॉर्फ’ कहा जाता है, लंबे समय तक गैलापागोस द्वीपों के आसपास ही रहते हैं। अध्ययन के दौरान जिन नौ कछुओं पर सैटेलाइट टैग लगाए गए, उनमें से कोई भी गैलापागोस मरीन रिजर्व से बाहर नहीं गया।

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वैज्ञानिकों को थी लंबी यात्रा की उम्मीद

ग्रीन सी टर्टल समुद्री कछुओं की सात जीवित प्रजातियों में मुख्य रूप से शाकाहारी मानी जाती है। छोटे कछुए पौधों के साथ छोटे समुद्री जीव भी खाते हैं, लेकिन बड़े होने पर उनका भोजन मुख्य रूप से समुद्री शैवाल और सीग्रास होता है।

इस प्रजाति के दो आनुवंशिक रूप माने जाते हैं। एक को येलो-मॉर्फ और दूसरे को ब्लैक-मॉर्फ कहा जाता है। येलो-मॉर्फ आमतौर पर पश्चिमी प्रशांत महासागर के उष्ण और उपोष्ण क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जबकि ब्लैक-मॉर्फ पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के पश्चिमी तट के आसपास पाए जाते हैं।

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गैलापागोस ऐसा स्थान है, जहां दोनों रूप एक ही समुद्री क्षेत्र में मिलते हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि येलो-मॉर्फ कछुए प्रजनन के लिए पश्चिमी प्रशांत महासागर के दूर के समुद्री तटों तक जाएंगे। लेकिन सैटेलाइट ट्रैकिंग ने एक अलग तस्वीर दिखाई।

नौ कछुओं पर लगाया गया सैटेलाइट टैग

अमेरिका के अल्मा कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. जॉन डब्ल्यू. रो ने अपने सहयोगियों के साथ इस अध्ययन का नेतृत्व किया। वर्ष 2015 में वैज्ञानिकों ने गैलापागोस के चार द्वीपों के पास उथले समुद्री पानी से सात वयस्क नर और दो वयस्क मादा कछुओं को पकड़ा।

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इन सभी कछुओं पर इलेक्ट्रॉनिक सैटेलाइट टैग लगाए गए। इन टैगों से कछुओं की स्थिति की जानकारी मिलती रही। कुछ कछुओं की निगरानी 418 दिनों तक की गई। ट्रैकिंग आमतौर पर तब समाप्त हुई, जब टैग कछुए से अलग हो गया या उसका सिग्नल मिलना बंद हो गया।

ज्यादातर कछुए एक ही इलाके में रहे

अध्ययन से पता चला कि ज्यादातर कछुए तट के पास उथले पानी में ही रहना पसंद करते थे। कुछ कछुए कभी-कभी तट से करीब 25 किलोमीटर दूर समुद्र में भी गए।

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नौ में से पांच कछुए मुख्य रूप से एक ही द्वीप के आसपास रहे। हालांकि कुछ कछुओं ने एक से अधिक द्वीपों के बीच यात्रा की। बर्नार्डो और सारा नाम के कछुए इसाबेला और सैन क्रिस्टोबाल के बीच गए। वहीं लिआंड्रो ने इसाबेला और एस्पानोला के बीच यात्रा की।

आइनोआ नाम की मादा कछुआ सबसे ज्यादा घूमी। वह सैन क्रिस्टोबाल से सांता क्रूज और फिर इसाबेला पहुंची। वैज्ञानिकों ने देखा कि द्वीपों के बीच दर्ज की गई सभी यात्राएं अप्रैल से अक्टूबर के बीच ठंडे महीनों में हुईं।

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फिर भी पूरी कहानी सामने नहीं आई

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन कछुओं की लंबी दूरी की यात्रा की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। अध्ययन ने उनके जीवन के केवल एक हिस्से को रिकॉर्ड किया है। संभव है कि वे किसी दूसरे मौसम में गैलापागोस से बाहर निकलकर प्रशांत महासागर की लंबी यात्रा करते हों।

खास तौर पर मादा येलो-मॉर्फ कछुओं को लेकर अभी कई सवाल हैं। उन्हें गैलापागोस के समुद्र तटों पर अंडे देते हुए नहीं देखा गया है। इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रजनन के समय वे पश्चिमी प्रशांत महासागर के दूर स्थित अपने जन्मस्थलों की ओर लौट सकती हैं।

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संरक्षण के लिए भी अहम है अध्ययन

इस अध्ययन से समुद्री कछुओं के संरक्षण को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी एक द्वीप या एक छोटे समुद्री इलाके की रक्षा करना पर्याप्त नहीं होगा।

एक कछुआ अपने भोजन के लिए एक द्वीप के आसपास रह सकता है, लेकिन बाद में दूसरे द्वीप के समुद्री क्षेत्र में भी जा सकता है। ऐसे में द्वीपों के बीच मौजूद समुद्री रास्ते भी सुरक्षित रखना जरूरी है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, गैलापागोस के सभी द्वीपों के आसपास भोजन और रहने के लिए उपलब्ध समुद्री आवास को अच्छी स्थिति में बनाए रखना चाहिए। यह अध्ययन बताता है कि समुद्री कछुओं की दुनिया हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम सोचते हैं। लंबी यात्राओं के लिए मशहूर ये जीव अपने जीवन का काफी समय एक सीमित समुद्री क्षेत्र में भी बिता सकते हैं।

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