जहाजों के शोर से आफत में आई लुप्तप्राय समुद्री कछुओं की जान

मानवजनित गतिविधियों से उत्पन्न समुद्री शोर केम्प्स रिडले समुद्री कछुओं की सुनने की क्षमता और जीवन पर खतरा बन रहा है
अध्ययन में पाया गया कि कछुए लगभग तीन सौ हर्ट्ज की कम आवृत्ति वाली आवाजों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं
अध्ययन में पाया गया कि कछुए लगभग तीन सौ हर्ट्ज की कम आवृत्ति वाली आवाजों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • केम्प्स रिडले समुद्री कछुए दुनिया की सबसे संकटग्रस्त प्रजातियों में हैं और उत्तर अमेरिका के तटीय समुद्रों में रहते हैं

  • मानवजनित गतिविधियों से उत्पन्न जहाजों और उद्योगों का समुद्री शोर कछुओं के लिए एक नया खतरा बन रहा है

  • वैज्ञानिकों ने सेंसर लगाकर कछुओं की सुनने की क्षमता को पचास से सोलह सौ हर्ट्ज तक परखा और व्यवहार समझा

  • अध्ययन में पाया गया कि कछुए लगभग तीन सौ हर्ट्ज की कम आवृत्ति वाली आवाजों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं

  • भविष्य के शोध समुद्र में वास्तविक परिस्थितियों में शोर के प्रभाव समझकर संरक्षण और प्रबंधन नीतियां बनाने में मदद करेंगे

केम्प्स रिडले समुद्री कछुए दुनिया की सबसे अधिक खतरे में पड़ी समुद्री कछुआ प्रजातियों में से एक हैं। ये कछुए मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट और खाड़ी तट (गल्फ कोस्ट) के समुद्रों में पाए जाते हैं। यही क्षेत्र दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में भी गिने जाते हैं, जहां से रोजाना हजारों जहाज गुजरते हैं।

वैज्ञानिकों को पहले से पता है कि इन कछुओं के लिए कई खतरे मौजूद हैं। इनमें मछली पकड़ने के जाल में फंस जाना, जहाजों से टकरा जाना, प्लास्टिक कचरा निगल लेना और तटीय इलाकों का नष्ट होना शामिल है। लेकिन एक खतरा ऐसा है, जिस पर अभी पूरी तरह से समझ नहीं बन पाई है, मानवजनित गतिविधियों से पैदा होने वाला समुद्री शोर।

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समुद्र का शोर क्यों मायने रखता है

समुद्र के भीतर आवाज बहुत दूर तक जाती है, खासकर कम आवृत्ति की आवाजें। जहाजों के इंजन, औद्योगिक मशीनें, और अन्य मानवजनित गतिविधियां ऐसी ही कम आवृत्ति की आवाजें पैदा करती हैं।

केम्प्स रिडले जैसे समुद्री कछुए अपने आसपास के वातावरण को समझने के लिए ध्वनि का उपयोग करते हैं। वे आवाजों की मदद से रास्ता खोज सकते हैं और समुद्र में दिशा का अंदाजा लगा सकते हैं। अगर समुद्र में बहुत ज्यादा शोर हो, तो यह उनकी प्राकृतिक क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

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क्या कहता है अध्ययन?

इस विषय को बेहतर समझने के लिए ड्यूक यूनिवर्सिटी मरीन लैबोरेटरी, नेशनल ओशियानिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (नोआ) और नॉर्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक शोध किया। यह शोध जर्नल ऑफ द एकॉस्टिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका (जेएएसए) में प्रकाशित हुआ है

शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह जानना था कि केम्प्स रिडले समुद्री कछुए किस प्रकार की आवाजें सुन सकते हैं और वे किन ध्वनियों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि मानवजनित शोर उन्हें कितना प्रभावित करता है।

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कछुओं की सुनने की क्षमता कैसे मापी गई

वैज्ञानिकों ने कछुओं के सिर पर बिना नुकसान पहुंचाने वाले छोटे सेंसर लगाए। इन सेंसरों की मदद से उन्होंने कछुओं की सुनने वाली नसों में होने वाली विद्युत गतिविधि को रिकॉर्ड किया।

इसके बाद कछुओं को अलग-अलग आवृत्ति की आवाजें सुनाई गई। ये आवाजें 50 हर्ट्ज़ से लेकर 1600 हर्ट्ज तक की थीं। 50 हर्ट्ज बहुत धीमी आवाज होती है, जो इंसान भी मुश्किल से सुन पाते हैं।

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शोध के नतीजे

शोध में पाया गया कि केम्प्स रिडले समुद्री कछुए लगभग 300 हर्ट्ज की आवाजों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। जैसे-जैसे आवाज की आवृत्ति बढ़ती है, उनकी सुनने की क्षमता कम होती जाती है।

अहम बात यह है कि 300 हर्ट्ज के आसपास की आवाजें वही होती हैं, जो अक्सर जहाजों और औद्योगिक गतिविधियों से पैदा होती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि ये आवाजें तुरंत नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि खतरे की संभावना मौजूद है।

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आगे की राह

शोधकर्ता अब यह देखना चाहते हैं कि समुद्र के असली वातावरण में कछुए आवाजों पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। वे यह भी समझना चाहते हैं कि प्रयोगशाला में मापी गई ध्वनियां वास्तविक समुद्री जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं

इस तरह के अध्ययन भविष्य में समुद्री जीवन की सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनके आधार पर ऐसे नियम बनाए जा सकते हैं, जिनसे समुद्र में मानवजनित गतिविधियों और समुद्री जीवों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

केम्प्स रिडले समुद्री कछुए पहले ही कई खतरों से जूझ रहे हैं। समुद्र का बढ़ता शोर उनके लिए एक नया और गंभीर खतरा हो सकता है। वैज्ञानिकों का यह शोध हमें यह समझने में मदद करता है कि हमें समुद्र में अपनी गतिविधियों के प्रभावों पर और ध्यान देने की जरूरत है, ताकि हम इन दुर्लभ और अहम जीवों को बचा सकें।

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