

बिहार में भारत-नेपाल सीमा के करीब एक बोरवेल से वैज्ञानिकों ने मछली की ऐसी नई प्रजाति खोजी है, जिसकी पहचान की शुरुआत 2024 में टिकटॉक पर पोस्ट किए गए एक वीडियो से हुई।
करीब चार सेंटीमीटर लंबी इस पारदर्शी और रंगहीन मछली की आंखें त्वचा से ढकी हैं और इसके शरीर में पसलियां नहीं मिली हैं। वैज्ञानिकों ने इसका नाम ‘गंगाइचिथिस इंडोनेपालिकस’ रखा है।
यह गंगा बेसिन और इंडो-गंगा मैदान के भूजल भंडारों से मिली पहली ज्ञात भूमिगत मछली है, वहीं चौधुरीडे परिवार की भी पहली ऐसी प्रजाति है जो पूरी तरह भूमिगत जल आवासों में रहने के लिए अनुकूलित है।
इसके तीनों ज्ञात नमूने बोरवेल से मिले हैं। आनुवंशिक और शारीरिक जांच से इसकी विशिष्टता की पुष्टि हुई है और इसे एक नए वंश तथा नई प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
यह खोज बताती है कि धरती के नीचे फैले विशाल जलभृतों में जीवन की एक समृद्ध और अब तक अनदेखी दुनिया छिपी हो सकती है, जिसे समझना और संरक्षित करना बेहद जरूरी है।
बिहार में भारत-नेपाल सीमा के करीब बोरवेल से वैज्ञानिकों ने मछली की एक ऐसी नई दुर्लभ प्रजाति खोजी है, जिसकी पहचान की शुरुआत किसी वैज्ञानिक अभियान या प्रयोगशाला से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक वीडियो से हुई।
साल 2024 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'टिकटॉक' पर साझा किए गए एक वीडियो में एक छोटी, पारदर्शी और बेहद असामान्य दिखने वाली मछली बोरवेल से बाहर निकलती नजर आई थी। वीडियो में दिखी इस मछली की आंखें त्वचा से ढकी हुई थीं और उसके शरीर में लगभग कोई रंगद्रव्य (पिगमेंटेशन) नहीं था।
इस असाधारण जीव ने वैज्ञानिकों की उत्सुकता जगा दी। अब अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने इस मछली को नई प्रजाति के रूप में पहचान देते हुए इसका नाम 'गंगाइचिथिस इंडोनेपालिकस' (Gangaichthys indonepalicus) रखा है। इसका अर्थ है, गंगा नदी के भारत-नेपाल सीमा के निकट क्षेत्र में पाई जाने वाली मछली।
यह खोज इसलिए भी बेहद खास है, क्योंकि यह गंगा बेसिन और गंगा के मैदानी इलाके में जमीन के सैकड़ों फीट नीचे अंधेरे भूजल भंडारों में मिली पहली भूमिगत मछली है। इसके तीनों नमूने बोरवेल से मिले हैं। इतना ही नहीं, छोटी मीठे पानी की ईलनुमा मछलियों के चौधुरीडे (Chaudhuriidae) परिवार में भी यह पहली ज्ञात भूमिगत प्रजाति है।
इस बारे में अधिक जानकारी प्रतिष्ठित जर्नल जूकीज में प्रकाशित हुई है।
टिकटॉक वीडियो के बाद शुरू हुई तलाश
टिकटॉक वीडियो में मछली को देखने के बाद वैज्ञानिकों की टीम ने बिहार में उसकी तलाश शुरू की। इस टीम में मुंबई की ठाकरे वाइल्डलाइफ फाउंडेशन, कोल्हापुर के शिवाजी विश्वविद्यालय, चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के शोधकर्ता शामिल थे।
वैज्ञानिकों ने क्षेत्र के कई हैंडपंपों और बोरवेलों से हजारों लीटर पानी निकालकर इस रहस्यमयी मछली को खोजने की कोशिश की। एक बोरवेल से करीब 2,000 लीटर पानी निकालने के बाद उन्हें इसका पहला नमूना मिला। इसी बोरवेल से करीब 500 लीटर और पानी निकालने पर दूसरी मछली भी बाहर आई।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, अब तक इस प्रजाति के तीनों ज्ञात नमूने बोरवेल से ही मिले हैं। यह इस बात का संकेत है कि मछली संभवतः धरती के नीचे मौजूद अंधेरे जलभृतों या भूजल भंडारों में अपना जीवन बिताती है।
अंधेरे ने बदल दिया शरीर का रंग-रूप
वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार अंधेरे में रहने की वजह से इस मछली के शरीर में खास तरह के बदलाव आए हैं। इसकी आंखें बहुत छोटी हो गई हैं और त्वचा से ढकी हुई हैं। इसके शरीर में रंगद्रव्य (पिगमेंटेशन) भी पूरी तरह गायब है, जिससे यह लगभग पारदर्शी दिखाई देती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, ये विशेषताएं भूमिगत जीवन के अनुकूलन का परिणाम हैं। वैज्ञानिक भाषा में ऐसी प्रजातियों को स्टाइगोबिटिक कहा जाता है, जो पूरी तरह भूमिगत जल आवासों पर निर्भर होती हैं। करीब चार सेंटीमीटर लंबी इस मछली की माइक्रो-सीटी स्कैनिंग और आनुवंशिक जांच से कई अन्य असामान्य विशेषताएं भी सामने आईं।
इसके शरीर में कशेरुकाएं और पंखों को सहारा देने वाली हड्डियां (फिन रे) मौजूद हैं, लेकिन पसलियां नहीं मिलीं। जांच से पता चला है कि इस मछली में कुल 64 कशेरुकाएं हैं, जिनमें 28 पेट के हिस्से और 36 पूंछ के हिस्से में स्थित हैं।
इसके पेक्टोरल फिन में केवल एक रे है, जबकि पूंछ के पंख में छह रे पाई गईं। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी शारीरिक बनावट इतनी अलग है कि इसे मौजूदा प्रजातियों से अलग एक नए वंश और नई प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
जीन भी बताते हैं अलग कहानी
आनुवंशिक विश्लेषण ने भी पुष्टि की है कि यह मछली चौधुरीडे परिवार से संबंधित है। हालांकि, इस परिवार के अन्य ज्ञात वंशों की तुलना में इसके आनुवंशिक अंतर काफी गहरे हैं। उदाहरण के लिए माइटोकॉन्ड्रियल सीओ1 जीन के आधार पर यह दो अन्य तुलनात्मक वंशों से 20 फीसदी से अधिक अलग पाई गई।
यह अंतर इस बात को मजबूत करता है कि 'गंगाइचिथिस इंडोनेपालिकस' केवल एक नई प्रजाति ही नहीं, बल्कि एक अलग और अब तक अज्ञात वंश का भी प्रतिनिधित्व करती है।
यह खोज एक बार फिर बताती है कि धरती के नीचे फैले विशाल भूजल भंडारों में जीवन की एक समृद्ध और अब तक अनदेखी दुनिया छिपी हो सकती है। जिस गंगा के विशाल मैदान पर करोड़ों लोग रहते हैं, उसी के नीचे अंधेरे जलभृतों में ऐसी प्रजातियां और पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद हो सकते हैं, जिनके बारे में विज्ञान को अभी बहुत कम जानकारी है।
अब जरूरत है कि इस रहस्यमयी भूमिगत दुनिया को समझने के साथ-साथ उसका संरक्षण भी किया जाए।