बिहार से मिली दुर्लभ 'लेपर्ड गेको' की नई प्रजाति, डीएनए जांच से पता चला इतिहास

बिहार में पहली बार दर्ज हुई यह नई लेपर्ड गेको प्रजाति बताती है कि भारत के उपेक्षित पथरीले पारिस्थितिक तंत्र अब भी अनदेखे जीवों का खजाना समेटे हुए हैं।
बिहार में खोजी गई लेपर्ड गेको की दुर्लभ प्रजाति 'झूमा लेपर्ड गेको' (यूब्लेफेरिस झूमा); फोटो: जर्नल हर्पेटोजोआ
बिहार में खोजी गई लेपर्ड गेको की दुर्लभ प्रजाति 'झूमा लेपर्ड गेको' (यूब्लेफेरिस झूमा); फोटो: जर्नल हर्पेटोजोआ
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सारांश
  • बिहार के कैमूर वन्यजीव अभ्यारण्य के बाहरी इलाकों में वैज्ञानिकों ने लेपर्ड गेको की एक नई और दुर्लभ प्रजाति 'झूमा लेपर्ड गेको' (यूब्लेफेरिस झूमा) की खोज की है। यह बिहार में इस समूह की पहली आधिकारिक वैज्ञानिक रिकॉर्डिंग है, जिसके साथ ही भारत में ज्ञात लेपर्ड गेको प्रजातियों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है।

  • डीएनए विश्लेषण से पता चला है कि यह प्रजाति अपने निकटतम रिश्तेदारों से करीब 7.8 फीसदी आनुवंशिक रूप से अलग है, जो इस बात का संकेत है कि इसका विकासवादी सफर लाखों वर्ष पहले अलग हो गया था।

  • शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज भारत के कम अध्ययन किए गए पथरीले और अर्ध-शुष्क पारिस्थितिक तंत्रों में छिपी जैव विविधता की ओर ध्यान आकर्षित करती है। करीब 14 सेंटीमीटर लंबे इस गेको की शारीरिक बनावट भी इसे अन्य प्रजातियों से अलग पहचान देती है।

  • हालांकि इसकी दुर्लभता और आकर्षक रूप इसे अंतरराष्ट्रीय अवैध पालतू जीव व्यापार का संभावित शिकार भी बनाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह खोज कैमूर क्षेत्र के संरक्षण और वहां मौजूद अनूठी जैव विविधता की रक्षा की जरूरत को रेखांकित करती है।

बिहार के कैमूर वन्यजीव अभ्यारण्य के बाहरी इलाकों में वैज्ञानिकों ने छिपकली की एक बेहद खूबसूरत और दुर्लभ प्रजाति को खोज की है, जिसे 'झूमा लेपर्ड गेको' (यूब्लेफेरिस झूमा) नाम दिया गया है। बिहार के इतिहास में पहली बार 'लेपर्ड गेको' यानी तेंदुए जैसे चित्तीदार त्वचा वाली छिपकली के मिलने की आधिकारिक पुष्टि हुई है, जिसने देश के सरीसृप विज्ञान में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।

यह खोज इस बात का सबूत है कि भारत में बेहद कम अध्ययन किए गए पथरीले पारिस्थितिक तंत्र आज भी जैव विविधता के अनदेखे खजाने को समेटे हुए हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक यह यूब्लेफेरिस जीनस से जुड़ी गेको छिपकली है, जिसके सदस्य अपनी चलायमान पलकों और रात में सक्रिय रहने की आदत के लिए जाने जाते हैं। बिहार में इस वंश की किसी प्रजाति का यह पहला वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित रिकॉर्ड है। इस खोज के साथ ही भारत में ज्ञात लेपर्ड गेको की प्रजातियों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है।

बिहार में पहली बार दर्ज हुई लेपर्ड गेको की नई प्रजाति

यह खोज जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई), ह्यूमन एंड एनवायरमेंट अलायन्स लीग सहित अन्य संस्थानों से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा दी गई है। इसके बारे में अधिक जानकारी ऑस्ट्रियाई हर्पेटोलॉजिकल सोसाइटी के जर्नल हर्पेटोजोआ में प्रकाशित हुई है।

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बिहार में खोजी गई लेपर्ड गेको की दुर्लभ प्रजाति 'झूमा लेपर्ड गेको' (यूब्लेफेरिस झूमा); फोटो: जर्नल हर्पेटोजोआ

जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और अन्य प्रमुख संस्थानों के वैज्ञानिकों को यह बड़ी सफलता 2021 से 2024 के बीच किए गए गहन वन्यजीव सर्वेक्षणों के दौरान हाथ लगी। जब वैज्ञानिकों ने इस जीव के जेनेटिक कोड यानी डीएनए की बारीकी से जांच की, तो वे हैरान रह गए। इसका डीएनए इसके सबसे करीबी रिश्तेदारों, जैसे कि ‘सतपुड़ा लेपर्ड गेको’ से करीब 7.8 फीसदी अलग पाया गया। इनके शारीरिक लक्षणों तथा डीएनए विश्लेषण के आधार पर पुष्टि की कि यह पहले से ज्ञात किसी भी भारतीय लेपर्ड गेको से अलग प्रजाति है।

क्या बनाता है ‘झूमा लेपर्ड गेको’ को सबसे अलग?

विज्ञान जगत में इतनी बड़ी जेनेटिक दूरी इस बात का पुख्ता सबूत मानी जाती है कि यह प्रजाति लाखों साल पहले ही अपने बाकी कुनबे से अलग हो गई थी और यहां के खास भौगोलिक परिवेश के हिसाब से स्वतंत्र रूप से ढल चुकी थी।

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अध्ययन से पता चला है कि यह अनोखा जीव अपनी शारीरिक बनावट के मामले में भी बेहद अनूठा है। करीब 14 सेंटीमीटर लंबे इस जीव की पीठ गहरे भूरे रंग की है, जिस पर हल्के पीले रंग की दो खूबसूरत पट्टियां बनी हुई हैं। इसकी पीठ की चमड़ी पर उभरे हुए खुरदरे दानेदार तराश होते हैं, जिनके बीच में सामान्य प्रजातियों की तुलना में काफी ज्यादा दूरी होती है। इसके अलावा, इसके पैर के पंजे के नीचे बारीक झिल्लियां होती हैं, जो इसे खड़ी चट्टानों पर फिसलने से बचाकर गजब की ग्रिप देती हैं।

इस जीव में एक जादुई खूबी यह भी है कि यदि इसकी पूंछ किसी दुर्घटना में टूट जाए, तो दोबारा उगने वाली नई पूंछ के तराश गोल होने के बजाय एकदम चौकोर और चपटे आकार में बाहर आते हैं।

वैज्ञानिकों ने इस नए सरीसृप का नाम जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की पहली महिला निदेशक और जानी-मानी वैज्ञानिक डॉक्टर धृति बनर्जी के सम्मान में रखा है, जिन्हें उनके करीबी और सहयोगी प्यार से 'झूमा' बुलाते हैं। वन्यजीव विज्ञानियों का कहना है कि यह खोज इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे कई दुर्लभ प्रजातियां हमारी नजरों के सामने ही छिपी रहती हैं और जब तक उनकी गहन जेनेटिक जांच न हो, तब तक वे पहचानी नहीं जा पातीं।

यह गेको शुष्क और पथरीले इलाकों में रहता है, जहां वनस्पति बहुत कम होती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी खोज इस बात का प्रमाण है कि भारत की सरीसृप विविधता का बड़ा हिस्सा अब भी वैज्ञानिक दस्तावेजों में दर्ज नहीं हो पाया है।

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विशेष रूप से चट्टानी और अर्ध-शुष्क पारिस्थितिकी तंत्रों पर अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है, जबकि ये क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।

कानूनी सुरक्षा के बावजूद खतरे में अस्तित्व

दुर्भाग्य से इस जीव की यही अनूठी खूबसूरती अब उसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई है। लेपर्ड गेको अपनी चित्तीदार आकर्षक चमड़ी और पलकें झपका सकने वाली अनोखी आंखों के कारण अंतरराष्ट्रीय पेट ट्रेड यानी पालतू जीवों के अवैध बाजार में बेहद ऊंचे दामों पर बिकती हैं। 1960 के दशक से ही भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से कॉमन लेपर्ड गेको को पकड़कर विदेशों में तस्करी किया जाता रहा है।

हालांकि, भारत सरकार ने वन्यजीव संरक्षण संशोधन अधिनियम 2022 की अनुसूची-1 के तहत 'लेपर्ड गेको' की सभी प्रजातियों को बाघ और शेर की तरह ही सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा दी है, जिसके कारण इसका शिकार या व्यापार करना पूरी तरह से गैरकानूनी और संगीन अपराध है।

कानूनी दांव-पेचों के बावजूद यह प्रजातियां जंगलों की आग, अंधाधुंध कृषि के कारण उजड़ते ठिकाने, प्रदूषण, सड़कों पर गाड़ियों से कुचलने और स्थानीय लोगों द्वारा डर के मारे मार दिए जाने जैसे खतरों से जूझ रही है।

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वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नई प्रजाति के सामने आने से अब कैमूर के पठारों की सुरक्षा की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित होगा। तस्करों के जाल से इस दुर्लभ जीव को सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिकों ने सरकार से कड़े कानून लागू करने और स्थानीय लोगों में जागरूकता अभियान चलाने की अपील की है।

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