आक्रामक प्रजातियों पर दिशा-निर्देश की राह लंबी, एनबीए ने मांगा दो साल का वक्त

जैव विविधता, खेती और पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते खतरे के बीच विशेषज्ञ समिति काम में जुट गई है, लेकिन दिशा-निर्देश तैयार होने में समय लगेगा
20वीं शताब्दी के शुरूआती दौर में अंग्रेज विलायती कीकर दिल्ली लेकर आए थे जो देखते ही देखते जंगल की आग की तरह फैल गया; फोटो: आईस्टॉक
20वीं शताब्दी के शुरूआती दौर में अंग्रेज विलायती कीकर दिल्ली लेकर आए थे जो देखते ही देखते जंगल की आग की तरह फैल गया; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • आक्रामक विदेशी प्रजातियों से देश में जैव विविधता, खेती और पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ठोस दिशा-निर्देश अभी दूर हैं। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने वैज्ञानिक, कानूनी और व्यापक गाइडलाइन तैयार करने के लिए एनजीटी से दो साल का समय मांगा है।

  • केरल के कोल वेटलैंड में ‘पिंक ब्लूम’ जैसे मामलों ने इस संकट की गंभीरता उजागर कर दी है, जहां आक्रामक पौधे तेजी से फैलकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर रहे हैं। अब इस पर अंतिम फैसला एनजीटी को लेना है कि वह प्राधिकरण को समय दे या जल्द कार्रवाई सुनिश्चित करे।

देश में जैव विविधता के लिए बढ़ते खतरे के बीच राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने आक्रामक विदेशी प्रजातियों (इनवेसिव एलियन स्पीशीज) पर ठोस और वैज्ञानिक दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए दो साल का समय मांगा है। यह अनुरोध 13 मार्च 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल रिपोर्ट में किया गया।

प्राधिकरण का कहना है कि सटीक, वैज्ञानिक और कानूनी रूप से मजबूत दिशानिर्देश तैयार करने के लिए विस्तृत डेटा संग्रह और गहन विश्लेषण जरूरी है, जिसके लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है।

कोल वेटलैंड पर बढ़ता खतरा

यह मामला केरल के त्रिशूर और मलप्पुरम जिलों में मौजूद एक प्रमुख आद्रभूमि कोल वेटलैंड से जुड़ा है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण रामसर स्थल है। यहां जैव विविधता को आक्रामक प्रजातियों से गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

कैबोम्बा फुरकाटा, जिसे “पिंक ब्लूम” भी कहा जाता है, तेजी से फैल रहा है। इसके कारण वेटलैंड के कई जलमार्ग गुलाबी रंग में बदल गए हैं। यह पहले से मौजूद वॉटर हायसिंथ और साल्विनिया मोलस्टा जैसे खतरनाक पौधों के साथ मिलकर स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

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एनजीटी ने मांगा था जवाब

गौरतलब है कि एनजीटी ने 4 नवंबर 2025 को राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को निर्देश दिया था कि वह स्पष्ट करे कि क्या देशभर में आक्रामक प्रजातियों को खत्म करने के लिए कोई दिशा-निर्देश मौजूद हैं या नहीं।

ऐसे में इस मुद्दे की गहराई से जांच करने के लिए एनबीए ने एक विशेषज्ञ समिति बनाई है। यह समिति दो साल के भीतर आक्रामक विदेशी प्रजातियों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करेगी।

क्यों चाहिए ज्यादा समय?

12 फरवरी 2026 को हुई पहली बैठक में समिति ने अपने काम का दायरा तय किया। इसके तहत जैव विविधता, कृषि, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बनने वाली आक्रामक प्रजातियों की पहचान और उनकी प्राथमिकता तय की जाएगी। साथ ही, इनके प्रभाव और जानकारी की कमी का भी दस्तावेजीकरण किया जाएगा और रोकथाम, नियंत्रण, उन्मूलन व प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय स्तर के दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे।

एनबीए के अनुसार, यह काम केवल कागजी नहीं है। इसमें देशभर के अलग-अलग हितधारकों से जानकारी जुटाना, वैज्ञानिक अध्ययन करना और ठोस निष्कर्ष निकालना शामिल है। यही वजह है कि समिति ने इस प्रक्रिया के लिए दो साल का समय जरूरी बताया है।

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हालांकि समिति ने काम शुरू कर दिया है, लेकिन काम के साइंटिफिक नेचर को देखते हुए डेटा-कलेक्शन में लम्बा समय लगने वाला है और साथ ही सटीक विश्लेषण के लिए ज्यादा समय चाहिए। खास तौर पर, इस काम में देश भर के अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स से मिले इनपुट्स का रिव्यू शामिल है, जो नतीजों की एविडेंस वैल्यू पक्का करने के लिए जरूरी है।

आगे क्या होगा?

राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञ समिति कई अहम कदम उठाएगी, इनमें सबसे पहले पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और लोगों की जीविका पर असर के आधार पर उच्च जोखिम वाली प्रजातियों की पहचान और प्राथमिकता तय की जाएगी। साथ ही, देश और दुनिया में अपनाए गए उपायों को मिलाकर दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे।

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यह भी तय किया गया कि जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट मिलकर दो महीने में आक्रामक प्रजातियों की राष्ट्रीय सूची को अपडेट करेंगे।

इसके साथ ही अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्र के लिए थीमैटिक वर्किंग ग्रुप और सब-कमेटियां बनाई जाएंगी, ताकि काम तेजी और बेहतर समन्वय के साथ आगे बढ़ सके।

वहीं, पर्यावरण मंत्रालय और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर नीतियों को लागू करने की ठोस रणनीति भी तैयार की जाएगी।

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बता दें कि आक्रामक विदेशी प्रजातियां तेजी से फैलकर स्थानीय पौधों और जीवों को खत्म कर देती हैं, जिससे खेती, मत्स्य पालन और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा मंडराने लगता है। कोल वेटलैंड का मामला इस बढ़ते संकट की एक बड़ी चेतावनी है। ऐसे में अब सबकी नजर एनजीटी पर है कि क्या वह राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को मांगा गया समय देती है या जल्द दिशा-निर्देश लाने के लिए दबाव बनाती है।

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