भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी खोज: अरब सागर में मिली गहरे समुद्र की ईल की नई प्रजाति

अरब सागर की गहराई में मिली नई ईल, वैज्ञानिकों ने खोजी अनोखी प्रजाति; सीएमएफआरआई के नाम पर रखा गया नाम, भारत में ऐसी प्रजातियों की संख्या बढ़कर 13 हुई
नई ईल की पहचान शरीर की बनावट, दांतों, छिद्रों, कशेरुकाओं और वैज्ञानिक जांच के आधार पर की गई।
नई ईल की पहचान शरीर की बनावट, दांतों, छिद्रों, कशेरुकाओं और वैज्ञानिक जांच के आधार पर की गई।फोटो साभार: जुटैक्सा पत्रिका
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सारांश
  • अरब सागर में 300 मीटर गहराई पर वैज्ञानिकों को ईल की नई प्रजाति का एक नमूना मिला है।

  • नई प्रजाति का नाम एरिओसोमा सीएमएफआरआईएन्से रखा गया है, जिससे भारत में एरिओसोमा प्रजातियों की संख्या 13 हो गई।

  • नई ईल की पहचान शरीर की बनावट, दांतों, छिद्रों, कशेरुकाओं और वैज्ञानिक जांच के आधार पर की गई।

  • डीएनए जांच में नई प्रजाति और एरिओसोमा इंडिकम के बीच 7.07 से 7.08 प्रतिशत अंतर पाया गया।

  • नई प्रजाति का नाम सीएमएफआरआई के सम्मान में रखा गया है, जो इस वर्ष अपनी स्थापना की 80वीं वर्षगांठ मना रहा है।

केरल के कोच्चि स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीएमएफआरआई) के वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई में रहने वाली ईल की एक नई प्रजाति खोजी है। इस नई प्रजाति का नाम एरिओसोमा सीएमएफआरआईएन्से रखा गया है। यह खोज अरब सागर में हुई है और इससे भारतीय समुद्री जल में पाई जाने वाली एरिओसोमा प्रजाति की ईलों की कुल संख्या बढ़कर 13 हो गई है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह खोज भारत के समुद्री जैव-विविधता अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है। गहरे समुद्र में रहने वाले कई जीव अब भी वैज्ञानिकों के लिए पूरी तरह ज्ञात नहीं हैं। ऐसे में समुद्री सर्वेक्षण के दौरान मिली यह नई प्रजाति समुद्र की छिपी जैव-विविधता की एक और झलक देती है। यह शोध जुटैक्सा नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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300 मीटर की गहराई से मिला नमूना

नई ईल का एक ही नमूना अब तक वैज्ञानिकों के हाथ लगा है। इसे 27 जनवरी 2026 को केरल के क्विलोन यानी वर्तमान कोल्लम के समुद्री क्षेत्र से पकड़ा गया था। यह नमूना अरब सागर में समुद्र की सतह से करीब 300 मीटर नीचे मिला।

वैज्ञानिकों ने इसे गहरे समुद्र में इस्तेमाल होने वाले बॉटम ट्रॉल की मदद से एकत्र किया। यह सर्वेक्षण भारत सरकार के डीप ओशन मिशन प्रोजेक्ट के तहत किया जा रहा था। पकड़ी गई ईल की कुल लंबाई 255 मिलीमीटर थी।

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नई ईल की पहचान शरीर की बनावट, दांतों, छिद्रों, कशेरुकाओं और वैज्ञानिक जांच के आधार पर की गई।

यह नमूना समुद्र से मिलने वाले अन्य जीवों के साथ ट्रॉल में आया था। बाद में वैज्ञानिकों ने नियमित रूप से की जाने वाली छंटाई के दौरान इस ईल को अलग पहचाना और इसका विस्तृत अध्ययन शुरू किया।

शरीर की बनावट से हुई पहचान

नई प्रजाति की पहचान के लिए वैज्ञानिकों ने उसके शरीर की कई विशेषताओं का बारीकी से अध्ययन किया। इसके लिए स्टीरियो माइक्रोस्कोप की मदद ली गई। वैज्ञानिकों ने ईल के शरीर का रंग, दांतों की बनावट, शरीर पर मौजूद छिद्रों और अन्य शारीरिक विशेषताओं को देखा।

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इस ईल का शरीर पीले से भूरे रंग का है। इसकी एक खास पहचान यह है कि शरीर की पार्श्व रेखा यानी लेटरल लाइन के नीचे बहुत छोटे-छोटे काले धब्बे बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। इसके अलावा इसका पेक्टोरल फिन बिना किसी विशेष रंग या धब्बे के है। इसके सिर के पास मौजूद ओपरकुलर पैच काफी गहरा, लगभग काला दिखाई देता है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि इस ईल में केवल दो स्पष्ट सुप्राऑर्बिटल छिद्र हैं। इसके शरीर में कुल 135 कशेरुकाएं हैं, जबकि लेटरल लाइन के छिद्र की संख्या 127 से 130 के बीच है। इसकी गुदा-पूर्व लंबाई कुल शरीर की लंबाई का 43.9 प्रतिशत है।

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डीएनए जांच ने भी की पुष्टि

केवल शरीर की बनावट के आधार पर नई प्रजाति घोषित करना पर्याप्त नहीं था। इसलिए वैज्ञानिकों ने इसका आनुवंशिक अध्ययन भी किया। इसके लिए ईल के ऊतक से जीनोमिक डीएनए निकाला गया और माइटोकॉन्ड्रियल सीओआई जीन के एक हिस्से का अध्ययन किया गया।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक संबंधों को समझने के लिए जेनेटिक ट्री तैयार किया। जांच में नई ईल अपने सबसे करीबी रिश्तेदार एरिओसोमा इंडिकम से आनुवंशिक रूप से अलग पाई गई।

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दोनों के सीओआई जीन में 7.07 से 7.08 प्रतिशत तक अंतर पाया गया। इस आनुवंशिक अंतर ने वैज्ञानिकों को यह पुष्टि करने में मदद की कि मिला हुआ नमूना पहले से ज्ञात प्रजाति नहीं, बल्कि एक अलग और नई प्रजाति है।

सीएमएफआरआई के नाम पर रखा गया नाम

नई प्रजाति का नाम एरिओसोमा सीएमएफआरआईएन्से रखा गया है। इसके नाम में सीएमएफआरआई का उल्लेख संस्थान के सम्मान में किया गया है। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह नाम समुद्री मत्स्य अनुसंधान में सीएमएफआरआई के योगदान को सम्मानित करता है।

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यह खोज ऐसे समय में हुई है जब सीएमएफआरआई अपनी स्थापना के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। नई प्रजाति का नाम संस्थान के समुद्री अनुसंधान और भारत में समुद्री संसाधनों के अध्ययन में लंबे योगदान को भी दर्शाता है।

वैज्ञानिकों के लिए यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गहरे समुद्र में मौजूद जीवों के बारे में अभी काफी जानकारी जुटाई जानी बाकी है। नियमित समुद्री सर्वेक्षण और ट्रॉल से मिलने वाले नमूनों का वैज्ञानिक अध्ययन भविष्य में ऐसी कई और प्रजातियों की पहचान में मदद कर सकता है। यह खोज बताती है कि भारत के समुद्री क्षेत्र में जैव-विविधता का एक बड़ा हिस्सा अब भी वैज्ञानिक खोज का इंतजार कर रहा है।

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