

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को बचाने के लिए दक्कन में 18 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 16 प्राथमिक संरक्षण क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं।
जंगल में अब 150 से कम ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बचे हैं, महाराष्ट्र समेत चार राज्यों में उनकी आबादी विलुप्ति के कगार पर है।
दक्कन पठार के केवल 6.6 प्रतिशत हिस्से को ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए उपयुक्त आवास पाया गया, अध्ययन ने चिंता बढ़ाई।
प्राकृतिक घासभूमि और खाली कृषि भूमि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि घने जंगल और शहरी क्षेत्र अनुपयुक्त पाए गए।
बिजली लाइन, सड़क, सिंचाई और गहन खेती से आवास घट रहे हैं, इसलिए बड़े भू-दृश्य स्तर पर संरक्षण जरूरी है।
भारत के सबसे खास और संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने बड़ा कदम उठाया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के वैज्ञानिकों ने दक्कन के अर्ध-शुष्क इलाके में 16 ऐसे अहम संरक्षण क्षेत्रों की पहचान की है, जो करीब 18 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले हैं। इन क्षेत्रों में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के बचे हुए आवास को सुरक्षित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह शोध प्लोस वन नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड करीब एक मीटर ऊंचा होता है और दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में गिना जाता है। कभी यह पक्षी भारत के 11 राज्यों और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में बड़ी संख्या में पाया जाता था। लेकिन अब जंगल में इसकी संख्या 150 से भी कम रह गई है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इसकी दक्षिणी आबादी खास तौर पर खतरे में है।
दक्कन के सिर्फ 6.6 प्रतिशत हिस्से में अनुकूल माहौल
वैज्ञानिकों ने उपग्रह से मिले आंकड़ों, पर्यावरण से जुड़ी जानकारी और जीपीएस से जुड़े पक्षियों की गतिविधियों का अध्ययन किया। इस अध्ययन से पता चला कि करीब 7.20 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले दक्कन के पठार का केवल 6.6 प्रतिशत हिस्सा ही आज ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के लिए उपयुक्त बचा है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को खुले और बड़े मैदान पसंद हैं। वह घने जंगलों और बहुत अधिक शहरी इलाकों से दूर रहता है। खुले घास के मैदान और पारंपरिक खेती वाले इलाके उसके लिए ज्यादा उपयोगी हैं। ऐसे स्थानों पर उसे भोजन, घोंसला बनाने और अपने साथी को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।
बारिश और वनस्पति भी तय करती है ठिकाना
अध्ययन में पाया गया कि मौसम और वनस्पति की स्थिति भी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के रहने की जगह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गर्मियों के महीनों में होने वाली बारिश और मानसून की शुरुआत के समय वनस्पति की स्थिति इसके लिए खास महत्व रखती है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बहुत घनी और ऊंची वनस्पति वाले इलाकों की बजाय खुले क्षेत्रों को पसंद करता है। वह खेतों में मौजूद कीड़े, बीज और छोटे जीवों को भोजन के रूप में खाता है। इसी कारण प्राकृतिक घास के मैदान और कम गहन खेती वाले खेत उसके लिए महत्वपूर्ण हैं।
गांवों की जानकारी से भी मिली मदद
वैज्ञानिकों ने अपने कंप्यूटर मॉडल की जांच जमीन पर भी की। महाराष्ट्र में 30 से अधिक सर्वे टीमों ने हजारों किलोमीटर की यात्रा कर 372 क्षेत्रों में सर्वे किया। इस दौरान 1,400 से ज्यादा ग्रामीणों से भी बातचीत की गई।
सर्वे के दौरान वैज्ञानिकों को सीधे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड दिखाई नहीं दिया। लेकिन स्थानीय लोगों ने हाल के वर्षों में पक्षी देखे जाने की जानकारी दी। ऐसी जानकारी 72 महत्वपूर्ण क्षेत्रों से मिली। इससे वैज्ञानिकों को अपने मॉडल से पहचाने गए इलाकों की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिली। इन इलाकों में सामान्य क्षेत्रों की तुलना में खाली पड़े खेती के खेत और प्राकृतिक घास के मैदान ज्यादा पाए गए। वहीं घने पर्णपाती जंगलों की मौजूदगी कम थी।
खेती और विकास से बढ़ा खतरा
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की संख्या में गिरावट का एक बड़ा कारण उसके प्राकृतिक आवास का तेजी से बदलना है। पहले दक्कन के कई हिस्सों में किसान कम पानी वाली दालों और तिलहन की खेती करते थे। खेती के बाद काफी जमीन कुछ समय के लिए खाली भी छोड़ी जाती थी। अब इन इलाकों में गन्ने और कपास जैसी अधिक पानी और संसाधन मांगने वाली फसलों का विस्तार हुआ है।
इसके अलावा सड़कें, सिंचाई की नहरें, बिजली की ऊंची लाइनें और दूसरे निर्माण कार्य भी गोडावण के खुले आवास को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट रहे हैं। बिजली की तारें इस पक्षी के लिए विशेष खतरा हैं, क्योंकि उड़ते समय इनके साथ टकराव से उसकी मौत हो सकती है।
छोटे अभयारण्य नहीं, पूरे परिदृश्य की जरूरत
वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल छोटे अभयारण्यों के भीतर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को बचाना पर्याप्त नहीं होगा। यह पक्षी बहुत बड़े क्षेत्र में घूमता है और खेती वाले इलाकों से भी होकर गुजरता है। इसलिए संरक्षण की योजना पूरे परिदृश्य को ध्यान में रखकर बनानी होगी।
नन्नाज और रोलापाडु जैसे पारंपरिक संरक्षण वाले इलाकों के अनुभव से भी यह सामने आया है कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को छोटे और सीमित क्षेत्र में रोकना आसान नहीं है। नए अध्ययन में चिन्हित 16 क्षेत्रों को जोड़कर एक बड़े संरक्षण नेटवर्क के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
तीन पक्षियों के आंकड़ों की सीमा
इस अध्ययन की एक बड़ी सीमा यह है कि जीपीएस से केवल तीन ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की गतिविधियों का विस्तृत आंकड़ा उपलब्ध था। पक्षी की बेहद कम संख्या और उसे पकड़ने से जुड़े जोखिमों के कारण बड़े पैमाने पर जीपीएस टैगिंग संभव नहीं है। इसके बावजूद वैज्ञानिकों ने उपग्रह आंकड़ों और स्थानीय लोगों की जानकारी के साथ इन आंकड़ों का उपयोग कर महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बचेगा तो पूरा घास का मैदान बचेगा
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को बचाने का फायदा केवल इसी एक पक्षी तक सीमित नहीं रहेगा। अन्य पक्षियों और उनके प्राकृतिक आवासों को बचाना भी उतना ही जरूरी है।