जलवायु संकट: गायब हो जाएगा ब्रह्मपुत्र घाटी का दुर्लभ पक्षी जर्डन बब्बलर?

ब्रह्मपुत्र घाटी के घास के मैदानों में जर्डन बब्बलर पर जलवायु संकट, आवास सिकुड़ने से भविष्य में गंभीर खतरे की वैज्ञानिक चेतावनी जारी
ब्रह्मपुत्र घाटी में जर्डन बब्बलर का आवास जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान से तेजी से सिकुड़ने की चेतावनी दी गई।
ब्रह्मपुत्र घाटी में जर्डन बब्बलर का आवास जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान से तेजी से सिकुड़ने की चेतावनी दी गई।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • ब्रह्मपुत्र घाटी में जर्डन बब्बलर का आवास जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान से तेजी से सिकुड़ने की वैज्ञानिक चेतावनी दी गई।

  • असम और अरुणाचल की घनी घासभूमियों पर निर्भर जर्डन बब्बलर के लिए सुरक्षित क्षेत्र पहले से ही बहुत सीमित पाए गए।

  • अध्ययन में बताया गया कि केवल कुछ हजार वर्ग किलोमीटर ही उच्च गुणवत्ता वाला आवास इस दुर्लभ पक्षी के लिए बचा।

  • बदलते बारिश पैटर्न और बाढ़ चक्र में परिवर्तन से घास वाली जमीनों की संरचना बिगड़ने और पक्षी के भोजन स्रोत घटने की आशंका।

  • 2060 तक उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में जर्डन बब्बलर का आवास और अधिक खंडित होकर पारिस्थितिक अलगाव की स्थिति में पहुंच सकता है।

एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन ब्रह्मपुत्र घाटी के दुर्लभ पक्षी जर्डन बब्बलर के प्राकृतिक आवास को धीरे-धीरे सिकोड़ सकता है। यह पक्षी मुख्य रूप से असम और अरुणाचल प्रदेश की उन ऊंची नदी-घास के मैदानों में पाया जाता है, जो ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ और कटाव से बनती और बदलती रहती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इन क्षेत्रों में पहले से ही सुरक्षित और उपयुक्त आवास बहुत सीमित हैं, और आने वाले दशकों में यह और कम हो सकता है।

शोध में क्या पाया गया

यह अध्ययन ‘द साइंस ऑफ नेचर’ नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि वर्तमान में जर्डन बब्बलर के लिए लगभग 6,498 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र “बहुत अच्छा” आवास माना जा सकता है। इसके अलावा करीब 8,362 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र “उपयुक्त” श्रेणी में आता है। लेकिन जब भूमि उपयोग में बदलाव, मानवजनित गतिविधियों और पर्यावरणीय दबाव को शामिल किया गया, तो यह सबसे अच्छा आवास घटकर केवल 4,837 वर्ग किलोमीटर रह जाता है।

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शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि पूरे अध्ययन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा, यानी 1,21,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक भूमि, इस पक्षी के लिए पहले से ही अनुपयुक्त हो चुकी है। इसका मतलब है कि यह पक्षी पहले से ही बहुत सीमित और टूटे-फूटे आवासों में जीवित है।

कैसे किया गया अध्ययन

इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने 300 से अधिक रिकॉर्ड एकत्र किए, जो फील्ड सर्वे, पुराने शोध पत्रों और ईबर्ड जैसे पक्षी के आंकड़ों स्रोतों से लिए गए थे। बाद में दोहराए गए और अविश्वसनीय आंकड़े हटाने के बाद केवल 65 विश्वसनीय स्थानों को मॉडलिंग के लिए इस्तेमाल किया गया। इससे यह भी पता चलता है कि यह पक्षी अपने पूरे क्षेत्र में बहुत कम देखा जाता है।

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शोध में जलवायु और भू-भाग के कई कारणों को शामिल किया गया, जैसे औसत तापमान, बारिश और ऊंचाई। इनमें से गर्मी के मौसम में अधिकतम तापमान को सबसे महत्वपूर्ण कारक माना गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में बढ़ता तापमान इस पक्षी के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

बाढ़ वाली घास वाली जमीनों पर निर्भर जीवन

जर्डन बब्बलर पूरी तरह से उन घनी घास के मैदानों पर निर्भर है जो ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ से बनती हैं। यह बाढ़ हर साल मिट्टी और रेत को बहाकर नए मैदान बनाती है, जिससे ऊंची घास उगती है। यही घास इस पक्षी के घोंसले बनाने, छिपने और भोजन खोजने के लिए जरूरी है।

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लेकिन अगर बारिश का पैटर्न बदलता है या गर्मी बढ़ती है, तो ये घास वाली जमीनें सूख सकती हैं या टूट सकती हैं। इससे न केवल घोंसले बनाने की जगह कम होगी, बल्कि कीटों की संख्या भी घट सकती है, जो इस पक्षी का मुख्य भोजन है।

भविष्य की चिंता और वैज्ञानिक चेतावनी

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि 2060 के दशक तक, यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह बढ़ता रहा, तो “सबसे अच्छा” आवास और भी सिकुड़ जाएगा। इसका मतलब है कि जो छोटे-छोटे सुरक्षित क्षेत्र बचे हैं, वे भी आपस में अलग-थलग हो सकते हैं।

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ऐसी स्थिति में पक्षियों की अलग-अलग आबादियां एक-दूसरे से कट सकती हैं, जिससे उनके जीवित रहने का खतरा बढ़ जाता है। वैज्ञानिक इसे “पारिस्थितिक अलगाव” यानी इकोलॉजिकल आइसोलेशन की स्थिति बता रहे हैं।

संरक्षण की जरूरत पर जोर

शोधकर्ताओं ने कहा है कि इस समस्या का समाधान केवल एक प्रजाति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे ब्रह्मपुत्र घाटी के पारिस्थितिक तंत्र से जुड़ा हुआ है। उन्होंने सुझाव दिया है कि घास के मैदानों का पुनरुद्धार किया जाए, सुरक्षित क्षेत्रों के बीच हरित गलियारे बनाए जाएं और जलवायु के अनुसार नए संरक्षित क्षेत्र विकसित किए जाएं।

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इसके साथ ही लगातार निगरानी और शोध की भी जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि बदलती जलवायु में यह पक्षी और उसका आवास कैसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

यह अध्ययन दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन केवल हिमालयी जंगलों को ही नहीं, बल्कि ब्रह्मपुत्र घाटी की अनोखे घास के मैदानों को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो जर्डन बब्बलर जैसे दुर्लभ पक्षियों का अस्तित्व और भी कठिन हो सकता है।

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