

वैज्ञानिकों ने विलुप्ति की कगार पर खड़ी सबसे छोटी समुद्री पोरपोइज वैक्विटा के कंकाल का विस्तृत थ्रीडी मॉडल तैयार किया।
मॉर्फोसोर्स प्लेटफॉर्म पर मुफ्त उपलब्ध यह डिजिटल मॉडल नाजुक हड्डियों को बिना नुकसान पहुंचाए अध्ययन करने की सुविधा देता है।
कमेडिकल सीटी और माइक्रो-सीटी स्कैनिंग के जरिए हड्डियों की अंदरूनी माइक्रोस्कोपिक संरचना को माइक्रोन्स के स्तर तक डिजिटाइज किया गया।
तोतोआबा मछली के अवैध शिकार के लिए बिछाए जाने वाले गिलनेट में फंसकर वैक्विटा की आबादी तेजी से खत्म हो रही है।
इन थ्रीडी फाइलों से तैयार सटीक मॉडल संग्रहालयों और कक्षाओं में इस दुर्लभ जीव के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाएंगे।
दुनिया के सबसे छोटे और सबसे दुर्लभ समुद्री स्तनपायी जीव वैक्विटा (फोकोएना साइनस) के अस्तित्व पर अब तक का सबसे बड़ा संकट मंडरा रहा है। मेक्सिको की कैलिफोर्निया खाड़ी के उथले पानी में पाई जाने वाली इस प्रजाति की संख्या घटते-घटते अब महज कुछ ही बची है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए शोधकर्ताओं ने एक अनूठी पहल की है।
उन्होंने एक मादा वैक्विटा के बेहद नाजुक और दुर्लभ कंकाल को डिजिटल थ्रीडी मॉडल में बदल दिया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य इस प्रजाति के शारीरिक ढांचे को हमेशा के लिए सुरक्षित रखना है, ताकि यदि यह जीव पूरी तरह से विलुप्त भी हो जाए, तो भी विज्ञान और शिक्षा जगत के पास इसका सटीक रिकॉर्ड मौजूद रहे।
तकनीक का अनूठा संगम और खुला डेटाबेस
यह डिजिटल अध्ययन हाल ही में 'मरीन मैमल्स साइंस' नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। फ्लोरिडा अटलांटिक यूनिवर्सिटी (एफएयू) के शोधकर्ताओं ने सैन डिएगो नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, सीवर्ल्ड कैलिफोर्निया और नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (नोआ) फिशरीज के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को पूरा किया है।
जिस कंकाल का स्कैन किया गया है, उसे 1960 के दशक में एकत्र करके म्यूजियम को सौंपा गया था। चूंकि यह कंकाल अत्यधिक दुर्लभ और नाजुक है, इसलिए इसे छूने या आम लोगों के प्रदर्शन के लिए बाहर निकालने की अनुमति बहुत कम दी जाती है।
अब इसे उच्च तकनीक से डिजिटाइज करके डिजिटल प्लेटफॉर्म 'मॉर्फोसोर्स' पर मुफ्त में उपलब्ध करा दिया गया है। इसकी मदद से दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी व्यक्ति, छात्र या शोधकर्ता इस कंकाल की हर हड्डी को किसी भी कोण से घुमाकर, बड़ा करके और गहराई से देख सकता है। इसके अलावा इन थ्रीडी मॉडल्स की मदद से संग्रहालयों और कक्षाओं के लिए वैक्विटा के हूबहू और सटीक मॉडल थ्रीडी प्रिंट भी किए जा सकेंगे।
सूक्ष्म स्तर पर हड्डियों की जांच
वैक्विटा के छोटे से शरीर और उसकी जटिल हड्डियों को स्कैन करना आसान काम नहीं था। इसके लिए वैज्ञानिकों ने मल्टी-स्केल इमेजिंग तकनीक का सहारा लिया। सबसे पहले, अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली मेडिकल सीटी स्कैन तकनीक से पूरे शरीर और बड़ी हड्डियों के ढांचे की तस्वीरें ली गईं। इसके बाद, हर एक हड्डी की अलग-अलग उच्च-गुणवत्ता वाली तस्वीरें खींची गईं।
अंत में, हड्डियों की अंदरूनी संरचना को देखने के लिए 'माइक्रो-सीटी' तकनीक का इस्तेमाल किया गया। माइक्रो-सीटी इतनी सूक्ष्म तकनीक है जो इंसान के बाल की चौड़ाई से भी छोटे आकार की परतों को रिकॉर्ड कर सकती है। इस प्रक्रिया में हड्डियों के हजारों क्रॉस-सेक्शनल चित्र तैयार हुए। विशेष सॉफ्टवेयर की मदद से शोधकर्ताओं ने हर एक हड्डी को अलग करके पुनः जोड़ा, जिससे एक बहुस्तरीय और बेहद सटीक थ्रीडी डिजिटल मॉडल तैयार हो पाया।
अवैध शिकार और बढ़ता खतरा
लगभग 1.5 मीटर लंबे इस खूबसूरत जीव की आंखों और मुंह के चारों ओर काले घेरे होते हैं, जो इसे एक अलग पहचान देते हैं। विज्ञान को 20वीं सदी के उत्तरार्ध में ही इसके अस्तित्व का पता चला था, लेकिन कुछ ही दशकों में यह जीव विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया। वैक्विटा के विनाश का सबसे बड़ा कारण समुद्र में बिछाए जाने वाले 'गिलनेट' यानी अवैध जाल हैं।
हालांकि मछुआरे वैक्विटा का शिकार नहीं करते, लेकिन वे 'तोतोआबा' नामक एक अन्य दुर्लभ मछली को पकड़ने के लिए ये जाल बिछाते हैं। तोतोआबा का तैरने वाला मूत्राशय (स्विम ब्लैडर) अंतरराष्ट्रीय चोर बाजार में बहुत ऊंची कीमतों पर बिकता है। इस अवैध व्यापार के चक्कर में बिछाए गए जालों में वैक्विटा गलती से फंस जाती हैं और दम घुटने से उनकी मौत हो जाती है।
भविष्य के लिए उम्मीद और जागरूकता
वैक्विटा आज पूरी दुनिया में समुद्री जैव विविधता के संरक्षण का एक बड़ा प्रतीक बन चुकी है। वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों का कहना है कि यदि इनके प्राकृतिक आवास से गिलनेट को तुरंत नहीं हटाया गया, तो इन्हें बचाना नामुमकिन हो जाएगा।
इस थ्रीडी प्रोजेक्ट से जुड़े शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यह डिजिटल आर्काइव (अभिलेखागार) न केवल एक अत्यंत मूल्यवान वैज्ञानिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखेगा, बल्कि आम लोगों में इस संकटग्रस्त जीव के प्रति जागरूकता भी पैदा करेगा। जब छात्र और शोधकर्ता इस दुर्लभ जीव की शारीरिक बनावट को डिजिटल माध्यम से करीब से देखेंगे, तो समुद्री जीवों के संरक्षण की आवश्यकता को और अधिक मजबूती से समझा जा सकेगा।