मधुमक्खियों पर कीटनाशक का असर: आनुवंशिक बदलाव से भविष्य में परागण को खतरा

सुल्फोक्साफ्लोर कीटनाशक से भौंरा मधुमक्खियों के जीन में बदलाव, प्रजनन क्षमता पर असर और कृषि-परागण संतुलन को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ी
भौंरा मधुमक्खियों पर सुल्फोक्साफ्लोर की कम मात्रा भी जीन गतिविधि बदलकर उनके प्रजनन तंत्र और जैविक कार्यों को प्रभावित कर सकती है।
भौंरा मधुमक्खियों पर सुल्फोक्साफ्लोर की कम मात्रा भी जीन गतिविधि बदलकर उनके प्रजनन तंत्र और जैविक कार्यों को प्रभावित कर सकती है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भौंरा मधुमक्खियों पर सुल्फोक्साफ्लोर की कम मात्रा भी जीन गतिविधि बदलकर उनके प्रजनन तंत्र और जैविक कार्यों को प्रभावित कर सकती है।

  • अध्ययन में अंडाशय ऊतक सबसे अधिक प्रभावित पाया गया, जिससे मधुमक्खियों की प्रजनन क्षमता और कॉलोनी वृद्धि पर असर संभव है।

  • जॉर्जिया टेक वैज्ञानिकों ने आरएनए विश्लेषण से जीन बदलाव पहचानकर कीटनाशक के सूक्ष्म जैविक प्रभावों को विस्तार से समझने का प्रयास किया।

  • शोधकर्ताओं ने बताया कि कीटनाशक और पर्यावरणीय तनाव मिलकर मधुमक्खियों की संख्या घटा सकते हैं, जिससे परागण और कृषि उत्पादन प्रभावित होगा।

  • वैज्ञानिकों ने संतुलित कृषि उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि फसल सुरक्षा और परागण करने वाले कीड़ों का संरक्षण साथ हो सके।

हम जो फल, सब्जियां और अनाज खाते हैं, उनमें से बहुत बड़ी संख्या मधुमक्खियों जैसे परागण करने वाले कीड़ों की मदद से उगती है। मधुमक्खियां फूलों से पराग एक फूल से दूसरे फूल तक पहुंचाकर पौधों को फल और बीज बनाने में मदद करती हैं। इसलिए आधुनिक खेती और हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए मधुमक्खियां बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। लेकिन खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ कीटनाशक इन जरूरी कीड़ों के लिए खतरा भी बन सकते हैं।

सुल्फोक्साफ्लोर नामक कीटनाशक पर ध्यान

वैज्ञानिकों का ध्यान हाल के वर्षों में एक खास कीटनाशक पर गया है, जिसका नाम सुल्फोक्साफ्लोर है। इसे 2013 में पेश किया गया था। यह कीटनाशक मुख्य रूप से उन कीड़ों को खत्म करने के लिए उपयोग किया जाता है जो पौधों का रस चूसकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जैसे एफिड्स। यह कीटनाशक मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों में काफी उपयोग होता है। हालांकि यह फसलों के लिए हानिकारक कीड़ों को नियंत्रित करता है, लेकिन शोध बताते हैं कि यह मधुमक्खियों के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।

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कम मात्रा में भी बदल रहा है असर

अमेरिका के जॉर्जिया टेक संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया कि बहुत कम मात्रा में भी यह कीटनाशक भौंरा मधुमक्खियों के शरीर पर असर डाल सकता है। वैज्ञानिकों ने प्रयोग के दौरान मधुमक्खियों को इस कीटनाशक की कम मात्रा दी और फिर उनके शरीर में होने वाले जैविक बदलावों को देखा।

जीन की गतिविधि में बदलाव

इकोटॉक्सिकोलॉजी एंड एनवायर्नमेंटल सेफ्टी नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध में पाया गया कि कीटनाशक के संपर्क में आने के बाद मधुमक्खियों के शरीर में कई जीनों की गतिविधि बदल गई। जीन हमारे शरीर के अंदर वह निर्देश होते हैं जो यह तय करते हैं कि कौन सा कार्य कैसे होगा। सबसे ज्यादा बदलाव मधुमक्खियों के प्रजनन अंगों यानी अंडाशय में देखा गया। इसका मतलब यह हो सकता है कि यह कीटनाशक मधुमक्खियों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

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वैज्ञानिकों ने मधुमक्खियों के ऊतकों को बहुत कम तापमान पर सुरक्षित रखकर उनका आरएनए विश्लेषण किया, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कौन से जीन ज्यादा या कम सक्रिय हुए हैं। इसके साथ ही कंप्यूटर मॉडल की मदद से यह भी समझने की कोशिश की गई कि शरीर के कौन से जैविक काम सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि शोध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली बार जीन स्तर पर बदलाव को वास्तविक असर से जोड़ता है। उनके अनुसार, यह समझना आसान हो गया है कि कीटनाशक कैसे सीधे तौर पर मधुमक्खियों और उनके समूह (कॉलोनी) को प्रभावित कर सकते हैं।

शोध में कहा गया है कि किसानों को फसलों की रक्षा भी करनी होती है और परागण करने वाले कीड़ों को भी बचाना जरूरी है। उनके अनुसार, दोनों के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है ताकि खेती भी सुरक्षित रहे और मधुमक्खियां भी बची रहें।

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कृषि में संतुलन की चुनौती
आज खेती में कीटनाशकों का उपयोग बहुत सामान्य है क्योंकि वे फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को रोकते हैं। लेकिन यही कीटनाशक कई बार लाभकारी कीड़ों के लिए खतरा बन जाते हैं। इस शोध से यह सवाल और मजबूत होता है कि क्या ऐसे तरीके खोजे जा सकते हैं जिससे फसलों की सुरक्षा भी हो और मधुमक्खियां भी सुरक्षित रहें।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर मधुमक्खियों की प्रजनन क्षमता पर असर पड़ा तो समय के साथ उनकी संख्या घट सकती है। इसका सीधा असर फसलों के परागण और उत्पादन पर पड़ सकता है।

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अन्य खतरों से भी जूझ रही हैं मधुमक्खियां

कीटनाशक ही नहीं, मधुमक्खियां कई अन्य समस्याओं का भी सामना कर रही हैं। बढ़ता तापमान, अत्यधिक गर्मी और जलवायु परिवर्तन भी उनके जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। जब कई तरह के तनाव एक साथ आते हैं, तो मधुमक्खियों के लिए जीवित रहना और मुश्किल हो जाता है।

यह नया शोध दिखाता है कि छोटे स्तर पर भी कीटनाशक मधुमक्खियों के शरीर में बड़े जैविक बदलाव ला सकते हैं। यदि इन प्रभावों को समय रहते नहीं समझा गया, तो इसका असर पूरे कृषि तंत्र और खाद्य उत्पादन पर पड़ सकता है। इसलिए वैज्ञानिक अब ऐसे समाधान खोजने पर जोर दे रहे हैं जो खेती को सुरक्षित रखते हुए मधुमक्खियों और अन्य परागण करने वाले कीड़ों की रक्षा भी कर सकें।

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