

नए वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि मोबाइल फोन, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन में इस्तेमाल होने वाले लिक्विड क्रिस्टल मोनोमर (एलसीएम) जैसे रसायन अब समुद्री जीवों तक पहुंच चुके हैं।
शोध में पहली बार डॉल्फिन और पोरपॉइज की चर्बी, मांसपेशियों और यहां तक कि दिमाग में भी इन रसायनों की मौजूदगी पाई गई है, जिससे संकेत मिलता है कि ये ब्लड-ब्रेन बैरियर को भी पार कर सकते हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, ई-कचरे से जुड़े ये रसायन समुद्री खाद्य श्रृंखला के जरिए शीर्ष शिकारी जीवों तक पहुंच रहे हैं और उनके तंत्रिका तंत्र व स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर ई-कचरे के बेहतर प्रबंधन और कड़े नियमों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो इसका असर न केवल समुद्री जीवन बल्कि अंततः मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
हम जिन मोबाइल फोन, लैपटॉप और टीवी का रोज इस्तेमाल करते हैं, उनका अदृश्य जहर अब समुद्री जीवों के शरीर में पहुंच चुका है। वैज्ञानिकों को पहली बार डॉल्फिन और पोरपॉइज के दिमाग में इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन से जुड़े जहरीले रसायन मिले हैं, जिसने ई-कचरे के बढ़ते खतरे को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी है।
इस बारे में किए नए वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि लिक्विड क्रिस्टल मोनोमर (एलसीएम) नाम के रसायन डॉल्फिन और पोरपॉइज जैसे समुद्री जीवों की चर्बी, मांसपेशियों और यहां तक की दिमाग में जमा हो रहे हैं। इससे संकेत मिलता है कि ये रसायन खून और दिमाग के बीच मौजूद सुरक्षा परत (ब्लड-ब्रेन बैरियर) को भी पार कर सकते हैं। गौरतलब है कि एलसीएम नामक यह केमिकल मोबाइल, टीवी और लैपटॉप आदि की स्क्रीन में इस्तेमाल होते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित एसीएस जर्नल एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन और सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर यूहे हे के मुताबिक, “रोजमर्रा के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाले लिक्विड क्रिस्टल मोनोमर सिर्फ प्रदूषण नहीं हैं, बल्कि वे डॉल्फिन और पोरपॉइज के दिमाग में भी जमा हो रहे हैं।“
उन्होंने कहा यह एक चेतावनी है कि महासागरों के स्वास्थ्य और अपनी सुरक्षा के लिए ई-कचरे पर तुरंत कार्रवाई जरूरी है।
स्क्रीन से समुद्र तक पहुंचा जहर
वैज्ञानिकों के मुताबिक लिक्विड क्रिस्टल मोनोमर ऐसे रसायन हैं जो मोबाइल फोन, टीवी या कंप्यूटर की स्क्रीन में रोशनी को नियंत्रित करते हैं, जिससे स्क्रीन पर साफ तस्वीर दिखाई देती है। हालांकि इन उपकरणों के व्यापक इस्तेमाल के कारण ये रसायन घर के भीतर हवा, धूल और गंदे पानी में भी पाए जा चुके हैं।
इसके साथ ही धीरे-धीरे ये समुद्री तटों और महासागर तक पहुंच रहे हैं।
पिछले अध्ययनों में सामने आया है कि कुछ एलसीएम मनुष्यों और जलीय जीवों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। हालांकि अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि ये रसायन समुद्री खाद्य श्रृंखला में कैसे फैलते हैं और क्या ये शीर्ष शिकारी समुद्री जीवों तक पहुंचते हैं या नहीं।
इसका पता लगाने के लिए शोधकर्ता बो लियांग, यूहे हे और उनके साथियों ने 2007 से 2021 के बीच दक्षिण चीन सागर से एकत्र किए नमूनों का विश्लेषण किया। ये नमूने इंडो-पैसिफिक हंपबैक डॉल्फिन और फिनलेस पोरपॉइज के ऊतकों से लिए गए थे। यह क्षेत्र इन संकटग्रस्त समुद्री जीवों का एक महत्वपूर्ण आवास माना जाता है।
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने डॉल्फिन और पोरपॉइज के शरीर के विभिन्न हिस्सों जैसे चर्बी (ब्लबर), मांसपेशियों, जिगर, किडनी और दिमाग के ऊतकों के नमूनों में 62 अलग-अलग तरह के एलसीएम रसायनों की जांच की।
विश्लेषण में सामने आया है कि जांच में पाए गए रसायनों में से चार की मात्रा सबसे अधिक थी। पहले के अध्ययनों में ऐसे ही एलसीएम उन मछलियों और अन्य समुद्री जीवों में भी मिले थे, जिन्हें डॉल्फिन और पोरपॉइज भोजन के रूप में खाते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक इससे संकेत मिलता है कि ये रसायन सीधे पानी से नहीं, बल्कि भोजन के जरिए इनके शरीर में पहुंच रहे हैं।
अध्ययन में इस बात की भी पुष्टि हुई है कि इनमें से ज्यादातर रसायनों का स्रोत टीवी और कंप्यूटर स्क्रीन हैं, जबकि कुछ योगदान स्मार्टफोन का भी है।
हालांकि इन रसायनों की सबसे ज्यादा मात्रा चर्बी वाले ऊतकों (ब्लबर) में पाई गई, जहां अक्सर प्रदूषक जमा हो जाते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनकी थोड़ी मात्रा दूसरे अंगों, खासकर दिमाग में भी देखी गई। इससे संकेत मिलता है कि ये रसायन तंत्रिका तंत्र को नुकसान (न्यूरोटॉक्सिक खतरा) पहुंचा सकते हैं।
कोशिकाओं पर भी दिखा असर
प्रयोगशाला में किए अतिरिक्त परीक्षणों में पाया गया कि कुछ एलसीएम केमिकल डॉल्फिन की कोशिकाओं में डीएनए की मरम्मत और कोशिका विभाजन से जुड़ी जीन की गतिविधि को बदल सकते हैं। यह इस बात का सबूत है कि ये रसायन समुद्री स्तनधारियों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं।
रिसर्च में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि समय के साथ पोरपॉइज की चर्बी (ब्लबर) में एलसीएम की मात्रा बदलती रही है।
जब लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले (एलसीडी स्क्रीन) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा था, तब इन रसायनों का स्तर भी बढ़ा। लेकिन हाल के वर्षों में, जब कंपनियां एलईडी डिस्प्ले की ओर बढ़ी हैं, तो इनकी मात्रा में कुछ कमी देखी गई है।
इसी तरह एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों को डॉल्फिन की सांसों में माइक्रोप्लास्टिक्स की मौजूदगी के साक्ष्य मिले थे। जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि दुनिया भर के करीब-करीब सभी पारिस्थितिकी तंत्रों में मौजूद प्लास्टिक के यह महीन कण अब डॉल्फिन जैसे जीवों के फेफड़ों में भी राह बना रहे हैं।
यह बेहद चिंता का विषय है क्योंकि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सिर्फ महासागरों में ही माइक्रोप्लास्टिक्स के करीब 170 लाख करोड़ टुकड़े मौजूद हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन समुद्री खाद्य श्रृंखला में इलेक्ट्रॉनिक कचरे के बढ़ते खतरे की ओर इशारा करता है। इसलिए ई-कचरे के बेहतर प्रबंधन, सुरक्षित निपटान और कड़े नियमों की तत्काल जरूरत है।
उन्होंने जोर दिया कि जीवों पर एलसीएम प्रदूषण के प्रभावों को लेकर और गहराई से अध्ययन करने की जरूरत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर समय रहते कदम न उठाए गए, तो हमारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से निकलने वाला यह अदृश्य जहर न सिर्फ समुद्री जीवों, बल्कि अंततः मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है।