भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के डीएनए में मिली पुरानी और अनोखी आनुवंशिक विविधता

एशियाई भेड़ियों के डीएनए अध्ययन में बड़ा खुलासा: भारत, तिब्बत और दक्षिण एशिया में अनोखी पुरानी आनुवंशिक विविधता और संरक्षण की नई चिंता सामने आई
भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के डीएनए में 1,00,000 वर्षों से अधिक पुरानी अलग पहचान और सीमित आपसी मिश्रण पाया गया।
भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के डीएनए में 1,00,000 वर्षों से अधिक पुरानी अलग पहचान और सीमित आपसी मिश्रण पाया गया।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • राइस यूनिवर्सिटी के शोध में एशिया के भेड़ियों की तीन प्राचीन आनुवंशिक वंश-रेखाएं सामने आई, जो लाखों वर्षों से अलग रहीं।

  • भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के डीएनए में 1,00,000 वर्षों से अधिक पुरानी अलग पहचान और सीमित आपसी मिश्रण पाया गया।

  • पाकिस्तान को भेड़ियों की वैश्विक आनुवंशिक विविधता का प्रमुख केंद्र बताया गया, जहां तीनों प्रमुख भेड़िया समूह मिलते हैं।

  • अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि दक्षिण एशिया भेड़ियों की जैव विविधता का महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसमें अनोखा विकास का इतिहास छिपा है।

  • भारतीय भेड़ियों की लगभग 3000 की छोटी आबादी को खतरे में माना गया, संरक्षण के लिए नई रणनीति आवश्यक बताई गई।

अमेरिका की राइस यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक और उनकी अंतरराष्ट्रीय शोध टीम ने एशिया के भेड़ियों पर एक अहम अध्ययन किया है। इस शोध से पता चला है कि भारत, तिब्बत और दक्षिण एशिया के भेड़ियों में बहुत पुरानी और अनोखी आनुवंशिक विविधता मौजूद है। यह विविधता दुनिया के दूसरे हिस्सों के भेड़ियों से काफी अलग है।

भेड़िए आमतौर पर बहुत दूर-दूर तक घूमने वाले जानवर माने जाते हैं। वे कई सौ किलोमीटर तक यात्रा कर सकते हैं और दूसरे समूहों के साथ मिलकर रहते हैं। इसलिए वैज्ञानिक पहले मानते थे कि दुनिया भर के भेड़ियों का डीएनए काफी मिलता-जुलता होगा। लेकिन इस नए अध्ययन ने यह सोच बदल दी है।

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एशिया में छुपी तीन बड़ी वंश-रेखाएं

कम्युनिकेशन्स बायोलॉजी नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध में पाया गया कि एशिया में भेड़ियों की तीन मुख्य वंश-रेखाएं (लाइनिज) हैं। ये हैं भारतीय भेड़िया, तिब्बती भेड़िया और उत्तरी क्षेत्रों का होलारक्टिक भेड़िया। ये तीनों समूह बहुत लंबे समय से एक-दूसरे से अलग रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के समूह पिछले लगभग एक लाख साल से भी अधिक समय से अलग-अलग विकसित हो रहे हैं। इतने लंबे समय तक अलग रहने के कारण इनके डीएनए में बहुत अंतर आ गया है। यह अंतर इतना स्पष्ट है कि इन्हें सिर्फ एक ही प्रजाति का सामान्य हिस्सा नहीं माना जा सकता।

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भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के डीएनए में 1,00,000 वर्षों से अधिक पुरानी अलग पहचान और सीमित आपसी मिश्रण पाया गया।

वैज्ञानिकों का कहना है कि भले ही भेड़ियों की यात्रा लंबी होती है, लेकिन दक्षिण एशिया में इन समूहों के बीच बहुत कम मेल-जोल हुआ है। यही कारण है कि यहां के भेड़ियों की पहचान अलग बनी रही।

पाकिस्तान बना विविधता का केंद्र

इस अध्ययन में यह भी पता चला कि पाकिस्तान दुनिया का एक बहुत अहम क्षेत्र है जहां तीनों प्रकार के भेड़ियों का मिलन होता है। यहां भारतीय, तिब्बती और होलारक्टिक भेड़ियों के डीएनए के संकेत एक साथ पाए जाते हैं।

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इसी वजह से दक्षिण एशिया, खासकर पाकिस्तान और उसके आसपास के क्षेत्र, भेड़ियों की आनुवंशिक विविधता का एक बड़ा केंद्र बन गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह क्षेत्र भेड़ियों के विकास के इतिहास को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

जलवायु परिवर्तन और इतिहास का असर

शोधकर्ताओं का मानना है कि हजारों साल पहले हुए जलवायु परिवर्तन, जैसे हिम युग और प्राकृतिक आवास में बदलाव, ने इन भेड़ियों को अलग-अलग क्षेत्रों में बांट दिया होगा। समय के साथ ये समूह एक-दूसरे से अलग होते गए और उनकी आनुवंशिक पहचान भी अलग बनती चली गई।

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भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के डीएनए में 1,00,000 वर्षों से अधिक पुरानी अलग पहचान और सीमित आपसी मिश्रण पाया गया।

हालांकि अब कुछ जगहों पर इनके रहने के क्षेत्र पास-पास आ गए हैं, फिर भी उनके बीच की आनुवंशिक दूरी बनी हुई है। यह बात वैज्ञानिकों के लिए बहुत दिलचस्प है क्योंकि यह दिखाती है कि प्रकृति में अलगाव कितनी गहराई से असर डाल सकता है।

संरक्षण के लिए चिंता

इस शोध का सबसे बड़ा संदेश संरक्षण से जुड़ा है। आमतौर पर ग्रे वुल्फ यानी भेड़िये को दुनिया भर में एक स्थिर प्रजाति माना जाता है, लेकिन इस अध्ययन के बाद यह साफ हुआ कि भारतीय और तिब्बती भेड़ियों को अलग से देखना जरूरी है।

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भारतीय और तिब्बती भेड़ियों के डीएनए में 1,00,000 वर्षों से अधिक पुरानी अलग पहचान और सीमित आपसी मिश्रण पाया गया।

भारतीय भेड़ियों की संख्या बहुत कम है, लगभग 3000 के आसपास मानी जाती है। इतनी छोटी आबादी के कारण इनके विलुप्त होने का खतरा भी अधिक है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने भारतीय और तिब्बती भेड़ियों को “संरक्षित या खतरे में” की श्रेणी में रखा है।

डीएनए से मिली नई समझ

वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल डीएनए अध्ययन के माध्यम से ही यह समझ पाया जा सका कि ये भेड़िये अलग और अनोखे समूह हैं। अगर आनुवंशिक शोध न होता, तो इन्हें सामान्य ग्रे वुल्फ का ही हिस्सा माना जाता रहता।

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यह शोध यह भी बताता है कि एशिया के दक्षिणी क्षेत्र भेड़ियों की विविधता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं और इन्हें बचाना जरूरी है। अगर इन आबादियों को खो दिया गया, तो भेड़ियों के विकास का बहुत बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए खत्म हो सकता है।

यह नया शोध हमें यह सिखाता है कि प्रकृति में दिखने वाली समानता के पीछे भी बहुत गहरी विविधता छुपी हो सकती है। भारत और उसके आसपास के भेड़िये सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि लाखों साल के विकास और इतिहास की जीवित कहानी हैं। इनकी रक्षा करना केवल वन्यजीव संरक्षण नहीं, बल्कि पृथ्वी की जैव विविधता को बचाने का एक महत्वपूर्ण कदम है।

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