सिद्धपीठ देवी मंदिर तालाब विवाद: एनजीटी के आदेश पर प्रदूषण बोर्ड जांचेगा प्रशासनिक दावों की जमीनी हकीकत

गाजियाबाद के डासना में कूड़े और गंदे पानी से दम तोड़ते ऐतिहासिक तालाब पर एनजीटी की सख्ती बढ़ी है, अब प्रदूषण बोर्ड जांचेगा कि नगर पालिका परिषद द्वारा संरक्षण के दावे जमीन पर कितने सच हैं
फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • गाजियाबाद के डासना स्थित ऐतिहासिक सिद्धपीठ देवी मंदिर तालाब की बदहाली अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सख्त निगरानी में आ गई है।

  • कूड़े के ढेर और गंदे पानी से प्रदूषित हो चुके इस तालाब को लेकर बढ़ती जनचिंता के बीच एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को निर्देश दिया है कि वह नगर पालिका परिषद द्वारा किए जा रहे संरक्षण कार्यों की जमीनी सच्चाई की जांच करे।

  • स्थानीय लोगों का आरोप है कि कभी गांव की पहचान और जीवनरेखा रहा यह तालाब आज प्रशासनिक लापरवाही और अनदेखी का शिकार बन चुका है। तालाब से उठती बदबू, दूषित पानी और फैलती गंदगी आसपास के लोगों के स्वास्थ्य, खेती और पर्यावरण पर गंभीर असर डाल रही है।

  • ट्रिब्यूनल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला वन अधिकारी को मानसून के दौरान तालाब के आसपास पौधारोपण और अगले पांच वर्षों तक उनकी देखरेख सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।

  • अब 4 अगस्त 2026 की अगली सुनवाई पर सबकी निगाहें टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि तालाब संरक्षण के दावे केवल कागजों तक सीमित हैं या वास्तव में इस ऐतिहासिक जलाशय को बचाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

गाजियाबाद के डासना गांव स्थित ऐतिहासिक सिद्धपीठ देवी मंदिर के सामने बने प्राचीन तालाब की बदहाल हालत पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। कूड़े के ढेर और गंदे पानी से प्रदूषित हो चुके इस तालाब को लेकर लोगों की चिंता बढ़ती जा रही थी। आसपास रहने वाले परिवारों को बदबू, बीमारियों और खेती को नुकसान जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

इसी मामले में 22 मई 2026 को सुनवाई करते हुए एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को निर्देश दिया है कि वह डासना नगर पालिका परिषद द्वारा तालाब संरक्षण के लिए उठाए कदमों के दावों की जमीनी पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट अदालत में सौंपे।

दरअसल, यह तालाब कूड़े-कचरे और गंदे पानी के कारण पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। इससे न सिर्फ स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि आसपास के खेतों और फसलों को भी भारी नुकसान हो रहा है।

गौरतलब है कि इससे पहले, 21 मई 2026 को डासना नगर पालिका परिषद ने अपनी अनुपालन रिपोर्ट ट्रिब्यूनल में पेश की थी। हालांकि मामले में आवेदक अफसर अली ने इस रिपोर्ट पर आपत्तियां और जवाब दाखिल करने के लिए अदालत से समय मांगा है।

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इसके बाद एनजीटी ने डासना नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई, से कम से कम एक दिन पहले नई रिपोर्ट दाखिल की जाए। इस मामले में अगली सुनवाई  4 अगस्त 2026 को होनी है।

कूड़े के ढेर में तब्दील हुआ ऐतिहासिक तालाब

मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने गाजियाबाद के जिला वन अधिकारी (डीएफओ) को भी तालाब के चारों ओर आगामी मानसून के दौरान पौधारोपण करने का आदेश दिया है। साथ ही यह सुनिश्चित करने को कहा है कि लगाए गए पौधों की अगले पांच वर्षों तक ठीक से देखभाल और संरक्षण हो।

इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट भी ट्रिब्यूनल में दाखिल करनी होगी।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि कभी गांव की पहचान रहा यह तालाब अब गंदगी और लापरवाही का शिकार बन चुका है। तालाब में जमा कचरा और दूषित पानी न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि खेतों और फसलों पर भी इसका असर पड़ रहा है।

कभी गांव की जीवनरेखा रहा यह तालाब आज प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बन चुका है। ऐसे में एनजीटी की सख्ती इस जलाशय के पुनर्जीवन की आखिरी उम्मीद बनकर उभरी है।

अब सबकी नजरें 4 अगस्त की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि तालाब बचाने के दावे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं या वास्तव में जमीन पर बदलाव की शुरुआत हुई है।

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