

गाजियाबाद में प्रदूषण नियंत्रण नियमों की अनदेखी करते हुए कई होटल और रेस्तरां बिना पर्यावरणीय अनुमति के चल रहे हैं।
यूपीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, 165 में से केवल 90 प्रतिष्ठानों के पास वैध सीटीओ है। 52 इकाइयां अदालत में लंबित मामलों के कारण बिना अनुमति के चल रही हैं, जबकि 13 को डिफॉल्टर घोषित कर बंद कर दिया गया है।
गाजियाबाद में प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े नियमों की खुलेआम अनदेखी का मामला सामने आया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में जानकारी दी है कि जिले के कई होटल, रेस्तरां और मॉल जरूरी पर्यावरणीय अनुमति के बिना लंबे समय से चल रहे हैं।
19 जनवरी 2026 को दाखिल इस रिपोर्ट के मुताबिक, जल अधिनियम 1974 और वायु अधिनियम 1981 के तहत जरूरी ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (सीटीओ) के बिना बड़ी संख्या में व्यावसायिक प्रतिष्ठान काम कर रहे थे।
प्राधिकरण की 16 सितंबर 2025 की रिपोर्ट में बताया गया था कि जिले में कुल 165 प्रतिष्ठानों की पहचान की गई थी। इनमें से केवल 84 इकाइयों के पास जल अधिनियम 1974 और वायु अधिनियम 1981 के तहत वैध सीटीओ था। दो इकाइयों ने नई अनुमति हासिल की थी, जबकि 17 इकाइयां पूरी तरह नियमों का उल्लंघन करते हुए बिना अनुमति के चल रही थीं।
वहीं छह इकाइयों के खिलाफ जारी बंद करने के आदेश या कारण बताओ नोटिस वापस ले लिए गए हैं।
अब दाखिल ताजा स्थिति रिपोर्ट में कुछ सुधार जरूर दिखता है, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। फिलहाल 90 इकाइयों के पास वैध सीटीओ है और छह इकाइयों ने हाल में नई अनुमति हासिल की है। हालांकि अब भी 52 इकाइयां अदालत में लंबित मामलों के कारण बिना सीटीओ के श्रेणी में बनी हुई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 13 प्रतिष्ठान ऐसे हैं जिनके पास न तो जल अधिनियम और न ही के वायु अधिनियम के तहत अनुमति है। इन्हें ‘डिफॉल्टर’ घोषित करते हुए फिलहाल बंद कर दिया गया है और इनकी बिजली आपूर्ति भी काट दी गई है। छह इकाइयां स्थाई रूप से बंद या खाली पाई गई हैं, जबकि केवल दो मामलों में बंद करने या नोटिस वापस लिए गए हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक होटल, रेस्तरां और मॉल जैसे प्रतिष्ठान बड़ी मात्रा में गंदा पानी, कचरा और धुआं पैदा करते हैं। बिना निगरानी और अनुमति के इनका संचालन सीधे तौर पर हवा और पानी की गुणवत्ता पर गंभीर असर डाल सकता है।
जमशेदपुर की जीवनरेखा पर संकट: सीवेज, अतिक्रमण और लापरवाही पर एनजीटी सख्त
जमशेदपुर के सुंदरनगर से निकलकर बिरसानगर होते हुए स्वर्णरेखा नदी में मिलने वाले एक अहम सरकारी नाले पर अतिक्रमण, गंदे पानी और कचरे के बढ़ते संकट को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है।
एनजीटी की पूर्वी पीठ ने 17 जनवरी 2026 को झारखंड सरकार, पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त और अन्य संबंधित अधिकारियों को पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार के लिए अपने संवैधानिक और कानूनी दायित्व निभाने का निर्देश दिया है। ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के पुराने आदेशों के अनुसार, नाले में गिर रहे सीवेज को सही तरीके से रोकने और उसके उपचार की व्यवस्था करने को कहा है।
पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त ने 10 नवंबर 2025 को दाखिल अपने हलफनामे में बताया कि नाले की जमीन पर हुए अतिक्रमण की वास्तविक स्थिति की माप बारिश के बाद ही संभव है। इसके लिए और समय मांगा गया है ताकि सही तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार की जा सके।
सीवेज ट्रीटमेंट जरूरी, फिर भी नाले में गिर रहा गंदा पानी
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि नाले के दोनों किनारों पर बसे मोहल्लों से निकलने वाले गंदे पानी के उपचार के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बेहद जरूरी हैं। इसके बावजूद टाटा मोटर्स कॉलोनी से उपचार के बाद सीवेज इसी नाले में छोड़ा जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि अब तक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की ओर से कोई नई रिपोर्ट भी दाखिल नहीं की गई है।
एक महीने की मोहलत, नहीं तो जुर्माना तय
एनजीटी ने फैक्ट फाइंडिंग कमेटी को एक महीने के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का सख्त आदेश दिया है। साथ ही, नोडल अधिकारी की भूमिका निभा रहे पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि रिपोर्ट समय पर आए।
ट्रिब्यूनल ने चेतावनी दी है कि अगर आदेश का पालन नहीं हुआ तो उपायुक्त पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
नाला नहीं, शहर की जीवनरेखा
यह मामला सुंदरनगर से निकलने वाले उस प्राकृतिक नाले से जुड़ा है, जो बिरसानगर से होकर स्वर्णरेखा नदी में मिलता है। यह नाला सिर्फ पानी की निकासी का रास्ता नहीं, बल्कि पूरे इलाके की प्राकृतिक जल-निकासी और पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ भी है।
शिकायतों में आरोप लगाया गया है कि इस नाले में बिना ट्रीटमेंट के घरेलू सीवेज और ठोस कचरा लगातार डाला जा रहा है। इससे न सिर्फ पानी बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है, बल्कि आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की सेहत और पर्यावरण दोनों खतरे में हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन समय रहते चेतता है या जमशेदपुर की यह जीवनरेखा यूं ही गंदगी और अतिक्रमण की भेंट चढ़ती रहती है।