तेलंगाना: बांधम कुंटा के बफर जोन से हटेंगे अतिक्रमण, एनजीटी ने दिए सख्त निर्देश

इस मामले में गठित संयुक्त समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सड़क के किनारे बहने वाली प्राकृतिक जलधारा को बाधित कर दिया गया था। इसके कारण बारिश के पानी का बहाव दूसरी दिशा में मुड़ गया और कृषि भूमि में पानी जमा होने लगा।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • तेलंगाना से छत्तीसगढ़ तक एनजीटी के दो आदेशों ने साफ कर दिया है कि विकास या निर्माण की आड़ में जलस्रोतों और ग्रामीणों की सेहत से समझौता नहीं किया जा सकता।

  • महबूबाबाद के बांधम कुंटा में अतिक्रमण के कारण प्राकृतिक जलधारा का रास्ता बाधित हुआ और बारिश का पानी खेतों में भरने लगा।

  • संयुक्त समिति की जांच में बफर जोन के भीतर परिसर की दीवार और जलप्रवाह में रुकावट की पुष्टि के बाद एनजीटी ने एफटीएल और बफर जोन को सुरक्षित करने तथा कानून के मुताबिक अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए।

  • वहीं, धमतरी के मंदरौद गांव में घनी आबादी के बीच चल रही राइस मिल को लेकर ग्रामीणों ने वायु और जल प्रदूषण की शिकायत की है।

  • मिल के पास स्कूल, सार्वजनिक तालाब और महज 200 मीटर दूर गांव की पेयजल टंकी होने से मामला और गंभीर हो गया है। एनजीटी ने तथ्यों की जांच के लिए दो सदस्यीय समिति गठित की है।

  • दोनों मामलों का संदेश एक है—प्राकृतिक संसाधनों से खिलवाड़ का असर सिर्फ पर्यावरण पर नहीं, बल्कि खेती, पानी, स्वास्थ्य और ग्रामीण जीवन पर पड़ता है।

तेलंगाना के महबूबाबाद जिले में गर्मियों के लिए पानी संजोने वाले बांधम कुंटा की जमीन पर अतिक्रमण ने प्राकृतिक जलप्रवाह का रास्ता रोक दिया। इससे आसपास के खेतों में पानी भरने की स्थिति पैदा हो गई।

मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की दक्षिणी पीठ ने सख्ती दिखाते हुए जलाशय के बफर जोन और फुल टैंक लेवल (एफटीएल) के भीतर हुए अतिक्रमण को कानूनी दायरे में रहते हुए हटाने के निर्देश दिए हैं।

एनजीटी ने 3 सितंबर 2026 को दिए अपने आदेश में कहा कि बांधम कुंटा के निर्धारित बफर जोन को बहाल और सुरक्षित किया जाए। पीठ ने पाया कि ऊपरी जलाशय से अतिरिक्त पानी लेकर आने वाली प्राकृतिक जलधारा के रास्ते में एक परिसर की दीवार खड़ी कर दी गई। इससे पानी का प्राकृतिक बहाव बदल गया और वो आसपास के खेतों में भरने लगा।

एनजीटी ने यह भी माना कि बांधम कुंटा सिंचाई एवं सीएडी विभाग के अधिसूचित टैंकों में शामिल है। इसके फुल टैंक लेवल (एफटीएल) का संयुक्त सर्वे सिंचाई और राजस्व विभाग के अधिकारियों ने किया है।

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दीवार ने रोका पानी का रास्ता, खेत हुए जलमग्न

गौरतलब है कि यह मामला दोर्नाकल बंधम चेरुवु अयाकट्टू के किसानों की ओर से उठाया गया था। किसानों ने आरोप लगाया कि बांधम कुंटा की ‘चेरुवु शिकम’ भूमि के करीब 1.1950 एकड़ हिस्से पर कुछ रसूखदार लोगों ने कब्जा कर लिया है और वहां परिसर की दीवार (कंपाउंड वॉल) बनाई जा रही है।

किसानों के मुताबिक, इस दीवार ने उनके इस्तेमाल वाले रास्ते को भी बाधित कर दिया है और बारिश तथा बाढ़ के पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट पैदा कर दी। इसका सीधा असर खेतों पर पड़ा और उनके जलमग्न होने का खतरा बढ़ गया है।

संयुक्त समिति की जांच में भी सामने आया अतिक्रमण

मामले की जांच के लिए गठित संयुक्त समिति ने 5 जुलाई 2024 को दोर्नाकल बंधम चेरुवु का निरीक्षण किया और 27 जुलाई 2024 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी।  इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सड़क के किनारे बहने वाली प्राकृतिक जलधारा को बाधित कर दिया गया था। इसके कारण बारिश के पानी का बहाव दूसरी दिशा में मुड़ गया और कृषि भूमि में पानी जमा होने लगा।

समिति ने पाया कि ऊपरी टैंक से अतिरिक्त पानी लाने वाली प्राकृतिक जलधारा के ऊपर बफर जोन के भीतर परिसर की दीवार बनाई गई थी। इससे पानी का स्वाभाविक रास्ता बाधित हुआ और आसपास के खेतों में पानी भर गया।

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समिति ने यह भी दर्ज किया कि टैंक के इनलेट को नुकसान पहुंचाया गया था। हालांकि बाद में नाले का रास्ता बदलकर इनलेट ड्रेन को बहाल कर दिया गया।

एनजीटी ने कहा, कानून के मुताबिक हटाएं अतिक्रमण

ऐसे में संयुक्त समिति की सिफारिश और महबूबाबाद के जिला कलेक्टर की रिपोर्ट को देखते हुए एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे एफटीएल के भीतर आने वाले अतिक्रमण को कानून और उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए हटाने के लिए जरूरी कदम उठाएं।

देखा जाए तो यह आदेश सिर्फ एक दीवार हटाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सवाल उस जलाशय के अस्तित्व और उसके प्राकृतिक जलप्रवाह को बचाने का भी है, जिस पर आसपास की खेती और ग्रामीण जीवन निर्भर करता है।

पानी के रास्ते पर खड़ी की गई एक दीवार ने दिखा दिया कि जलस्रोतों की जमीन पर छोटा-सा अतिक्रमण भी बारिश के समय पूरे इलाके के लिए बड़ी मुसीबत बन सकता है।

छत्तीसगढ़: धमतरी में राइस मिल बनी ग्रामीणों के लिए आफत, एनजीटी ने प्रदूषण की जांच के लिए गठित की समिति

छत्तीसगढ़ में धमतरी जिले के मंदरौद गांव में घनी आबादी के बीच चल रही एक राइस मिल को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। ग्रामीणों ने मिल से वायु और जल प्रदूषण होने की शिकायत की है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने 3 सितंबर 2026 को दो सदस्यीय समिति गठित करने का निर्देश दिया। समिति मौके का निरीक्षण कर, इस मामले में जुड़े तथ्यों और कार्रवाई पर अपनी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करेगी।

यह मामला कुरुद तहसील के मंदरौद में चल रही आनंद राइस मिल से जुड़ा है। शिकायत में कहा गया है कि मिल घनी आबादी के बीच स्थित है और इसके ठीक आसपास ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी महत्वपूर्ण जगहें मौजूद हैं।

मिल के बिल्कुल पास ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय और ग्रामीणों द्वारा हर दिन इस्तेमाल किया जाने वाला सार्वजनिक तालाब है।

स्कूल, तालाब और पेयजल आपूर्ति के ठीक बगल में जहर घोलती मिल

सबसे बड़ी चिंता गांव के पेयजल को लेकर जताई गई है। शिकायत के अनुसार, मिल से महज 200 मीटर की दूरी पर गांव की मुख्य ओवरहेड पानी की टंकी स्थित है, जिससे पूरे गांव में पेयजल की आपूर्ति होती है। ऐसे में मिल से निकलने वाले धूल-कण और अन्य प्रदूषकों को लेकर ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है।

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आवेदन में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (सीईसीबी) की 7 अगस्त 2026 की निरीक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि राइस मिल क्षेत्र में वायु और जल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार पाई गई है।

आवेदन में स्वास्थ्य विभाग के एक आधिकारिक पत्र का भी उल्लेख किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि मिल से निकलने वाले प्रदूषकों के कारण क्षेत्र में 25 नवजात शिशुओं का वजन गंभीर रूप से कम पाया गया। यह दावा अब एनजीटी के सामने जांच के दायरे में है और समिति की रिपोर्ट से इसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।

जिलाधिकारी समेत अधिकारियों को नोटिस

एनजीटी ने मामले में जिलाधिकारी, कुरुद जनपद पंचायत के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल और आनंद राइस मिल के मालिक समेत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

अब दो सदस्यीय समिति मौके पर जाकर मिल की स्थिति, आसपास की आबादी, स्कूल, तालाब और पेयजल व्यवस्था पर उसके संभावित प्रभाव की जांच करेगी। समिति की तथ्यात्मक रिपोर्ट यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगी कि मिल से ग्रामीणों के स्वास्थ्य, पानी और पर्यावरण पर कितना असर पड़ रहा है और इसे रोकने के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

एक गांव में स्कूल के पास बच्चों की पढ़ाई, तालाब में ग्रामीणों की रोजमर्रा की जरूरतें और कुछ ही दूरी पर पूरे गांव का पेयजल स्रोत, इन सबके बीच प्रदूषण का सवाल केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि लोगों के सुरक्षित जीवन और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य का भी सवाल बन गया है।

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