भूजल संकट पर एनजीटी सख्त, सीजीडब्ल्यूए की रिपोर्ट को बताया ‘अस्पष्ट और अधूरी’

जलवायु संकट के कारण भूजल के तेजी से गिरते स्तर और बढ़ते रासायनिक प्रदूषण के बीच एनजीटी ने प्राधिकरण से विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है
भारत जैसे देश अपनी कृषि, निर्माण, ऊर्जा उत्पादन जैसी कई जरूरतों को पूरा करने के लिए भूजल पर निर्भर हैं; फोटो: आईस्टॉक
भारत जैसे देश अपनी कृषि, निर्माण, ऊर्जा उत्पादन जैसी कई जरूरतों को पूरा करने के लिए भूजल पर निर्भर हैं; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की रिपोर्ट को अधूरी और अस्पष्ट बताते हुए नाराजगी जताई है।

  • रिपोर्ट में भूजल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों की जानकारी नहीं दी गई है। एनजीटी ने सीजीडब्ल्यूए को 2025 तक स्पष्ट जानकारी देने का निर्देश दिया है।

  • एनजीटी ने भूजल गुणवत्ता पर चिंता जताते हुए 2024 की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें बताया गया है कि हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों के भूजल में लवणता, फ्लोराइड जैसे अलग-अलग केमिकल और भारी धातुओं (हैवी मेटल) की मात्रा बढ़ रही है।

देश में भूजल के तेजी से गिरते स्तर को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) की रिपोर्ट पर कड़ी नाराजगी जताई है। एनजीटी ने 30 जनवरी 2026 को कहा कि भारत में भूजल की स्थिति पर दाखिल की गई रिपोर्ट अधूरी और अस्पष्ट है तथा इसमें मांगी गई महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई गई हैं।

अधिकरण ने कहा कि रिपोर्ट में यह तक स्पष्ट नहीं किया गया कि देश के किन जिलों और राज्यों में कितने क्षेत्र अत्यधिक दोहन (ओवर-एक्सप्लॉइटेड) की श्रेणी में आते हैं। रिपोर्ट में न तो इकाइयों का उल्लेख है और न ही राज्यों के हिसाब से जिलेवार विवरण दिया गया है।

अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों में विकास गतिविधियों के मानदंड गायब

एनजीटी ने यह भी पाया कि भूजल के संकट से जूझ रहे इलाकों में विकास परियोजनाओं या बुनियादी ढांचे को अनुमति देने के लिए क्या मानदंड अपनाए जाते हैं, इस पर भी रिपोर्ट पूरी तरह मौन है।

जब इस बारे में पूछा गया तो सीजीडब्ल्यूए की ओर से बताया गया कि मानदंड तय करने और अनुमति देने का कार्य राज्य स्तरीय भूजल नियामक संस्थाएं करती हैं। दूसरी जानकारी के बारे में भी यही स्थिति है। हालांकि अधिकरण ने सवाल उठाया कि जब अधिकांश राज्यों ने अब तक ऐसी नियामक संस्थाएं बनाई ही नहीं हैं, तो अनुमति प्रक्रिया कैसे लागू हो रही है?

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ज्यादातर राज्यों में नियामक संस्थाएं बनी ही नहीं

जब स्टेट लेवल ग्राउंड वॉटर रेगुलेटरी बॉडीज के गठन के बारे में पूछा गया, तो बताया गया कि कुछ ही राज्यों ने इनका गठन किया गया है, जबकि अधिकांश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यह प्रक्रिया अभी तक लंबित है। सीजीडब्ल्यूए के वकील भी इन संस्थाओं के कर्मचारियों, कार्यप्रणाली और जिम्मेदारियों पर स्पष्ट जानकारी नहीं दे सके।

2020 की अधिसूचना लागू होने पर भी सवाल

संकट वाले इलाकों में भूजल दोहन को नियमित करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में सीजीडब्ल्यूए ने बताया कि 24 सितंबर 2020 की अधिसूचना के तहत कृषि, औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में भूजल दोहन को नियंत्रित किया जाता है।

लेकिन एनजीटी ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि व्यावसायिक उपयोग के लिए ऑडिट रिपोर्ट प्रकाशित होती हैं या नहीं। साथ ही यह भी साफ नहीं है कि समय-समय पर एनओसी जारी होती है या नहीं। क्योंकि कई राज्यों ने रेगुलेटरी एजेंसियां ​​नहीं बनाई हैं, इसलिए यह साफ नहीं है कि उस नोटिफिकेशन के नियम लागू किए गए हैं या नहीं।

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यह भी सामने नहीं आया है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कितना पर्यावरणीय जुर्माना लगाया गया। सीजीडब्ल्यूए यह भी नहीं बता सका कि अब तक राज्य स्तर पर कितनी पर्यावरण क्षतिपूर्ति या मुआवजे की मांग की गई है।

हरियाणा से लेकर पश्चिमी यूपी तक बढ़ रहा रासायनिक प्रदूषण

एनजीटी ने भूजल गुणवत्ता पर चिंता जताते हुए 2024 की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें बताया गया है कि हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे अत्यधिक दोहन वाले क्षेत्रों के भूजल में लवणता, फ्लोराइड जैसे अलग-अलग केमिकल और भारी धातुओं (हैवी मेटल) की मात्रा बढ़ रही है।

भूजल संकट की गंभीरता को देखते हुए, जिसे जलवायु परिवर्तन और भी बढ़ा रहा है, एनजीटी ने सीजीडब्ल्यूए को निर्देश दिया है कि वह 28 अप्रैल, 2025 के आदेश के तहत पूछे गए सभी बिंदुओं पर स्पष्ट और विस्तृत जानकारी दे। सीजीडब्ल्यूए से राज्य/केंद्रशासित स्तर पर नियामक संस्थाओं के गठन की समयसीमा के बारे में जानकारी मांगी गई है।

इसके साथ ही लगाए गए पर्यावरणीय मुआवजे और दंड का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। यह रिपोर्ट अगली सुनवाई से पहले, यानी 23 अप्रैल 2026 तक दाखिल करनी होगी।

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गौरतलब है कि हिंदुस्तान टाइम्स में 26 अक्टूबर 2023 को प्रकाशित एक खबर के आधार इस मामले में एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लिया है। खबर में संयुक्त राष्ट्र के अनुमान का हवाला देते हुए कहा गया था कि भारत के इंडो-गंगा क्षेत्र के कई हिस्सों में भूजल का स्तर तेजी से गिर रहा है और 2025 तक स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।

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