खाली हो रहा पानी का प्राकृतिक ‘बैंक खाता’, 35 वर्षों के सबसे सूखे वर्षों में रहा 2025 में नदी प्रवाह: डब्ल्यूएमओ

रिपोर्ट का दूसरा पहलू भी चिंता बढ़ाता है, एशिया और अफ्रीका जलवायु और जल संबंधी आपदाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे, जहां पिछले पांच वर्षों में दुनिया की आधी से ज्यादा ऐसी घटनाएं और 80 फीसदी से अधिक मौतें दर्ज हुई हैं।
बनारस के एक घाट पर जीवनदायनी गंगा; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • दुनिया के प्राकृतिक जल भंडार लगातार खाली हो रहे हैं और जल चक्र पहले से कहीं अधिक अस्थिर होता जा रहा है।

  • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल वाटर रिसोर्सेज 2025’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 वैश्विक स्तर पर नदी प्रवाह के लिहाज से पिछले 35 वर्षों के सबसे सूखे वर्षों में से एक रहा। इस दौरान दुनिया के करीब 36 फीसदी नदी बेसिन क्षेत्र में सामान्य से कम प्रवाह दर्ज हुआ।

  • लगातार सातवें साल सामान्य जल प्रवाह वाले नदी बेसिन अल्पमत में रहे—जबकि 1991-2020 में औसतन करीब 46 फीसदी बेसिन सामान्य स्थिति में रहते थे।

  • रिपोर्ट के मुताबिक, धरती पर जमा कुल स्थलीय जल भंडारण में 2014-16 के बाद से लगातार गिरावट जारी है। भूजल भी दबाव में है और 2025 में दुनिया भर में निगरानी किए गए करीब दो-तिहाई कुएं ऐतिहासिक सामान्य स्थिति से बाहर रहे। उत्तर-पश्चिमी भारत समेत कई क्षेत्रों में लगातार भूजल कमी दर्ज की गई।

  • ग्लेशियरों की स्थिति भी चिंता बढ़ाती है। 2025 लगातार चौथा साल रहा जब दुनिया के सभी प्रमुख ग्लेशियर क्षेत्रों में बर्फ का नुकसान हुआ। 2023-25 के दौरान ग्लेशियरों ने करीब 1,400 गीगाटन पानी के बराबर बर्फ खोई , जो करीब 56 करोड़ ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भरने के बराबर है।

  • एशिया के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में निगरानी किए गए सभी 23 ग्लेशियरों ने 2025 में बर्फ खोई।

  • इस संकट का सबसे भारी मानवीय असर एशिया और अफ्रीका में दिखाई दे रहा है। पिछले पांच वर्षों में दुनिया की कम से कम आधी जल संबंधी चरम घटनाएं और 80 फीसदी से अधिक दर्ज मौतें इन्हीं दो महाद्वीपों में हुईं। कहीं लंबे सूखे ने खेत और जलस्रोत सुखाए, तो कहीं बाढ़ ने घर और आजीविका बहा दी।

  • डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है, जल संकट सिर्फ पानी की कमी का संकट नहीं है, बल्कि पानी के गलत समय और गलत जगह पर उपलब्ध होने का भी संकट है। ऐसे में जल संसाधनों की निगरानी, साझा डेटा और समय पर चेतावनी प्रणाली आने वाले वर्षों में जीवन और आजीविका बचाने के लिए और महत्वपूर्ण होंगी।

दुनिया में पानी की कमी अब महज सूखे की कहानी नहीं रह गई। कहीं नदियां सूख रही हैं, कहीं अचानक इतनी बारिश हो रही है कि बाढ़ सब कुछ बहा ले जा रही है। कहीं भूजल लगातार रसातल में जा रहा है तो कहीं ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने अपनी नई रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल वाटर रिसोर्सेज 2025’ में खुलासा किया है कि पृथ्वी का जल चक्र पहले की तुलना में कहीं अधिक अस्थिर और अनिश्चित हो गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक 2025 वैश्विक स्तर पर नदियों के प्रवाह के लिहाज से पिछले 35 वर्षों के सबसे सूखे वर्षों में से एक रहा। इस दौरान दुनिया के करीब 36 फीसदी नदी बेसिन क्षेत्रों में सामान्य से कम प्रवाह दर्ज किया गया।

चिंता की बात यह है कि लगातार सातवें साल सामान्य प्रवाह वाले नदी बेसिनों की संख्या बेहद कम रही है। रुझान दर्शाते हैं कि 1991-2020 के औसत में जहां करीब 46 फीसदी बेसिन सामान्य स्थिति में रहते थे, वहीं 2025 में यह हिस्सेदारी घटकर महज 34 से 38 फीसदी के बीच रही।

ऐसा ही कुछ पावन गंगा के साथ भी देखा गया है। एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि गंगा, जिसने पिछले हजार वर्षों में सूखे के कई भीषण दौर झेले हैं, लेकिन आज पिछले 1,300 वर्षों के इतिहास के सबसे भीषण सूखे से गुजर रही है।

इसका मतलब है कि दुनिया में नदियां अब अपने पुराने, अनुमानित व्यवहार पर नहीं चल रही हैं। जिन नदियों पर खेती, पीने का पानी, बिजली और करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी निर्भर है, उनमें पानी का उतार-चढ़ाव लगातार बढ़ रहा है।

खाली हो रहा है पानी का प्राकृतिक 'बैंक खाता'

डब्ल्यूएमओ ने धरती पर जमा पानी को एक तरह के 'प्राकृतिक बचत खाते' की संज्ञा दी है। भूजल, झीलें, नदियां, मिट्टी की नमी, बर्फ और ग्लेशियर लंबे समय तक पानी को जमा रखते हैं। सूखे सालों में यही भंडार इंसानों और पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देता है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक धरती की सतह और उसके नीचे जमा कुल जल भंडारण में 2014-16 के बाद से लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।

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"हम अपनी धरती के उस 'बचत खाते' को तेजी से खाली कर रहे हैं, जो मुश्किल वक्त में हमें बचाता था। अगर जल चक्र का यह असंतुलन जारी रहा, तो भविष्य की पीढ़ियों के पास न पीने को पानी होगा और न ही जीवन को सींचने के साधन।"

— सेलेस्टे साउलो, महासचिव, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ)

एक अन्य रिपोर्ट से पता चला है कि हिमालय, जिसे एशिया की जल जीवनरेखा कहा जाता है, तेजी से सूख रहा है। नई सैटेलाइट स्टडी के अनुसार, एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में हर साल 2,420 करोड़ टन भूजल गायब हो रहा है।

अध्ययन में पाया गया कि एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के करीब दो-तिहाई हिस्से में भूजल लगातार घटा है। सबसे ज्यादा गिरावट उन निचले इलाकों में दर्ज की गई जहां आबादी घनी है और सिंचाई का भारी दबाव है। इनमें गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन, सिंधु बेसिन और अमू दरिया बेसिन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

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लगातार चौथे साल हर प्रमुख ग्लेशियर क्षेत्र में बर्फ का नुकसान

ग्लेशियरों की स्थिति भी इसी संकट की ओर इशारा करती है। 2025 लगातार चौथा साल रहा जब दुनिया के हर प्रमुख ग्लेशियर क्षेत्र में बर्फ का कुल नुकसान दर्ज किया गया। आंकड़ों से पता चला है कि 2023 से 2025 के बीच दुनिया के ग्लेशियरों ने कुल करीब 1,40,000 करोड़ टन पानी के बराबर बर्फ खोई है। यह मात्रा कितनी बड़ी है इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे करीब 56 करोड़ ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल भरे जा सकते हैं।

सिर्फ 2025 में ग्लेशियरों ने करीब 40,800 ±13,200 करोड़ टन बर्फ खोई है, जो समुद्र के स्तर में करीब 1.1 ±0.4 मिलीमीटर की बढ़ोतरी लाने के लिए काफी है।

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यह बदलाव दोहरी मार करता है। ग्लेशियर तेजी से पिघलने पर फिलहाल बाढ़ और अचानक बढ़ते जलप्रवाह का खतरा बढ़ सकता है। लेकिन जब ग्लेशियर छोटे होते जाएंगे, तो लंबे समय में नदियों को मिलने वाला पिघला हुआ पानी भी कम होगा। इसका सीधा असर उन करोड़ों लोगों पर पड़ सकता है जो पहाड़ों से निकलने वाली नदियों पर निर्भर हैं।

कुछ क्षेत्रों में छोटे ग्लेशियर संभवतः ‘पीक वाटर’ की स्थिति तक पहुंच चुके हैं। इसका अर्थ है कि ग्लेशियरों के पिघलने से मिलने वाला अधिकतम जलप्रवाह पार हो चुका है। इसके बाद ग्लेशियर सिकुड़ते हैं तो नदियों में मिलने वाला पिघला पानी भी घट सकता है।

भारत के लिए भी परेशान करने वाली बात है कि एशिया के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में 2025 में निगरानी किए गए सभी 23 ग्लेशियरों ने अपनी बर्फ खोई है। डब्ल्यूएमओ के मुताबिक यह दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले क्षेत्र की दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता है।

उत्तर भारत समेत कई क्षेत्रों में घटा जल भंडार

पानी का संकट सिर्फ नदियों और ग्लेशियरों तक सीमित नहीं है। कई क्षेत्रों में भूजल भी लगातार नीचे जा रहा है।

रिपोर्ट में पुष्टि हुई है कि 2022 से 2025 के बीच अमेरिका के कुछ हिस्सों, यूरोप, मध्य पूर्व, भारत, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में लगातार भूजल की कमी दर्ज की गई। मध्य और पूर्वी यूरोप, मध्य अमेरिका, चिली, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, उत्तर-पश्चिमी भारत और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में भूजल का स्तर सामान्य से बहुत कम दर्ज किया गया।

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2025 में दुनिया भर के निगरानी किए गए कुओं में करीब दो-तिहाई कुएं ऐतिहासिक सामान्य स्थिति से बाहर रहे। यानी जिन भूमिगत जल भंडारों को बनने में वर्षों या दशकों का समय लगता है, उन पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

कहीं सूखा, कहीं बाढ़—पानी का बदलता चेहरा

डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट की सबसे बड़ी चिंता यही है कि दुनिया केवल सूखी नहीं हो रही है। जल चक्र दोनों दिशाओं में चरम पर जा रहा है, मतलब कि—बहुत कम और बहुत ज्यादा पानी।

उदाहरण के लिए 2021 से 2025 के बीच दक्षिण अमेरिका के ला प्लाटा और अमेजन बेसिन, मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के ग्रेटर हॉर्न में कई वर्षों तक सूखे की स्थिति बनी रही। दूसरी ओर पश्चिमी और मध्य अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में बार-बार गंभीर बाढ़ आई।

2025 में एशिया और अफ्रीका जलवायु और जल संबंधी चरम घटनाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। पिछले पांच वर्षों में दुनिया की कम से कम आधी ऐसी घटनाएं और 80 फीसदी से ज्यादा दर्ज मौतें इन्हीं दो महाद्वीपों में हुईं।

दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों और बेहद सक्रिय मानसून ने कई देशों को प्रभावित किया। पाकिस्तान, श्रीलंका, वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया और फिलीपींस में ऐसी घटनाओं से हजारों लोगों की जान गई।

डब्ल्यूएमओ के अनुसार पाकिस्तान में 2025 के मानसून के दौरान बाढ़ से 1,037 मौतें दर्ज हुईं और 30 लाख से अधिक लोगों को सहायता की जरूरत पड़ी। श्रीलंका में चक्रवात 'डिटवाह' से करीब 640 मौतें हुईं और दो लाख से अधिक लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा।

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हमें समझना होगा कि इन आंकड़ों के पीछे सिर्फ आपदा नहीं है। इनके पीछे वे परिवार हैं जिनके घर बह गए, किसान हैं जिनकी फसलें डूब गईं, मजदूर हैं जिनकी रोजी चली गई और वे बच्चे हैं जिनकी पढ़ाई अचानक रुक गई।

भारत और एशिया के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिपोर्ट?

एशिया की बड़ी आबादी हिमालय और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों पर निर्भर है। इसलिए ग्लेशियरों का लगातार पिघलना केवल पहाड़ों की समस्या नहीं है। इसका संबंध आने वाले दशकों में पीने के पानी, सिंचाई, बिजली उत्पादन और शहरों की जल सुरक्षा से है।

मौसम संगठन के अनुसार 2025 में उत्तर भारत समेत कई क्षेत्रों में जमीन पर जमा कुल जल भंडारण सामान्य से नीचे रहा। वहीं एशिया के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में सभी निगरानी किए गए ग्लेशियरों के द्रव्यमान में कमी दर्ज की गई।

मतलब पानी का यह संकट एक साथ कई मोर्चों पर दिखाई दे रहा है, नदी, भूजल, मिट्टी, बर्फ और ग्लेशियर।

अफ्रीका और एशिया में सबसे बड़ी चुनौती, लेकिन आंकड़े ही कम

रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी सामने रखती है। जिन क्षेत्रों पर जल संबंधी आपदाओं की सबसे ज्यादा मार पड़ रही है, उन्हीं क्षेत्रों में जल संबंधी आंकड़ों की उपलब्धता अभी भी अपेक्षाकृत कम है।

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डब्ल्यूएमओ ने माना कि जल संबंधी आंकड़ों की उपलब्धता और कवरेज में सुधार हुआ है, लेकिन अफ्रीका और एशिया अब भी हाइड्रोलॉजिकल निगरानी के लिहाज से कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्र हैं। इसका मतलब है कि कई जगहों पर संकट मौजूद हो सकता है, लेकिन उसके बारे में हमारे पास पर्याप्त और समय पर आंकड़े नहीं हैं।

वहीं पानी की दुनिया में यह एक बड़ी कमजोरी है। जिस पानी को मापा नहीं जा रहा, उसके संकट का समय रहते अनुमान लगाना भी मुश्किल है।

नदियों की कोई सीमा नहीं होती

पानी किसी देश की सीमा पर रुकता नहीं है। एक देश में पिघलता ग्लेशियर सैकड़ों किलोमीटर दूर दूसरे देश की नदी को प्रभावित कर सकता है। एक नदी बेसिन में हुई बारिश या सूखा दूसरे देश के किसानों और शहरों तक असर पहुंचा सकता है। इसीलिए डब्ल्यूएमओ ने साझा डेटा, साझा मानकों और साझा शुरुआती चेतावनी प्रणालियों की जरूरत पर जोर दिया है।

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जल संकट की यह कहानी भविष्य की कोई दूर की आशंका नहीं है। नदियों का असामान्य प्रवाह, भूजल में कमी और ग्लेशियरों का लगातार पिघलना बता रहा है कि धरती का पानी पहले ही बदल रहा है। ऐसे में अब चुनौती सिर्फ ज्यादा पानी जुटाने की नहीं है।

चुनौती यह समझने की भी है कि पानी कब, कहां और कितना उपलब्ध होगा। क्योंकि आने वाले समय में पानी की सबसे बड़ी समस्या शायद यह नहीं होगी कि धरती पर पानी खत्म हो जाएगा। समस्या यह हो सकती है कि जब इंसान को पानी चाहिए होगा, तब पानी सही जगह और सही समय पर मौजूद नहीं होगा।

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