

हिमालय, जिसे एशिया की जल जीवनरेखा कहा जाता है, तेजी से सूख रहा है। एक नई सैटेलाइट स्टडी के अनुसार, एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में हर साल 2,420 करोड़ टन भूजल गायब हो रहा है।
यह संकट करोड़ों लोगों की कृषि, पीने के पानी और पर्यावरणीय सुरक्षा पर भारी पड़ सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के करीब दो-तिहाई हिस्से में भूजल लगातार घटा है। सबसे ज्यादा गिरावट उन निचले इलाकों में दर्ज की गई जहां आबादी घनी है और सिंचाई का भारी दबाव है।
इनमें गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन, सिंधु बेसिन और अमू दरिया बेसिन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। हालांकि इसके उलट कुछ ऊंचाई वाले आंतरिक क्षेत्रों में भूजल के स्तर में हल्की रिकवरी भी देखी गई।
हिमालय, जिसे एशिया की जल जीवनरेखा भी कहा जाता है, अब धीरे-धीरे सूखता जा रहा है। इस बारे में की गई एक नई सैटेलाइट आधारित स्टडी ने चेतावनी दी है कि ‘एशियन वॉटर टॉवर’ के नाम से मशहूर एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में भूजल हर साल अरबों टन की रफ्तार से खत्म हो रहा है। मतलब कि जिस हिमालय को सदियों से पानी का अटूट स्रोत माना जाता रहा है, वहां अब भूजल का खजाना तेजी से खाली हो रहा है।
वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि यह संकट करोड़ों लोगों की कृषि, पीने के पानी और पर्यावरणीय सुरक्षा पर भारी पड़ सकता है, क्योंकि यहीं से निकलने वाला पानी भारत समेत दर्जनों देशों की नदियों, खेती और करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है।
अध्ययन के मुताबिक, इस पूरे क्षेत्र में हर साल करीब 2,420 करोड़ टन की दर से भूजल खत्म हो रहा है। यह गिरावट आने वाले वर्षों में भारत सहित दक्षिण और मध्य एशिया के कई देशों के लिए बड़ा संकट बन सकती है।
यह अध्ययन चीन की एकेडमी ऑफ साइंसेज के एयरोस्पेस इंफॉर्मेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर वांग शुडोंग के नेतृत्व में किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।
दो दशकों का भूजल रिकॉर्ड एआई ने किया तैयार
पहाड़ी इलाकों में भूजल का आकलन करना हमेशा से मुश्किल रहा है। वहां आंकड़े बेहद सीमित और भूगोल बेहद जटिल होता है। इस चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित नया मॉडल विकसित किया है।
इस मॉडल में कई स्रोतों से मिले सैटेलाइट डेटा, अर्थ सिस्टम मॉडलिंग और ‘एक्सप्लेनेबल एआई’ को जोड़कर वैज्ञानिकों ने पिछले 20 वर्षों (2003-2020) के दौरान भूजल में आए बदलावों का विश्लेषण किया है। इससे न केवल भूजल में गिरावट की तस्वीर सामने आई, बल्कि इसके पीछे के मुख्य कारण भी स्पष्ट हुए हैं।
हिमालय के दो-तिहाई हिस्से में घटा भूजल
अध्ययन में पाया गया कि एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के करीब दो-तिहाई हिस्से में भूजल लगातार घटा है। सबसे ज्यादा गिरावट उन निचले इलाकों में दर्ज की गई जहां आबादी घनी है और सिंचाई का भारी दबाव है। इनमें गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन, सिंधु बेसिन और अमू दरिया बेसिन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
हालांकि इसके उलट कुछ ऊंचाई वाले आंतरिक क्षेत्रों में भूजल के स्तर में हल्की रिकवरी भी देखी गई।
जलवायु भी जिम्मेदार, लेकिन इंसानी दोहन बड़ा कारण
वैज्ञानिकों का कहना है कि भूजल में बदलाव के पीछे करीब आधा योगदान जलवायु कारकों का है। इसमें हिमनदों और बर्फीले क्षेत्रों (क्रायोस्फीयर) की भूमिका अहम है। बढ़ते तपमान के साथ ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि मानव गतिविधियां, खासकर सिंचाई के लिए पानी की बेतहाशा होता दोहन, भूजल संकट को लगातार बढ़ा रहा हैं। चिंता की बात है कि यह प्रवृत्ति 2010 के बाद और तेज हो गई है।
और भी डरावना हो सकता है भविष्य
अध्ययन के मुताबिक, अगर पानी के इस्तेमाल की मौजूदा आदतें और नीतियां नहीं बदली गई, तो भूजल में गिरावट आगे भी जारी रहेगी। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि हिमनदों के पिघलने से 2060 के आसपास कुछ इलाकों में भूजल में आ रही गिरावट थोड़े समय के लिए धीमा हो सकती है। लेकिन यह राहत स्थाई नहीं होगी।
इसके बाद भूजल के स्तर में गिरावट और तेज हो सकती है, जिससे निचले इलाकों के कृषि क्षेत्रों पर भारी संकट मंडराने लगेगा।
सैटेलाइट और एआई पर टिकी निगाहें
इस अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वैज्ञानिकों ने एक नया और उन्नत ढांचा विकसित किया है, जो मल्टी-सेंसर सैटेलाइट डेटा, जल विज्ञान और ट्रांसफॉर्मर आधारित एआई मॉडल को एक्सप्लेनेबल मशीन लर्निंग के साथ जोड़ता है।
इसकी मदद से पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में भूजल में हो रहे बदलावों का कहीं अधिक भरोसेमंद आकलन संभव हो पाया है। इतना ही नहीं, शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्षों की पुष्टि हजारों भूजल कुओं के वास्तविक माप और स्वतंत्र आंकड़ों से भी की है, जिससे अध्ययन की विश्वसनीयता और मजबूत हो जाती है।
यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि हिमालयी क्षेत्र में भूजल तेजी से घट रहा है।
ऐसे में अगर सिंचाई के तौर-तरीकों और जल प्रबंधन की मौजूदा नीतियों में समय रहते सुधार नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में भूजल संकट केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता और पर्यावरणीय संतुलन पर भी गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।