

उत्तराखंड के कुमाऊं में कोसी नदी का जलचक्र जलवायु परिवर्तन के साथ तेजी से बदल सकता है। आईआईटी रुड़की और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के अध्ययन के मुताबिक, सदी के अंत तक कोसी बेसिन का अधिकतम तापमान उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 43.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जो मौजूदा स्तर से करीब 4.8 डिग्री अधिक है।
गर्मी बढ़ने के साथ वाष्पोत्सर्जन करीब 13 फीसदी बढ़ने और कुल जल उपलब्धता 4 से 7 फीसदी घटने का अनुमान है।
सबसे गंभीर असर भूजल पर पड़ सकता है, जिसका रीचार्ज 20 फीसदी से अधिक घटने की आशंका है। दूसरी ओर, सतही बहाव करीब 20 फीसदी बढ़ सकता है, यानी बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बहकर निकल सकता है।
इसका सीधा असर पहाड़ों के नौले-धारों और झरनों पर पड़ेगा, जिन पर हजारों परिवार पीने के पानी, खेती और पशुपालन के लिए निर्भर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलस्रोतों के पुनर्जीवन, वर्षाजल संरक्षण, भूजल रीचार्ज और प्रकृति आधारित उपायों पर अभी से काम करना जरूरी है।
पहाड़ों की ठंडी हवाओं में अब एक अजीब सी तपन महसूस होने लगी है। ऐसा ही कुछ उत्तराखंड के कुमाऊं में भी हो रहा है, जहां की जीवनधारा कोसी बढ़ते तापमान और बदलती जलवायु के साथ एक खामोश संकट की ओर बढ़ रही है।
हालात यह हैं कि सदियों से जिन नौले-धारों के ठंडे पानी से यहां की पीढ़ियों का जीवन सींचा गया, वे अब वैज्ञानिक चेतावनियों के बीच सिसक रहे हैं।
आईआईटी रुड़की और जी बी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, की ताजा रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन की मार से सदी के अंत तक उत्तराखंड के कोसी नदी बेसिन का तापमान 43.2 डिग्री सेल्सियस के अभूतपूर्व स्तर को छू सकता है, जिससे भाप बनकर उड़ते पानी के बीच भूजल रीचार्ज में 20 फीसदी से अधिक की गिरावट आने का अंदेशा है।
सच कहें तो यह सिर्फ पर्यावरण में बदलाव के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हिमालय क्षेत्र में रहने वाले उन हजारों परिवारों की आंखों के सामने गहराता जल-संकट है, जिनकी पूरी जिंदगी इस नदी-नौले की सांसों पर टिकी है।
कहानी बस इतनी नहीं है, जर्नल थियोरेटिकल एंड एप्लाइड क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि बढ़ती गर्मी के साथ सदी के अंत तक कोसी बेसिन में वाष्पोत्सर्जन करीब 13 फीसदी बढ़ जाएगा।
सात फीसदी तक घट सकती है जल उपलब्धता
वहीं दूसरी तरफ कुल जल उपलब्धता 7 फीसदी तक घट सकती है। ऐसे में घटते जलस्तर और सूखे की बढ़ती घटनाओं का सीधा असर उन पहाड़ी गांवों पर पड़ सकता है, जहां लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी झरनों, कुओं और स्थानीय जलस्रोतों पर निर्भर है।
पानी के ये स्रोत कमजोर पड़े तो खेतों की सिंचाई, पशुपालन और घरों की पानी की जरूरतें भी प्रभावित होंगी, यानी कोसी बेसिन में जलवायु संकट आने वाले समय में पानी और आजीविका, दोनों का संकट बन सकता है। साथ ही इसकी वजह से बेहद संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ने का अंदेशा है।
इसे समझने के लिए उन्होंने पांच प्रमुख वैश्विक जलवायु मॉडलों से मिले भविष्य के जलवायु पूर्वानुमानों को सॉइल एंड वाटर असेसमेंट टूल मॉडल के साथ जोड़ते हुए संयुक्त मॉडलिंग के जरिए यह समझने की कोशिश की है कि बदलती जलवायु के बीच बारिश, सतही बहाव, वाष्पीकरण और जल उपलब्धता जैसे जलवैज्ञानिक व्यवहार कोसी बेसिन में किस तरह बदल सकते हैं।
इस अध्ययन में आईआईटी रुड़की के डॉक्टर बी दास और डॉक्टर एस सेन के साथ-साथ जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान से जुड़े वैज्ञानिक डॉक्टर संदीपन मुखर्जी शामिल थे।
पांच डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है तापमान
अध्ययन के मुताबिक, आने वाले वर्षों में घाटी का तापमान लगातार बढ़ सकता है। फिलहाल यहां अधिकतम तापमान करीब 38.4 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। यह सदी के अंत तक मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में करीब 41.6 डिग्री और उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में करीब 43.2 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।
मतलब कि इसमें 4.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि का अंदेशा है। इसके साथ ही वैज्ञानिकों के मुताबिक अधिकतम और न्यूनतम तापमान के बढ़ने से वाष्पीकरण और वाष्पोत्सर्जन में भी वृद्धि होगी। यानी जमीन और जलस्रोतों से पानी तेजी से वातावरण में जाएगा और उपलब्ध जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा।
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉक्टर आई डी भट्ट के मुताबिक, यह अध्ययन हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में हो रहे एक महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करता है। तापमान बढ़ने से वाष्पोत्सर्जन तेज होगा और भूजल रिचार्ज घटेगा।
ऐसे में पहाड़ी समुदायों की झरनों और स्थानीय जलस्रोतों पर निर्भरता को देखते हुए अभी से जल प्रबंधन और अनुकूलन के उपाय करने होंगे।
भूजल रिचार्ज में 20 फीसदी की गिरावट का अंदेशा
अध्ययन में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि सदी के अंत तक कोसी बेसिन की कुल जल उपलब्धता या वॉटर यील्ड में करीब 4 से 7 फीसदी तक की गिरावट आई सकती है। वहीं, बढ़ते तापमान के कारण वाष्पोत्सर्जन में करीब 13 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है।
सबसे बड़ी चिंता भूजल को लेकर है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, भूजल रिचार्ज में 20 फीसदी से अधिक की कमी आ सकती है। दूसरी ओर, सतही बहाव करीब 20 फीसदी बढ़ सकता है।
इसका मतलब है कि बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बहकर निकल जाएगा। इससे बारिश के दौरान पानी अचानक तेजी से बढ़ सकता है, लेकिन सूखे के लिए जमीन के भीतर पानी का भंडार कम होता जाएगा।
बारिश में ज्यादा बहाव, सूखे में कम पानी—बदल जाएगा कोसी का जलचक्र
जलचक्र में इन बदलावों से भविष्य में सूखे की घटनाएं अधिक बार और लंबे समय तक हो सकती हैं। इसका असर पहाड़ों के उन प्राकृतिक झरनों पर भी पड़ सकता है, जो हजारों परिवारों के लिए पीने और घरेलू जरूरतों का प्रमुख स्रोत हैं।
ऐसे में पानी की कमी खेती को प्रभावित कर सकती है। नतीजन सिंचाई, पशुपालन और स्थानीय आजीविका पर दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ ही हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी भी प्रभावित होगी।
आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर कमल किशोर पंत का कहना है, जलवायु परिवर्तन पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र की जल सुरक्षा के सामने बड़ी चुनौती है। ऐसे अध्ययन भविष्य की नीतियों और जलवायु अनुकूलन की ऐसी रणनीतियां बनाने में मदद करते हैं, जो जलस्रोतों, आजीविका और हिमालयी पर्यावरण को बचा सकें।
अब बचा पानी बचाने की जरूरत
शोधकर्ताओं का कहना है कि संकट के गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय अभी से तैयारी करनी होगी। इसके लिए जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन, सूखते झरनों को पुनर्जीवन, मिट्टी और जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज बढ़ाने तथा प्रकृति आधारित समाधानों को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।
कोसी घाटी की यह कहानी केवल एक नदी या क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह उन पहाड़ी परिवारों की चिंता है, जिनके घरों तक पानी किसी बड़े बांध या पाइपलाइन से नहीं, बल्कि पहाड़ के किसी छोटे झरने से पहुंचता है।
ऐसे में अगर जलवायु परिवर्तन ने इन प्राकृतिक स्रोतों की सांसें धीमी कर दीं, तो आने वाले वर्षों में पहाड़ों में पानी की कमी सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और आजीविका का बड़ा संकट बन सकती है।