विकास के नाम पर जलाशय पर अतिक्रमण? एनजीटी ने खोली एनएचएआई की पोल

एनजीटी ने स्पष्ट किया कि कानून को नजरअंदाज कर विकास नहीं हो सकता और उल्लंघन पर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया को जवाबदेह ठहराया जाएगा।
विकास के नाम पर जलाशय पर अतिक्रमण? एनजीटी ने खोली एनएचएआई की पोल
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सारांश
  • दिल्ली के गोयला खुर्द गांव में संरक्षित जलाशय पर हाईवे निर्माण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया की गंभीर चूक को उजागर किया है।

  • 6 अप्रैल 2026 के आदेश में ट्रिब्यूनल ने कहा कि हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने पर्यावरण मंजूरी लेते समय यह महत्वपूर्ण तथ्य छुपाया कि तालाब के भीतर 8 पिलर बनाए जाएंगे। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि भले ही अतिक्रमण का क्षेत्र छोटा हो, लेकिन कानून का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है।

  • ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण मंत्रालय को छह महीने में मामले की जांच कर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं, जबकि डीपीसीसी को पर्यावरणीय नुकसान का आकलन कर मुआवजा तय करने को कहा गया है।

  • साथ ही, एनएचएआई को तालाब की मरम्मत और पुनर्जीवन सुनिश्चित करना होगा। यह मामला एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर सामने आया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि संरक्षित आद्रभूमि पर अवैध निर्माण किया गया। एनजीटी ने दोहराया कि विकास परियोजनाएं पर्यावरणीय नियमों से ऊपर नहीं हो सकतीं।

पर्यावरण संरक्षण को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली के गोयला खुर्द गांव में संरक्षित जलाशय पर हो रहे हाईवे निर्माण को लेकर तीखी टिप्पणी की है।

6 अप्रैल 2026 के अपने आदेश में एनजीटी ने साफ कहा कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) ने गंभीर चूक करते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को यह अहम जानकारी नहीं दी कि परियोजना के तहत जलाशय के भीतर 8 पिलर खड़े किए जाएंगे।

एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर ए सेंथिल वेल की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस बात पर कोई बहस नहीं है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी है, लेकिन इसके लिए कानून का पालन और सभी जरूरी पर्यावरणीय मंजूरी लेना अनिवार्य है। “तथ्यों को छुपाकर अनुमति लेना स्वीकार्य नहीं है,” अदालत ने सख्त टिप्पणी की।

तथ्य छुपाकर मंजूरी स्वीकार्य नहीं

हालांकि अतिक्रमण का क्षेत्रफल केवल 20.36 वर्ग मीटर है, फिर भी एनजीटी ने कहा कि नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती। पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना 2006 के तहत आवश्यक अनुमति ली जानी चाहिए थी।

ऐसे में एनजीटी ने पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह पर्यावरण मंजूरी की शर्तों के उल्लंघन के पहलू पर विचार करे और छह महीने के अंदर नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का पालन करते हुए कानून के अनुसार सही फैसला ले। अदालत ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया से कहा है कि वह भविष्य में पर्यावरण मंजूरी के लिए अप्लाई करते समय कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी में प्रभावित होने वाले पानी के प्राकृतिक स्रोत, तालाब, झील, नदियों के बारे में पूरी जानकारी साझा करे।

बिना मंजूरी के जल स्रोत में पिलर बनाने के अलावा, वहां मलबा फेंकने और जलाशय को हुए नुकसान का मुद्दा भी सामने आया है। इसी को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) की संयुक्त टीम को निरीक्षण करने का निर्देश दिया है।

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‘छोटी चूक’ भी गंभीर उल्लंघन

यह टीम निर्माण के दौरान जलाशय को हुए नुकसान का आकलन करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि एनएचएआई छह महीने के भीतर सुधारात्मक कदम उठाए। साथ ही, जलाशय की सुरक्षा और बहाली के लिए जरूरी उपाय भी तय किए जाएंगे, जिन्हें लागू करना एनएचएआई की जिम्मेदारी होगी।

एनजीटी ने यह भी कहा कि डीपीसीसी, एनएचएआई को सुनवाई का अवसर देकर पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई (मुआवजा) तय करे और छह महीने के भीतर इसकी वसूली की कार्रवाई करे।

गौरतलब है कि अंग्रेजी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया में 30 सितंबर 2024 को प्रकाशित एक खबर के आधार पर एनजीटी ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है। इस खबर में आरोप लगाया गया है कि गोयला खुर्द के संरक्षित तालाब पर अर्बन एक्सटेंशन रोड-II का निर्माण किया गया है।

यह भी कहा गया कि यह तालाब एक प्राकृतिक आद्रभूमि है और संरक्षित किए जाने वाले 1,000 से अधिक तालाबों की सूची में शामिल है। आरोप है कि दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के इस गांव में बन रही सड़क तालाब के बीच से गुजर रही है, जिससे निर्माण शुरू होने के बाद तालाब का क्षेत्रफल घट गया है और यह निर्माण अवैध रूप से किया जा रहा है।

रिकॉर्ड के अनुसार, गोयला खुर्द गांव की जमीन दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने अधिग्रहित की थी। 2010 में कब्जा लेते समय इस जमीन को “जोहड़” (तालाब) के रूप में दर्ज किया गया था।

वेटलैंड प्राधिकरण ने बताया—संरक्षित है जलाशय

2012 में डीडीए ने यह जमीन रोड के निर्माण के लिए एनएचएआई को सौंप दी। जमीन मिलने के बाद एनएचएआई ने इसी जोहड़ (तालाब) के ऊपर फ्लाईओवर बना दिया। डीडीए ने 22 जुलाई 2025 को अपने जवाब में बताया कि 21 अप्रैल 2023 को 100 मीटर सड़क निर्माण के लिए जमीन एनएचएआई को सौंपी गई थी और उस समय एनएचएआई को इस जमीन पर तालाब/जलाशय की मौजूदगी की पूरी जानकारी थी।

वहीं, दिल्ली वेटलैंड प्राधिकरण ने 11 फरवरी 2026 को अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि गोयला खुर्द का यह जलाशय सूची में दर्ज आद्रभूमि है, जिसे हर हाल में संरक्षित किया जाना चाहिए।

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एनजीटी ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के 4 अक्टूबर 2017 के फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया था कि भारत सरकार द्वारा चिह्नित सभी आद्रभूमियों को आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2010 के नियम 4 के सिद्धांतों के तहत संरक्षित माना जाएगा। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि इन नियमों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किसी व्यक्ति, संस्था या एजेंसी को करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मामले में 13 जनवरी 2025 को राजस्व विभाग, दिल्ली वेटलैंड प्राधिकरण और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति के अधिकारियों ने संयुक्त निरीक्षण किया।

इस निरीक्षण में पाया गया कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने गोयला खुर्द गांव के तालाब के ऊपर हाईवे/फ्लाईओवर बना दिया है। दिल्ली वेटलैंड प्राधिकरण ने भी पुष्टि की कि गोयला खुर्द का यह तालाब उसकी सूची में दर्ज जलाशय है। वहीं, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने 22 जुलाई 2025 को अपने हलफनामे में बताया कि 3 जुलाई 2025 को डीडीए और एनएचएआई के अधिकारियों ने जमीन का संयुक्त निरीक्षण किया था।

संयुक्त निरीक्षण में सामने आई सच्चाई

रिपोर्ट में कहा गया कि सड़क निर्माण के लिए डीडीए ने यह जमीन एनएचएआई को सौंपी थी। निरीक्षण में पाया गया कि यह जमीन जलाशय है और इसके ऊपर ग्रेड सेपरेटर/फ्लाईओवर बनाया गया है। इस फ्लाईओवर के 8 पिलर जलाशय के अंदर खड़े हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 20.36 वर्ग मीटर है।

एनजीटी ने आदेश में कहा कि जलाशय के भीतर पिलर बनाए जाने का तथ्य विवादित नहीं है। इन आठ पिलरों के कारण तालाब पर अतिक्रमण हुआ है, जो कुल तालाब क्षेत्र का करीब 0.23 फीसदी है।

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अदालत में साझा जानकारी के मुताबिक भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का यह सड़क निर्माण प्रोजेक्ट पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना 2006 के तहत श्रेणी ‘ए’ में आता है, इसलिए परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी लेने हेतु पर्यावरण मंत्रालय में आवेदन किया गया था।

हालांकि, रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि संदर्भ की शर्तों में यह बताया गया हो कि संबंधित जलाशय (तालाब) पर अतिक्रमण किया जाएगा या उसके अंदर खंभे (पिलर) बनाए जाएंगे। केवल इतना बताया गया था कि प्रस्तावित सड़क कई जल स्रोतों, जिसमें यह तालाब भी शामिल है, को पार करेगी।

विकास बनाम पर्यावरण: संतुलन की कसौटी

30 दिसंबर 2021 को जारी पर्यावरण मंजूरी में भी यह साफ लिखा गया था कि तालाब पर संरचना प्रस्तावित है, लेकिन उसमें तालाब के भीतर पिलर खड़े करने का कोई उल्लेख नहीं था। मंजूरी की विशेष शर्त (iii) में स्पष्ट कहा गया था: “सभी बड़े और छोटे पुल व पुलिया जल निकासी व्यवस्था को प्रभावित नहीं करेंगे। नदियों के बाढ़ क्षेत्र और ड्रेनेज सिस्टम से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।“

साथ ही, मानक शर्त (iii) के तहत यह जरूरी था कि काम शुरू करने से पहले जलाशय के मालिक से अनुमति ली जाए। इससे यह संकेत मिलता है कि पर्यावरण मंजूरी लेते समय एनएचएआई ने तालाब के भीतर पिलर बनाने की योजना का खुलासा नहीं किया और इस संबंध में कोई पर्यावरण प्रभाव आकलन भी नहीं किया गया।

एनजीटी के इस फैसले ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि विकास परियोजनाएं पर्यावरणीय नियमों से ऊपर नहीं हैं। छोटी से छोटी अनियमितता भी गंभीर मानी जाएगी और जिम्मेदार एजेंसियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।

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