

मानसून की हर बूंद धरती तक नहीं पहुंचती। बादलों से जमीन की ओर गिरते समय बारिश का एक बड़ा हिस्सा रास्ते में ही भाप बनकर हवा में ओझल हो जाता है।
पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में सामने आया है कि पश्चिमी घाट के आसपास बारिश का औसतन 23 फीसदी पानी जमीन तक पहुंचने से पहले ही वाष्पित हो जाता है।
2019 के मानसून के दौरान जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, अलग-अलग दिनों में वाष्पीकरण की मात्रा 4 से 61 फीसदी तक रही।
अध्ययन बताता है कि बारिश का कितना पानी धरती तक पहुंचेगा, यह हवा की नमी, तापमान, बूंदों के आकार और बारिश की तीव्रता पर निर्भर करता है।
शुष्क हवा में बूंदें तेजी से वाष्पित होती हैं, जबकि तेज बारिश की बड़ी बूंदों के जमीन तक पहुंचने की संभावना अधिक रहती है। हल्की बारिश में वाष्पीकरण के कारण पहले से कम पानी और घट सकता है।
मानसून में बारिश की हर बूंद जो बादलों से धरती की ओर बढ़ती है, जरूरी नहीं कि जमीन तक भी पहुंचे। रास्ते में ही उसका कुछ हिस्सा हवा में वाष्पित होकर गायब हो जाता है। इसका मतलब है कि आसमान से बरसती बूंदों और धरती पर पहुंचने वाले पानी की मात्रा में काफी अंतर हो सकता है।
भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि भारत के पश्चिमी घाट के आसपास औसतन करीब 23 फीसदी बारिश की बूंदें जमीन तक पहुंचने से पहले ही वाष्पित हो जाती हैं।
यह अध्ययन पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पहली बार बारिश और जलवाष्प के नमूनों का विश्लेषण कर इस प्रक्रिया का आकलन किया है।
प्रतिष्ठित जर्नल एटमोस्फियरिक केमिस्ट्री एंड फिजिक्स में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि बारिश का कितना पानी जमीन तक पहुंचेगा, यह केवल बादलों से बरसने वाली वर्षा पर निर्भर नहीं करता। बादलों के नीचे मौजूद हवा की नमी, तापमान और बारिश की बूंदों का आकार भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।
यह शोध भारतीय मानसून को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इससे मौसम और जलवायु के उन मॉडलों को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है, जिनके आधार पर बारिश का पूर्वानुमान लगाया जाता है और पानी की उपलब्धता का आकलन किया जाता है।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 2019 में मानसून सीजन के दौरान पुणे में हुई बारिश के पानी और वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प के नमूने एकत्र किए। उन्होंने पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के स्थिर आइसोटोप (समस्थानिकों) का विश्लेषण किया।
चूंकि वाष्पीकरण के दौरान इन आइसोटोप के अनुपात में बदलाव आता है। इसी बदलाव के आधार पर वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि बादलों के नीचे गिरती बारिश का कितना हिस्सा भाप बन जाता है।
अध्ययन के दौरान बारिश के पानी के वाष्पीकरण की मात्रा अलग-अलग दिनों में 4 से 61 फीसदी तक पाई गई। यानी कुछ दिनों में बारिश का बहुत छोटा हिस्सा वाष्पित हुआ, जबकि कुछ दिनों में पानी का बड़ा हिस्सा जमीन तक पहुंचने से पहले ही हवा में समा गया। पूरे अध्ययन के दौरान यह नुकसान औसतन करीब 23 फीसदी रहा।
रिसर्च से पता चला कि इस प्रक्रिया में हवा की सापेक्ष आर्द्रता यानी उसमें मौजूद नमी की मात्रा की अहम भूमिका होती है। हवा जितनी शुष्क होगी, बारिश की बूंदों के वाष्पित होने की संभावना उतनी ही बढ़ जाएगी। इसके विपरीत, नमी से भरी हवा में बूंदों का वाष्पीकरण अपेक्षाकृत कम हो सकता है।
इसके साथ ही बारिश की तीव्रता भी मायने रखती है। तेज बारिश के दौरान आमतौर पर बूंदें बड़ी होती हैं और तेजी से जमीन तक पहुंचती हैं। इससे उनके पास हवा में वाष्पित होने के लिए कम समय बचता है। इसके अलावा तापमान और बादलों के नीचे हवा की उस परत की मोटाई भी वाष्पीकरण को प्रभावित करती है, जिससे होकर बारिश की बूंदों को गुजरना पड़ता है।
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि, हल्की बारिश में वाष्पीकरण का असर ज्यादा हो सकता है। इसकी वजह है कि बारिश की छोटी बूंदें जमीन तक पहुंचने से पहले ही हवा में तेजी से सूख सकती हैं। इससे पहले ही कम बरसने वाले पानी की मात्रा और घट सकती है।
इसका असर केवल जमीन तक पहुंचने वाले पानी तक सीमित नहीं है। बारिश की बूंदों के वाष्पित होने से आसपास की हवा ठंडी होती है और वायुमंडल में हवा की गति तथा संवहन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। ये बदलाव मानसूनी बादलों के विकास और बारिश के वितरण को भी प्रभावित कर सकते हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, बारिश की बूंदों के वाष्पीकरण की सही गणना मौसम और जलवायु के कंप्यूटर मॉडलों के लिए जरूरी है। यदि मॉडल यह मानकर चलते हैं कि बादलों से निकला लगभग सारा पानी जमीन तक पहुंच जाता है, तो वे सतह पर होने वाली वास्तविक बारिश का सही अनुमान लगाने में चूक सकते हैं।
ऐसे में इस अध्ययन से प्राप्त वास्तविक आंकड़े इन मॉडलों की जांच और उन्हें बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। इससे यह समझने में भी मदद मिलेगी कि अलग-अलग मौसमी परिस्थितियों में जमीन तक कितना पानी पहुंचता है।
हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन पुणे में 2019 के मानसून के दौरान जुटाए आंकड़ों और मॉडल पर आधारित है। इसलिए 23 फीसदी के औसत को पूरे भारत या हर मानसून पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। अलग-अलग क्षेत्रों और वर्षों में वाष्पीकरण की मात्रा समझने के लिए व्यापक और लंबे समय तक किए जाने वाले अध्ययन जरूरी हैं।