

मंगल की सतह पर करीब 75 करोड़ साल पहले खारा पानी मौजूद होने के नए संकेत वैज्ञानिकों को मिले हैं।
जुरोंग रोवर के आंकड़ों में मिले सेलेनाइट क्रिस्टल बताते हैं कि मंगल पर कभी पानी जमा हुआ था।
वैज्ञानिक मानते हैं कि खारे पानी को ज्वालामुखीय गर्मी ने सतह तक पहुंचाया और क्रिस्टल बनने की प्रक्रिया शुरू की।
यह खोज मंगल के पानी और जीवन की तलाश में भविष्य के मिशनों के लिए महत्वपूर्ण दिशा दिखा सकती है।
यूटोपिया प्लैनिटिया में मिले ये खनिज मंगल के हाल के जल इतिहास को समझने में नई उम्मीद जगा रहे हैं।
मंगल ग्रह को लंबे समय से एक ऐसा ठंडा और सूखा ग्रह माना जाता रहा है, जहां करीब तीन अरब साल पहले सतह का पानी लगभग पूरी तरह जम गया था। वैज्ञानिकों का मानना था कि इसके बाद अगर कहीं पानी बचा भी होगा, तो वह जमीन के नीचे चला गया होगा या धीरे-धीरे अंतरिक्ष में खत्म हो गया होगा। लेकिन चीन के मंगल रोवर ज़ुरोंग से मिले आंकड़ों के नए अध्ययन ने इस सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हांगकांग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक की टीम ने मंगल की सतह से मिले खनिजों का दोबारा अध्ययन किया है। उनका कहना है कि उन्हें ऐसे खनिज क्रिस्टल मिले हैं, जो कभी मंगल की सतह पर मौजूद खारे पानी से बने हो सकते हैं। अगर यह निष्कर्ष सही साबित होता है, तो मंगल पर पानी की मौजूदगी अनुमान से कहीं ज्यादा हाल की हो सकती है। यह शोध नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित किया गया है।
2021 में मंगल पर उतरा था जुरोंग
चीन का जुरोंग रोवर मई 2021 में मंगल के उत्तरी हिस्से में मौजूद यूटोपिया प्लैनिटिया नाम के विशाल मैदान में उतरा था। यह इलाका मंगल की सबसे बड़ी समतल सतहों में से एक है। रोवर ने करीब 93 दिनों तक वहां की मिट्टी और चट्टानों का अध्ययन किया।
जुरोंग ने कुछ चमकीली और सपाट चट्टानों की तस्वीरें भी ली थीं। उसके उपकरणों से मिले संकेतों से पता चला था कि इन चट्टानों में पानी से जुड़े खनिज हो सकते हैं। हालांकि, केवल तस्वीरों और शुरुआती आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक यह तय नहीं कर पा रहे थे कि चट्टानों में कौन-से खनिज मौजूद हैं।
क्रिस्टल ने खोला पानी का राज
अब वैज्ञानिकों ने जुरोंग के पुराने आंकड़ों को अधिक बारीकी से देखा। उन्होंने चट्टानों की सतह के नीचे दिखाई देने वाले छोटे-छोटे क्रिस्टलों के आकार पर खास ध्यान दिया। इनमें कुछ क्रिस्टल पत्तागोभी के पत्तों जैसे मुड़े हुए दिखाई देते हैं, जबकि कुछ क्रिसमस ट्री की शाखाओं जैसे दिखते हैं।
लेजर और इंफ्रारेड उपकरणों से मिले आंकड़ों को मिलाकर वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि ये संरचनाएं सेलेनाइट नाम के खनिज की हो सकती हैं। सेलेनाइट जिप्सम का एक बड़े आकार वाला क्रिस्टलीय रूप है। यह आमतौर पर तब बनता है, जब बहुत ज्यादा नमक वाला पानी धीरे-धीरे क्रिस्टल में बदलता है। इससे वैज्ञानिकों को संकेत मिला है कि इस इलाके में कभी खारा पानी जमा हुआ होगा।
पानी की मात्रा भी थी काफी
शोधकर्ताओं ने खनिज की परत की मोटाई के आधार पर पानी की संभावित मात्रा का अनुमान भी लगाया है। उनके अनुसार, इस खनिज परत को बनाने के लिए पानी की ऐसी मात्रा की जरूरत पड़ी होगी, जो लगभग 6.25 से 25 मीटर गहरी पानी की परत के बराबर हो सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि वहां निश्चित रूप से 25 मीटर गहरी झील मौजूद थी। यह केवल उस पानी की अनुमानित मात्रा है, जो लंबे समय में इन खनिजों को बनाने में इस्तेमाल हुई होगी।
करीब 75 करोड़ साल पुरानी हो सकती है सतह
इस खोज की सबसे बड़ी खासियत इसकी संभावित उम्र है। आसपास मौजूद गड्ढों यानी क्रेटरों की संख्या का अध्ययन करके वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि जिस जमीन पर ये खनिज मिले हैं, उसकी उम्र करीब 75.7 करोड़ साल हो सकती है। अगर यह अनुमान सही है, तो मंगल की सतह पर पानी की गतिविधि उस समय तक जारी रही होगी, जब ग्रह को पहले से ही बहुत ठंडा और सूखा माना जाता था।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह पानी जमीन के नीचे मौजूद बेहद खारे पानी यानी ब्राइन से आया होगा। संभव है कि मंगल के अंदर की गर्मी या ज्वालामुखीय गतिविधि ने इस पानी को ऊपर की ओर धकेला हो। सतह पर आने के बाद पानी धीरे-धीरे जमता और उसमें मौजूद नमक और खनिज क्रिस्टल के रूप में जमा होते गए होंगे।
भविष्य के मिशनों के लिए अहम जगह
इस खोज की अभी और जांच जरूरी है। वैज्ञानिकों को यह भी पता लगाना होगा कि ये क्रिस्टल वास्तव में किस तरह बने और क्या इनके बनने के पीछे यही प्रक्रिया थी।
अगर भविष्य के मिशन इन खनिजों के नमूने सीधे जांच सकें, तो वैज्ञानिक मंगल के पुराने पानी के बारे में और जानकारी हासिल कर सकते हैं। कुछ क्रिस्टल अपने अंदर उस पानी की छोटी-छोटी बूंदें भी सुरक्षित रख सकते हैं, जिससे उस समय के वातावरण और पानी की रासायनिक स्थिति का पता चल सकता है।
यह खोज मंगल पर जीवन की संभावना के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। पानी जीवन के लिए जरूरी तत्व है। इसलिए अगर मंगल पर करोड़ों साल पहले भी कुछ समय के लिए खारा पानी मौजूद था, तो यह जानना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि उस समय वहां जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां थीं या नहीं।
जुरोंग के आंकड़ों ने फिलहाल मंगल के इतिहास की एक नई तस्वीर सामने रखी है। आने वाले मिशन यह तय करने में मदद करेंगे कि लाल ग्रह वास्तव में कितने लंबे समय तक पानी को अपनी सतह के पास संभाल कर रख सका था।
चीन के जुरोंग रोवर से मिले आंकड़ों के नए अध्ययन ने मंगल के पानी से जुड़े इतिहास पर नई रोशनी डाली है। वैज्ञानिकों को यूटोपिया प्लैनिटिया में सेलेनाइट जैसे क्रिस्टल मिले हैं, जो संभवतः खारे पानी से बने।
अनुमान है कि करीब 75.7 करोड़ साल पहले इस क्षेत्र में पानी मौजूद था। शोधकर्ताओं का मानना है कि भूमिगत खारा पानी ज्वालामुखीय गर्मी के कारण सतह तक आया होगा। यह खोज मंगल पर देर तक पानी रहने की संभावना बढ़ाती है।