

दक्षिण भारत के शुष्क इलाकों में रहने वाले शर्मीले 'मद्रास हेजहॉग' (बेयर-बैलीड हेजहॉग) को लेकर वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
भारत और ऑस्ट्रिया के शोधकर्ताओं ने पहली बार इस जीव का पूर्ण माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए (17,232 बेस पेयर्स) मैप तैयार किया है।
इस जेनेटिक ब्लूप्रिंट से खुलासा हुआ है कि यह प्रजाति लगभग 37 लाख साल पहले अपने करीबी रिश्तेदार 'इंडियन हेजहॉग' से अलग हुई थी। यह वह कालखंड था जब दक्षिण एशिया की जलवायु में बड़े बदलाव आ रहे थे।
अध्ययन के अनुसार, इस जीव के ऊर्जा उत्पादन से जुड़े जीन लाखों वर्षों से स्थिर हैं, जो इसकी अद्भुत अनुकूलन क्षमता को दर्शाते हैं।
पारिस्थितिक तंत्र में 'किसान मित्र' और 'पर्यावरण संकेतक' की भूमिका निभाने वाला यह जीव आज शहरीकरण, सड़क दुर्घटनाओं, बदलती जलवायु और अवैध शिकार के कारण खतरे में है।
इसकी गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची-II में शामिल कर सुरक्षा बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह नया आनुवंशिक मानचित्र न केवल इस प्रजाति की विकास यात्रा को समझने, बल्कि इसके भविष्य के संरक्षण और निगरानी में भी एक मील का पत्थर साबित होगा।
दक्षिण भारत की सूखी झाड़ियों और कांटेदार जंगलों में रात के अंधेरे में चुपचाप विचरने वाला एक छोटा-सा शर्मीला जीव, जो लंबे समय से इंसानी नजरों से लगभग अनदेखा रहा है, अब वैज्ञानिक खोज का केंद्र बन गया है।
हम बात कर रहे हैं ‘मद्रास हेजहॉग’ की जिसे स्थानीय लोग 'कांटेदार चूहे' के रूप में भी जानते हैं। इसे ‘बेयर-बैलीड हेजहॉग’ या दक्षिण भारतीय हेजहॉग (पैराचिनस न्यूडिवेंट्रस) भी कहा जाता है।
भारत और ऑस्ट्रियाई शोधकर्ताओं ने पहली बार इसके पूरे माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए का खाका तैयार किया है, जिससे पता चला कि यह जीव करीब 37 लाख साल पहले अपने करीबी रिश्तेदार ‘इंडियन हेजहॉग (पैराचिनस माइक्रोफस)’ से अलग हुआ था। एक छोटे से निशाचर जीव के कांटों और डीएनए में छिपी यह कहानी न सिर्फ इसके विकास का राज खोलती है, बल्कि बदलते मौसम और घटते आवास के बीच इसके भविष्य पर भी नई रोशनी डालती है।
इंस्टिट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव नेचर कंजर्वेशन रिसर्च, बोकु यूनिवर्सिटी (वियना) और हेजहॉग कंजर्वेशन एलायंस, कन्याकुमारी से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन से इस दुर्लभ जीव के विकास की वो कड़ियां सुलझ गई हैं, जो अब तक विज्ञान के लिए एक पहेली थीं। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए पार्ट ए’ में प्रकाशित हुए हैं।
डीएनए ने खोली विकास की छिपी कहानी
अध्ययन से पुष्टि हुई है कि 'मद्रास हेजहॉग' अपने सबसे करीबी रिश्तेदार, 'भारतीय हेजहॉग', से 36.9 लाख साल पहले अलग हो गया था। यह वह दौर था जब दक्षिण एशिया में जलवायु तेजी से बदल रही थी।
बता दें कि माइटोकॉन्ड्रियल, डीएनए कोशिकाओं के ऊर्जा केंद्र में मौजूद आनुवंशिक सामग्री है, जिसका उपयोग जीवों की वंशावली और विकासक्रम को समझने में किया जाता है। वैज्ञानिकों ने इस शोध के लिए न केवल आधुनिक लैब तकनीकों का उपयोग किया, बल्कि डेटा जुटाने के लिए सड़क दुर्घटनाओं में मारे गए जीवों और उनके झड़े हुए कांटों जैसे नमूनों का भी सहारा लिया।
इनसे प्राप्त डीएनए की मदद से उनका अनुक्रमण किया गया और विकासक्रम का विश्लेषण किया गया। इसकी तुलना हेजहॉग परिवार की दूसरी प्रजातियों से की है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि इस जीव का जेनेटिक कोड 17,232 अक्षरों (बेस पेयर्स) लंबा है। इसकी बनावट लगभग वैसी ही है जैसी अन्य स्तनधारियों की होती है। बता दें कि जीनोम एक 'निर्देश पुस्तिका' की तरह होता है जो शरीर को बताता है कि उसे कैसे काम करना है।
स्टडी से पता चला कि इसमें 13 मुख्य जीन शामिल हैं जो शरीर के लिए प्रोटीन बनाने का काम करते हैं। 22 ट्रांसफर आरएनए, दो राइबोसोमल आरएनए और एक ऐसा हिस्सा है जो डीएनए के कामकाज को नियंत्रित करता है।
कांटों में छिपा आनुवंशिक रहस्य
अध्ययन में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि इस जीव के अधिकांश जीन लाखों वर्षों से करीब-करीब स्थिर बने हुए हैं। खासकर ऊर्जा उत्पादन से जुड़े जीनों में बहुत कम बदलाव दिखा, जिससे संकेत मिलता है कि ये इसके जीवित रहने के लिए बेहद जरूरी हैं।
यह प्रजाति आमतौर पर दक्षिण भारत के शुष्क झाड़ीदार इलाकों, कांटेदार जंगलों, घासभूमि और रेतीले क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका मुख्य विस्तार तमिलनाडु में है, जबकि कुछ आबादी आंध्रप्रदेश और केरल में भी मिलती है। यह जीव आमतौर पर रात में सक्रिय रहता है।
हाल ही में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले से बेयर-बेलिड हेजहॉग के तीन नए स्थानीय रिकॉर्ड सामने आए हैं। इनका प्रत्यक्ष अवलोकन समुगरेंगापुरम, कूंथनकुलम और मूलइक्कडु के शुष्क घासभूमि क्षेत्रों में किया गया।
यह खोज न केवल इन इलाकों में इस प्रजाति की मौजूदगी की पुष्टि करती है, बल्कि तिरुनेलवेली जिले में इसके वितरण और आवास को लेकर हमारी समझ को भी और व्यापक बनाती है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक भले ही यह नन्हा जीव इंसानी बस्तियों के पास सड़क किनारे या स्ट्रीट लाइट के नीचे कीड़े खोजता दिख जाए, लेकिन इसका भविष्य खतरे में है।
जलवायु बदलाव ने बदली विकास की राह
अध्ययन से पता चला है कि तेजी से बढ़ते शहरों की वजह से इस नन्हे जीव की दुनिया को लगातार सिकुड़ रही है। जहां कभी यह बेफिक्र होकर सूखी झाड़ियों और घास में घूमता था, अब उसके प्राकृतिक ठिकाने धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। सड़कें और तेज रफ्तार वाहन इसके लिए एक और बड़ा खतरा बन चुके हैं, कई बार यह मासूम जीव अनजाने में सड़क हादसों का शिकार हो जाता है।
इसके साथ ही पारंपरिक मान्यताओं और अंधविश्वास के कारण पारंपरिक दवाओं में अवैध इस्तेमाल भी इसके अस्तित्व पर दबाव डाल रहा है। ऊपर से बदलती जलवायु इसके जीवन के लिए हालात और मुश्किल बना रही है। इससे यह नाजुक जीव धीरे-धीरे और अधिक असुरक्षित होता जा रहा है। इसके अलावा टिक और परजीवी भी हेजहॉग की आबादी के लिए एक बड़ा खतरा हैं।
गौरतलब है कि भले ही छोटे हों, लेकिन ये अपने पारिस्थितिकी तंत्र का एक अहम हिस्सा है। इसकी खान-पान की खास आदतें, व्यवहार और जीवनशैली इसे प्रकृति के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला जीव बनाती हैं। इसे पारिस्थितिक संकेतक भी माना जाता है, यानी इसकी मौजूदगी या कमी सीधे पर्यावरण की सेहत का संकेत देती है।
घटते आवास, बढ़ता संकट
इनकी आमतौर पर लंबाई लगभग 14 से 25 सेंटीमीटर और वजन 130 से 315 ग्राम होता है। यह जीव आमतौर पर पांच से छह वर्ष तक जीवित रहता है। इसके शरीर पर भूरे कांटे, नुकीला थूथन और बड़े कान होते हैं, जबकि पेट के हिस्से में बहुत कम या बिल्कुल बाल नहीं होते।
यह मुख्य रूप से मिट्टी में रहने वाले कीड़ों को खाकर उनकी संख्या नियंत्रित करता है, जिससे पारिस्थितिकी संतुलन बना रहता है। यही वजह है कि इसे किसानों का मित्र भी समझा जाता है।
अगर हेजहॉग की संख्या तेजी से घटने लगे, तो यह साफ संकेत होता है कि पर्यावरण की गुणवत्ता बिगड़ रही है। शुष्क और अर्ध-शुष्क इलाकों में यह खाद्य श्रृंखला में एक अहम कड़ी के रूप में काम करता है, कभी शिकार तो कभी शिकारी और इसी भूमिका से यह पूरे प्राकृतिक संतुलन को स्थिर रखने में मदद करता है।
भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 में भी हाल ही में किए गए बदलाव के तहत मद्रास हेजहॉग को अनुसूची IV से बढ़ाकर अनुसूची II में शामिल किया गया है। यह बदलाव इस प्रजाति के बढ़ते संरक्षण महत्व और इसे बचाने की जरूरत को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
ऐसे में वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह जेनेटिक मैप भविष्य में इस संकटग्रस्त प्रजाति को बचाने और इनकी आबादी की निगरानी करने में एक मील का पत्थर साबित होगा।
इस मैप की मदद से आबादी और अनुकूलन क्षमता का बेहतर आकलन किया जा सकेगा। सच कहें तो 1851 में पहली बार पहचाने गए इस जीव का डीएनए अब हमें सिखा रहा है कि प्रकृति कैसे खुद को लाखों सालों तक सहेज कर रखती है। ऐसे में आज जरूरत है कि हम विकास की दौड़ में इस 'कांटों वाले नन्हे दोस्त' को पीछे न छोड़ दें।