वैज्ञानिकों ने एक बेहद गर्म "सुपर-अर्थ" का किया खुलासा, बुध जैसा दिखता है यह ग्रह

जेम्स वेब टेलीस्कोप से सबसे दूर का ग्रह एलएचएस 3844 बी की सतह का खुलासा, बिना वातावरण वाला गर्म, अंधकारमय और चट्टानी ग्रह होने के संकेत मिले
एलएचएस 3844 बी पर कोई वातावरण नहीं मिला, जिससे यह ग्रह अत्यधिक गर्म, अंधकारमय और जीवन के लिए प्रतिकूल माना जा रहा।
एलएचएस 3844 बी पर कोई वातावरण नहीं मिला, जिससे यह ग्रह अत्यधिक गर्म, अंधकारमय और जीवन के लिए प्रतिकूल माना जा रहा।फोटो साभार: नासा
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सारांश
  • जेम्स वेब टेलीस्कोप के एमआईआरआई उपकरण ने पहली बार दूरस्थ चट्टानी ग्रह एलएचएस 3844 बी की सतह की संरचना का अध्ययन किया।

  • एलएचएस 3844 बी पर कोई वातावरण नहीं मिला, जिससे यह ग्रह अत्यधिक गर्म, अंधकारमय और जीवन के लिए प्रतिकूल माना जा रहा।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार इस ग्रह की सतह बेसाल्ट चट्टानों से बनी हो सकती है, जो ज्वालामुखीय गतिविधियों से उत्पन्न होती हैं।

  • सल्फर डाइऑक्साइड गैस के संकेत नहीं मिलने से यह संभावना कम हुई कि ग्रह पर वर्तमान में ज्वालामुखी सक्रिय हैं।

  • यह शोध दर्शाता है कि अब वैज्ञानिक दूरस्थ ग्रहों की सतह और भूगर्भीय संरचना का भी अध्ययन करने में सक्षम हो चुके हैं।

अंतरिक्ष विज्ञान में एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। वैज्ञानिकों ने पहली बार किसी दूर के चट्टानी ग्रह की सतह यानी उसकी “जमीन” का अध्ययन किया है। यह काम जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन पर लगे अत्याधुनिक उपकरण एमआईआरआई (मिड-इंफ्रारेड इंस्ट्रूमेंट) की मदद से किया गया। यह अध्ययन प्रसिद्ध जर्नल नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित हुआ है।

अब तक वैज्ञानिक ज्यादातर ग्रहों के वातावरण (एटमॉस्फियर) का अध्ययन करते थे, लेकिन इस बार उन्होंने सीधे ग्रह की सतह के बारे में जानकारी हासिल की है। यह खोज भविष्य में दूसरे ग्रहों को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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कैसा है यह दूर का ग्रह

जिस ग्रह का अध्ययन किया गया, उसका नाम एलएचएस 3844 बी है। यह पृथ्वी से लगभग 48.5 प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है। आकार में यह पृथ्वी से करीब 30 प्रतिशत बड़ा है।

यह ग्रह अपने तारे के बहुत पास घूमता है और सिर्फ 11 घंटे में एक चक्कर पूरा कर लेता है। इसकी एक खास बात यह है कि यह “टाइडली लॉक्ड” है, यानी इसका एक हिस्सा हमेशा तारे की तरफ रहता है और दूसरा हिस्सा हमेशा अंधेरे में रहता है। तारे की तरफ वाला हिस्सा बेहद गर्म है, जहां तापमान लगभग 1000 केल्विन (करीब 725 डिग्री सेल्सियस) तक पहुंच जाता है।

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ग्रह पर नहीं है कोई वातावरण

वैज्ञानिकों ने पाया कि इस ग्रह पर कोई वातावरण नहीं है। इसका मतलब है कि वहां हवा, बादल या गैसों की कोई परत नहीं है, जैसा कि पृथ्वी पर होता है।

यह ग्रह बहुत अंधेरा और गर्म दिखाई देता है। इसकी सतह इतनी काली है कि यह सूर्य की रोशनी को ज्यादा सोख लेती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ग्रह हमारे सौरमंडल के बुध या चंद्रमा जैसा दिख सकता है।

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कैसे किया गया अध्ययन

वैज्ञानिक इस ग्रह की सीधी तस्वीर नहीं ले सकते। इसलिए उन्होंने एक खास तरीका अपनाया। उन्होंने तारे और ग्रह से आने वाली रोशनी में छोटे-छोटे बदलावों को मापा।

एमआईआरआई उपकरण ने पांच से 12 माइक्रोमीटर की इन्फ्रारेड रोशनी का विश्लेषण किया। इससे एक स्पेक्ट्रम तैयार किया गया, जिससे पता चलता है कि सतह किस तरह की है। इसके साथ ही पुराने आंकड़े, जो स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कोप से मिले थे, ने भी इस अध्ययन को मजबूत बनाया।

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पृथ्वी जैसी नहीं है सतह

शोध में पता चला कि इस ग्रह की सतह पृथ्वी जैसी नहीं है। पृथ्वी की सतह पर सिलिकेट और ग्रेनाइट जैसे पदार्थ पाए जाते हैं, जो पानी और प्लेट टेक्टोनिक्स की वजह से बनते हैं।

लेकिन एलएचएस 3844 बी पर ऐसे कोई संकेत नहीं मिले। इसका मतलब है कि वहां पृथ्वी जैसी भूगर्भीय गतिविधियां नहीं होतीं और शायद वहां पानी भी बहुत कम है।

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बेसाल्ट से बनी हो सकती है सतह

वैज्ञानिकों के अनुसार इस ग्रह की सतह बेसाल्ट नाम की चट्टान से बनी हो सकती है। यह वही प्रकार की चट्टान है जो ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा से बनती है।

यह चट्टान लोहे और मैग्नीशियम से भरपूर होती है। यह सतह या तो ठोस चट्टान के रूप में हो सकती है या फिर टूटकर धूल और छोटे पत्थरों में बदल गई हो सकती है।

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क्या ग्रह अभी भी सक्रिय है?

वैज्ञानिकों ने यह जानने की कोशिश की कि क्या इस ग्रह पर अभी भी ज्वालामुखी सक्रिय हैं। इसके लिए उन्होंने सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) गैस की खोज की, जो आमतौर पर ज्वालामुखी से निकलती है।

लेकिन उन्हें इस गैस के कोई संकेत नहीं मिले। इससे यह संभावना कम हो जाती है कि ग्रह पर अभी ज्वालामुखी सक्रिय हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि यह ग्रह अब ठंडा और निष्क्रिय हो चुका है और इसकी सतह लंबे समय से अंतरिक्ष के असर से बदलती रही है।

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क्यों है सतह इतनी काली

ग्रह पर वातावरण न होने के कारण उसकी सतह सीधे अंतरिक्ष के संपर्क में रहती है। उस पर लगातार उल्कापिंड गिरते हैं और तेज विकिरण पड़ता है। इन कारणों से चट्टानें टूटकर धूल में बदल जाती हैं और धीरे-धीरे उनकी सतह और भी काली हो जाती है।

आगे क्या करेंगे वैज्ञानिक

वैज्ञानिक अब इस ग्रह पर और अध्ययन करना चाहते हैं। वे यह जानने की कोशिश करेंगे कि सतह ठोस चट्टान की है या धूल और कणों से बनी है। इसके लिए वे रोशनी के अलग-अलग कोणों पर पड़ने के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। यह तकनीक पहले क्षुद्रग्रहों के अध्ययन में भी इस्तेमाल की जा चुकी है।

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नई दिशा में बढ़ता अंतरिक्ष विज्ञान

यह खोज इस बात का संकेत है कि अब वैज्ञानिक सिर्फ ग्रहों के वातावरण ही नहीं, बल्कि उनकी सतह और भूगर्भीय संरचना का भी अध्ययन कर सकते हैं।भविष्य में इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन से ग्रह पृथ्वी जैसे हैं और किन ग्रहों पर जीवन की संभावना हो सकती है।

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