

क्वांटम तकनीक बेहद कम रोशनी में भी धरती की तस्वीर लेने और महत्वपूर्ण जानकारी जुटाने में मदद कर सकती है।
क्यूईएमआरएस प्रणाली फोटॉन के आपसी संबंधों का इस्तेमाल करके अंधेरे क्षेत्रों में शोर से उपयोगी संकेत अलग कर सकती है।
ध्रुवीय रात, घने जंगल और समुद्र की गहरी परतें इस नई तकनीक के संभावित प्रमुख उपयोग क्षेत्र हो सकते हैं।
क्वांटम सेंसरों को अंतरिक्ष में इस्तेमाल करने के लिए अत्यधिक ठंडक, ज्यादा ऊर्जा और नई कैलिब्रेशन तकनीकों की जरूरत होगी।
वैज्ञानिकों के अनुसार क्यूईएमआरएस पारंपरिक सेंसरों का विकल्प नहीं, बल्कि बेहद कम रोशनी वाले क्षेत्रों के लिए पूरक तकनीक होगा।
धरती को अंतरिक्ष से देखने वाले उपग्रहों ने मौसम, जंगल, समुद्र, खेती और पर्यावरण की निगरानी में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन इन उपग्रहों की एक बड़ी सीमा है-अंधेरा। जब किसी इलाके में रोशनी बहुत कम होती है, तो सामान्य ऑप्टिकल कैमरों के लिए वहां की तस्वीर लेना बेहद मुश्किल हो जाता है। अब वैज्ञानिक क्वांटम तकनीक की मदद से इस समस्या का समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं।
कम रोशनी में खत्म हो जाती है पारंपरिक तकनीक की ताकत
अभी इस्तेमाल होने वाले कई ऑप्टिकल सेंसर वस्तुओं से लौटने वाली रोशनी पर निर्भर करते हैं। दिन के समय या पर्याप्त रोशनी वाले इलाकों में ये सेंसर बहुत अच्छी तस्वीरें दे सकते हैं। लेकिन ध्रुवीय क्षेत्रों की लंबी रात, घने उष्णकटिबंधीय जंगलों की छाया और समुद्र की गहरी परतों जैसे स्थानों पर प्रकाश बहुत कम होता है।
ऐसे में सेंसर तक पहुंचने वाले फोटॉन यानी प्रकाश के बेहद छोटे कणों की संख्या घट जाती है। नतीजा यह होता है कि तस्वीर में उपयोगी जानकारी और शोर के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समस्या केवल बेहतर कैमरा बनाने की नहीं है। बहुत कम रोशनी की स्थिति में पारंपरिक तरीके खुद एक भौतिक सीमा तक पहुंच जाते हैं।
क्वांटम तकनीक से नई राह
इसी चुनौती को देखते हुए शोधकर्ताओं ने एक नई रूपरेखा पेश की है। इसे क्वांटम-एन्हांस्ड मल्टीस्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग (क्यूईएमआरएस) नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य क्वांटम फोटोनिक्स की तकनीकों को पृथ्वी की निगरानी करने वाले उपग्रहों में इस्तेमाल करना है।
सामान्य कैमरे मुख्य रूप से यह देखते हैं कि कितनी रोशनी सेंसर तक पहुंची। इसके विपरीत, क्वांटम तकनीक अलग-अलग फोटॉन के आने के समय और उनके बीच मौजूद संबंधों की जानकारी का इस्तेमाल कर सकती है। इससे बेहद कम रोशनी में भी उपयोगी संकेतों को पहचानने की संभावना बढ़ जाती है। यह शोध रिमोट सेंसिंग ऑफ एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
शोर के बीच असली संकेत की पहचान
इस तकनीक में टाइम-कोरिलेटेड सिंगल-फोटॉन काउंटिंग और इंटेंसिटी-कोरिलेशन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल प्रस्तावित किया गया है। आसान भाषा में कहें तो सेंसर केवल रोशनी की मात्रा नहीं गिनेगा, बल्कि यह भी देखेगा कि फोटॉन कब और किस तरह एक-दूसरे से संबंधित होकर पहुंचे।
इसके लिए बेहद संवेदनशील सुपरकंडक्टिंग नैनोवायर सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें बहुत कम तापमान पर चलाना पड़ता है। ये डिटेक्टर बेहद कम संख्या में आने वाले फोटॉन को भी पकड़ सकते हैं।
उपग्रह खुद भी भेज सकता है प्रकाश
क्यूईएमआरएस का दूसरा तरीका और भी दिलचस्प है। इसमें उपग्रह खुद प्रकाश के क्वांटम कणों की एक जोड़ी पैदा कर सकता है। इनमें से एक कण धरती की ओर भेजा जाएगा, जबकि दूसरे कण को उपग्रह पर सुरक्षित रखा जाएगा।
धरती से टकराने के बाद जब पहला कण वापस उपग्रह की ओर आएगा, तो दोनों कणों की तुलना की जाएगी। भले ही वातावरण के कारण उनका मूल क्वांटम संबंध कमजोर हो जाए, फिर भी कुछ उपयोगी संबंध बचे रह सकते हैं। इससे बहुत तेज पृष्ठभूमि शोर के बीच भी लक्ष्य को पहचानने में मदद मिल सकती है। इस तकनीक को क्वांटम इल्यूमिनेशन कहा जाता है।
अंतरिक्ष में इस्तेमाल आसान नहीं
हालांकि यह तकनीक अभी प्रयोगात्मक और शोध के स्तर पर है। इसे अंतरिक्ष में भेजना आसान नहीं होगा। पृथ्वी का वातावरण प्रकाश को प्रभावित करता है। इसके अलावा अत्यधिक संवेदनशील क्वांटम सेंसरों को ठंडा रखने के लिए भारी और ऊर्जा खपत करने वाली प्रणालियों की जरूरत पड़ सकती है।
इसलिए शुरुआत में ऐसे उपग्रह लगातार पूरी पृथ्वी की निगरानी करने के बजाय केवल उन खास इलाकों पर ध्यान दे सकते हैं जहां सामान्य सेंसर लगभग काम नहीं कर पाते।
पृथ्वी की निगरानी का नया दौर
वैज्ञानिकों के अनुसार क्यूईएमआरएस पारंपरिक पृथ्वी-अवलोकन तकनीकों को खत्म करने के बजाय उनका पूरक बन सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा उन जगहों पर हो सकता है जहां रोशनी बेहद कम है।
अगर इस तकनीक को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा सका, तो ध्रुवीय रात, घने जंगलों और समुद्र के गहरे हिस्सों जैसे अब तक कठिन माने जाने वाले क्षेत्रों से नई वैज्ञानिक जानकारी हासिल की जा सकेगी। यानी भविष्य में अंतरिक्ष से धरती को देखने की क्षमता केवल ज्यादा शक्तिशाली कैमरों पर नहीं, बल्कि प्रकाश के क्वांटम गुणों को समझने और इस्तेमाल करने पर भी निर्भर कर सकती है।