भारतीय वैज्ञानिकों का खुलासा: छोटी आकाशगंगाओं में भी छिपे हो सकते हैं ब्लैक होल

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन से संकेत मिला है कि छोटी और धुंधली आकाशगंगाओं में भी ब्लैक होल मौजूद हो सकते हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारतीय वैज्ञानिकों के नए अध्ययन से संकेत मिला है कि मिल्की वे के आसपास की छोटी और धुंधली आकाशगंगाओं में भी ब्लैक होल मौजूद हो सकते हैं।

  • तारों की गति के विश्लेषण के आधार पर वैज्ञानिकों ने इनके द्रव्यमान की सीमाएं तय कीं और पाया कि यहां बड़े नहीं, बल्कि मध्यम आकार के ब्लैक होल हो सकते हैं।

  • यह अध्ययन ब्लैक होल और आकाशगंगाओं के विकास को समझने में अहम भूमिका निभा सकता है।

ब्रह्मांड की सबसे छोटी आकाशगंगाओं में भी बड़े रहस्य छिपे हो सकते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन ने यह संभावना जताई है कि हमारी मिल्की वे (आकाशगंगा) के आसपास घूमने वाली बेहद छोटी, धुंधली और गोलाकार आकाशगंगाओं (ड्वार्फ स्फेरॉइडल गैलेक्सीज) में भी ब्लैक होल मौजूद हो सकते हैं।

यह खोज कॉस्मिक टाइम में ब्लैक होल के जन्म और आकाशगंगाओं के विकास को समझने में अहम कड़ी साबित हो सकती है।

आम तौर पर विशाल आकाशगंगाओं के केंद्र में सुपरमैसिव ब्लैक होल नियमित रूप से पाए जाते हैं, लेकिन छोटी आकाशगंगाएं बहुत मंद, गैस-विहीन और डार्क मैटर से भरी होती हैं। इसी कारण इनमें ब्लैक होल का पता लगाना बेहद कठिन रहा है।

छोटी आकाशगंगाओं में बड़ा रहस्य

यह सवाल सिर्फ खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में पहले ब्लैक होल कैसे बने, वे छोटे कम द्रव्यमान वाले वातावरण में कैसे बढ़े, और क्या आकाशगंगाओं के केंद्र में ब्लैक होल के द्रव्यमान और तारों की गति के बीच संबंध (वेलोसिटी डिस्पर्शन) जो बड़ी आकाशगंगाओं में देखा जाता है, क्या वह सबसे छोटी आकाशगंगाओं में भी लागू होता है या नहीं। गौरतलब है कि ‘वेलोसिटी डिस्पर्शन’ आकाशगंगाओं की संरचना और विकास को समझने में एक अहम संकेतक है।

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इसका जवाब इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इससे हमें पूरे ब्रह्मांड में समय के साथ ब्लैक होल कैसे विकसित हुए, इसकी एक साफ और बेहतर समझ मिल सकेगी।

भारत के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के वैज्ञानिकों, के आदित्य और अरुण मंगलम ने इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। उन्होंने मिल्की वे के आसपास घूमने वाली छोटी गोलाकार आकाशगंगाओं के सटीक मॉडल तैयार किए। इन मॉडलों में तारे, डार्क मैटर का घेरा और संभावित सेंट्रल ब्लैक होल तीनों प्रमुख घटक शामिल हैं।

तारों की गति से मिला सुराग

उन्होंने तारों की गति से जुड़े उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़ों का उपयोग कर यह समझा कि इन आकाशगंगाओं में तारे कैसे चलते हैं, और इसी आधार पर यह अनुमान लगाया कि अगर कोई ब्लैक होल मौजूद है, तो उसका द्रव्यमान कितना हो सकता है।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने स्टेलर एनीसोट्रॉपी तकनीक का उपयोग किया, यानी तारों की गति हर दिशा में एक जैसी नहीं होती, कुछ केंद्र की ओर (रेडियल) और कुछ गोलाकार (टैन्जेंशियल) होती है। इससे आकाशगंगाओं में तारों की वास्तविक गति को बेहतर तरीके से समझना संभव हुआ।

इस तरीके से उन्होंने एक साथ तारों, डार्क मैटर और संभावित ब्लैक होल के प्रभाव का आकलन किया। वैज्ञानिकों ने इसकी मदद से कई छोटी गोलाकार आकाशगंगाओं का विश्लेषण कर ब्लैक होल के द्रव्यमान की मजबूत सीमाएं तय कीं।

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सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने अपने नतीजों को पहले के शोधों से जोड़कर ब्लैक होल के द्रव्यमान और तारों की गति के बीच एक एकीकृत संबंध तैयार किया। यह संबंध करीब 10 से 300 किलोमीटर प्रति सेकंड तक की गति को कवर करता है और ब्लैक होल के द्रव्यमान की बहुत बड़ी रेंज को समझने में मदद करता है।

शोध के मुताबिक, इन छोटी आकाशगंगाओं में ब्लैक होल का द्रव्यमान आमतौर पर 10 लाख सूर्य द्रव्यमान से कम होता है, जबकि कई मामलों में यह इससे भी काफी कम हो सकता है। यानी यहां विशाल ब्लैक होल का होना जरूरी नहीं, बल्कि ये मध्यम द्रव्यमान (इंटरमीडिएट) के ब्लैक होल की मौजूदगी से अधिक मेल खाते हैं।

छोटी-बड़ी आकाशगंगाओं को जोड़ता नियम

सबसे अहम बात यह है कि इस अध्ययन ने ब्लैक होल के द्रव्यमान और तारों की गति के बीच एक एकीकृत संबंध का सुझाव देता है, जो छोटी से बड़ी सभी आकाशगंगाओं पर लागू होता है। यह संबंध ब्रह्मांड में ब्लैक होल के विकास को समझने के लिए अब तक का सबसे व्यापक आधार बन सकता है। हालांकि छोटी आकाशगंगाओं के मामले में थोड़ी अनिश्चितता बनी रहती है।

कुल मिलाकर, यह शोध इस संबंध को समझने के लिए अब तक का सबसे व्यापक और भरोसेमंद आधार देता है।

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता अरुण मंगलम ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि, “उन्होंने अपने नतीजों की तुलना ब्लैक होल के बढ़ने के अलग-अलग वैज्ञानिक मॉडलों से भी की है।

क्या बताते हैं वैज्ञानिक मॉडल?

उन्होंने पाया कि गैस के जरिए बढ़ने वाले मॉडल छोटी आकाशगंगाओं में करीब 1,000 सूर्य द्रव्यमान तक के ब्लैक होल का अनुमान देते हैं, जबकि तारों को पकड़ने (स्टेलर कैप्चर) की प्रक्रिया से यह 10,000 सूर्य द्रव्यमान या उससे ज्यादा तक बढ़ सकता है, यहां तक कि जब गैस मिलना बंद हो जाए तब भी। अच्छी बात यह है कि ये दोनों अनुमान उन सीमाओं के अंदर ही आते हैं, जो अवलोकन से सामने आई हैं।“

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इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने एक और संभावना भी देखी कि ये छोटी गोलाकार आकाशगंगाएं पहले बड़ी रही हों और मिल्की वे के साथ टकराव या खिंचाव (टाइडल स्ट्रिपिंग) के कारण अपने कई तारे खो चुकी हों। यह भी इस रहस्य को समझाने का एक दूसरा तरीका हो सकता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक यह अध्य्यन सिद्धांत और भविष्य के अवलोकनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। छोटी से छोटी आकाशगंगाओं तक एक समान संबंध स्थापित कर यह आकाशगंगाओं और ब्लैक होल के विकास को समझने के लिए एक मजबूत आधार देता है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले अत्याधुनिक टेलीस्कोप जैसे प्रस्तावित नेशनल लार्ज ऑप्टिकल टेलीस्कोप और अत्यंत विशाल टेलीस्कोप (ईएलटी), इन छोटी और धुंधली आकाशगंगाओं में तारों की गति का पहले से कहीं अधिक सटीक अवलोकन कर सकेंगे।

इन नई सुविधाओं के जरिए वैज्ञानिक यह स्पष्ट कर पाएंगे कि क्या वास्तव में छोटी आकाशगंगाओं में प्रारंभिक ब्लैक होल के संकेत मौजूद हैं। साथ ही, अध्ययन में बताए गए अलग-अलग मॉडल जैसे गैस से ब्लैक होल का बढ़ना, तारों को पकड़कर बढ़ना या आकाशगंगाओं का टूटना, ऐसी भविष्यवाणियां करते हैं जिन्हें आने वाले समय में नई दूरबीनों से सीधे जांचा जा सकेगा।

अगर ऐसा साबित होता है, तो यह खोज ब्रह्मांड के जन्म और विकास की हमारी समझ को एक नई दिशा दे सकती है।

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