क्या ब्लैक होल से भी निकाली जा सकती है ऊर्जा? पेनरोज प्रक्रिया से जगी नई उम्मीद

ब्लैक होल की घूमती ताकत से निकल सकती है ऊर्जा, वैज्ञानिक खोज रहे पेनरोज प्रक्रिया के गामा किरणों और न्यूट्रिनो संकेत
वैज्ञानिकों ने घूमते ब्लैक होल से ऊर्जा निकलने की पेनरोज प्रक्रिया के संभावित संकेत खोजने का नया तरीका बताया है।
वैज्ञानिकों ने घूमते ब्लैक होल से ऊर्जा निकलने की पेनरोज प्रक्रिया के संभावित संकेत खोजने का नया तरीका बताया है।प्रतीकात्मक छवि, साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • वैज्ञानिकों ने घूमते ब्लैक होल से ऊर्जा निकलने की पेनरोज प्रक्रिया के संभावित संकेत खोजने का नया तरीका बताया है।

  • ब्लैक होल के एर्गोस्फीयर में चुंबकीय क्षेत्र न्यूट्रॉन से बने प्रोटॉन को बेहद ज्यादा ऊर्जा दे सकते हैं।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार ये ऊर्जावान प्रोटॉन गैस से टकराकर खास गामा किरणें पैदा कर सकते हैं, जिन्हें दूर से देखा जा सकता है।

  • न्यूट्रॉन के क्षय से निकलने वाले न्यूट्रिनो भी इस प्रक्रिया के महत्वपूर्ण संकेत बन सकते हैं, जिससे खोज आसान होगी।

  • भविष्य की उन्नत वेधशालाएं गामा किरणों और न्यूट्रिनो को पकड़कर ब्लैक होल की घूर्णन ऊर्जा का प्रमाण दे सकती हैं।

अंतरिक्ष में ब्लैक होल को आमतौर पर ऐसी जगह माना जाता है, जहां पहुंचने वाली हर चीज हमेशा के लिए गायब हो जाती है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार, घूमते हुए ब्लैक होल की कहानी थोड़ी अलग है। इनसे सीधे ऊर्जा निकाली जा सकती है। इसे पेनरोज प्रक्रिया कहा जाता है। अब एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने यह पता लगाने की कोशिश की है कि इस प्रक्रिया के सबूत अंतरिक्ष में कैसे खोजे जा सकते हैं।

घूमते ब्लैक होल की खासियत

ब्लैक होल के आसपास गिरने वाला पदार्थ बहुत गर्म हो जाता है। इसके चारों ओर गैस और प्लाज्मा की एक चमकदार डिस्क बन सकती है, जिसमें जबरदस्त चुंबकीय क्षेत्र मौजूद होते हैं। इसी प्रक्रिया से ब्लैक होल के आसपास से भारी मात्रा में ऊर्जा निकल सकती है। यह शोध अरक्षिव प्रीप्रिंट सर्वर पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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लेकिन घूमते हुए ब्लैक होल के पास ऊर्जा हासिल करने का एक और तरीका है। इसका संबंध उसके एर्गोस्फीयर नाम के क्षेत्र से है।

जब कोई ब्लैक होल घूमता है तो वह अपने आसपास के अंतरिक्ष और समय को भी घुमाने लगता है। इसे फ्रेम ड्रैगिंग कहा जाता है। ब्लैक होल के बहुत करीब यह प्रभाव इतना शक्तिशाली हो जाता है कि कोई भी वस्तु उसके घूमने से बच नहीं सकती। इसी क्षेत्र को एर्गोस्फीयर कहा जाता है।

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1969 में सामने आया था विचार

पेनरोज प्रक्रिया का विचार ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी रोजर पेनरोज ने 1969 में दिया था। इसका मूल विचार काफी दिलचस्प है।

मान लीजिए कोई अंतरिक्ष यान घूमते हुए ब्लैक होल के एर्गोस्फीयर में पहुंचता है। वहां वह अपना कुछ बेकार सामान बाहर फेंक देता है। यह सामान ब्लैक होल में गिर जाता है, जबकि अंतरिक्ष यान बाहर निकल आता है।

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आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत और ऊर्जा संरक्षण के नियमों के अनुसार, कुछ खास परिस्थितियों में बाहर निकलने वाले यान के पास शुरुआत से ज्यादा ऊर्जा हो सकती है। यह अतिरिक्त ऊर्जा ब्लैक होल की घूर्णन ऊर्जा से आती है। यानी ब्लैक होल खुद अपनी कुछ ऊर्जा खो देता है।

चुंबकीय क्षेत्र बना सकता है प्रक्रिया को ज्यादा ताकतवर

सामान्य पेनरोज प्रक्रिया को बहुत प्रभावी ऊर्जा स्रोत नहीं माना जाता। लेकिन अगर इसमें ब्लैक होल के शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र को शामिल किया जाए तो स्थिति बदल सकती है। इसे मैग्नेटिक पेनरोज प्रक्रिया (एमपीपी) कहा जाता है।

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नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने किसी काल्पनिक अंतरिक्ष यान की जगह एक वास्तविक कण को आधार बनाया है। उन्होंने हमारी आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद विशाल ब्लैक होल सैजिटेरियस ए* यानी सगर ए* के आसपास की परिस्थितियों का अध्ययन किया।

न्यूट्रॉन से निकल सकते हैं बेहद ऊर्जावान प्रोटॉन

वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर कोई न्यूट्रॉन ब्लैक होल के एर्गोस्फीयर में प्रवेश करता है तो वह रेडियोधर्मी क्षय के जरिए एक प्रोटॉन, एक इलेक्ट्रॉन और एक न्यूट्रिनो में बदल सकता है।

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प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन विद्युत आवेश वाले कण हैं। इसलिए वे ब्लैक होल के आसपास मौजूद शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं। सही परिस्थितियों में यह प्रक्रिया प्रोटॉन को बेहद बड़ी ऊर्जा दे सकती है।

अध्ययन के अनुमान के मुताबिक, ऐसे प्रोटॉन पेटाइलेक्ट्रॉनवोल्ट (पीईवी) स्तर की ऊर्जा तक पहुंच सकते हैं। यह ऊर्जा आधुनिक कण त्वरकों में हासिल की जाने वाली ऊर्जा से कई गुना अधिक है।

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अंतरिक्ष में मिल सकता है खास संकेत

इतनी ऊर्जा वाले प्रोटॉन ब्लैक होल के आसपास मौजूद गैस से टकरा सकते हैं। इन टक्करों से बहुत ऊर्जावान गामा किरणें पैदा हो सकती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन गामा किरणों के स्पेक्ट्रम में एक खास तरह का संकेत दिखाई दे सकता है।

इसके साथ ही न्यूट्रॉन के क्षय से पैदा हुआ न्यूट्रिनो भी अंतरिक्ष में आगे बढ़ सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों को एक साथ दो तरह के संकेत मिलने की उम्मीद है-गामा किरणें और बेहद ऊर्जावान न्यूट्रिनो।

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भविष्य की वेधशालाओं से मिल सकती है सफलता

फिलहाल इन संकेतों को सीधे पकड़ना बेहद मुश्किल है। लेकिन भविष्य में हाई-एल्टीट्यूड वॉटर चेरेंकोव (एचएडब्ल्यूसी) जैसी गामा-रे वेधशालाओं के उन्नत संस्करण और आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी की नई क्षमताएं इन्हें खोजने में मदद कर सकती हैं।

अगर वैज्ञानिकों को सगर ए* की दिशा से अपेक्षित गामा किरणों और न्यूट्रिनो का सही संयोजन मिल जाता है, तो यह पेनरोज प्रक्रिया के पक्ष में महत्वपूर्ण सबूत होगा। इससे यह भी पता चल सकता है कि ब्लैक होल केवल पदार्थ को निगलने वाली वस्तुएं नहीं हैं। वे अपनी घूमने की ऊर्जा भी अंतरिक्ष में पहुंचा सकते हैं। यानी सही परिस्थितियों में ब्लैक होल अपने ही घूर्णन से ऊर्जा का स्रोत बन सकते हैं।

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