

शहरों में मूसलाधार बारिश के बाद सड़कों का दरिया बन जाना, घरों में पानी भरना और जनजीवन का ठप पड़ना अब आम होता जा रहा है। ऐसे में बाढ़ की समय रहते और सटीक चेतावनी देना लाखों लोगों की जान और संपत्ति बचाने के लिए बेहद जरूरी है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस दिशा में एक नया रास्ता दिखाया है।
अध्ययन के मुताबिक, हवा में मौजूद प्रदूषण के बेहद महीन कण यानी एयरोसोल बादलों के निर्माण और बारिश के समय, तीव्रता तथा फैलाव को प्रभावित कर सकते हैं। इन्हें मौसम के पूर्वानुमान में शामिल करने से भारी बारिश और शहरी बाढ़ का आकलन अधिक सटीक बनाया जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने चेन्नई में दिसंबर 2015 की भीषण बारिश और बाढ़ को आधार बनाकर अध्ययन किया। इसमें एयरोसोल और बादलों के बीच होने वाली प्रक्रियाओं को मौसम के मॉडल में शामिल करने से बारिश के अनुमान में करीब 22 फीसदी और बाढ़ में डूबने वाले क्षेत्रों के सिमुलेशन की सटीकता में करीब 50 फीसदी सुधार दर्ज किया गया।
इससे चेन्नई जैसे तेजी से बढ़ते महानगरों में बारिश, जलाशयों में पानी की आवक और बाढ़ के प्रबंधन से जुड़े फैसलों को बेहतर बनाने की उम्मीद जगी है। हालांकि, इस तकनीक को वास्तविक समय में बाढ़ की चेतावनी देने योग्य बनाने और दूसरे शहरों में इसकी उपयोगिता साबित करने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।
शहरों में जब मूसलाधार बारिश होती है, तो कुछ ही घंटों में सड़कें दरिया बन जाती हैं। घरों में पानी भर जाता है, यातायात ठप पड़ जाता है और लोगों को अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की तलाश करनी पड़ती है। ऐसी आपदाओं में समय रहते बारिश और बाढ़ का सटीक पूर्वानुमान लाखों लोगों की जान और संपत्ति बचा सकता है।
लेकिन क्या बाढ़ का बेहतर अनुमान लगाने के लिए सिर्फ बारिश के आंकड़े जानना काफी है? भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस सवाल का नया जवाब दिया है।
अध्ययन के मुताबिक, हवा में मौजूद प्रदूषण के बेहद महीन कण भी बारिश के स्वरूप और उसके प्रसार को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में यदि मौसम का पूर्वानुमान लगाते समय इन कणों की भूमिका को भी शामिल किया जाए, तो भारी बारिश और उससे पैदा होने वाली शहरी बाढ़ का अनुमान पहले से अधिक सटीक हो सकता है।
इसे समझने के लिए शोधकर्ताओं ने चेन्नई में दिसंबर 2015 के दौरान हुई भीषण बारिश और बाढ़ की घटना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि वातावरण में मौजूद एयरोसोल (हवा में तैरते बेहद महीन कण) और बादलों के निर्माण में उनकी भूमिका को मौसम के मॉडल में शामिल करने से बारिश के अनुमान में करीब 22 फीसदी सुधार हुआ। इसका असर आगे बाढ़ के अनुमान पर भी पड़ा। बाढ़ में डूबने वाले क्षेत्रों के सिमुलेशन की सटीकता में करीब 50 फीसदी सुधार दर्ज किया गया।
आमतौर पर बारिश और बाढ़ के पूर्वानुमान में बादलों, नमी, तापमान और बारिश की मात्रा पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन हवा में मौजूद एयरोसोल भी बादलों के बनने और बारिश की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
ये सूक्ष्म कण बादलों में पानी की बूंदें बनने के लिए आधार का काम करते हैं। इन्हें क्लाउड कंडेंसेशन न्यूक्लियाई (सीसीएन) कहा जाता है। इनकी मात्रा और प्रकृति में बदलाव होने से बादलों की बनावट और बारिश की जगह, समय तथा तीव्रता प्रभावित हो सकती है।
आईआईटी मद्रास के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता चंदन सारंगी के मुताबिक, शहरी में आने वाली बाढ़ का पूर्वानुमान लगाते समय अक्सर बारिश से जमीन पर बहने वाले पानी यानी रनऑफ का अनुमान लगाने पर अधिक ध्यान दिया जाता है। लेकिन मौसम के मौजूदा मॉडल कई बार यह ठीक से नहीं बता पाते कि शहर के किस हिस्से में और किस समय कितनी बारिश होगी।
उनका कहना है कि इस अध्ययन से पता चलता है कि बारिश शुरू होने से पहले और उसके दौरान वायुमंडल में होने वाली प्रक्रियाएं भी बारिश के स्थानीय स्वरूप को प्रभावित करती हैं।
यदि एयरोसोल और बादलों के बीच होने वाली पारस्परिक क्रिया को मॉडल में शामिल किया जाए, तो बारिश के स्थान और समय का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है। इससे बाढ़ के पूर्वानुमान में भी सुधार संभव है।
शोधकर्ताओं ने इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए तीन अलग-अलग मॉडल का इस्तेमाल किया। सबसे पहले मौसम संबंधी प्रक्रियाओं और अलग-अलग एयरोसोल परिस्थितियों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए वेदर रिसर्च एंड फोरकास्टिंग (डब्ल्यूआरएफ) मॉडल का इस्तेमाल किया गया।
इसके बाद बारिश से जमीन पर बहने वाले पानी और जलाशयों में पहुंचने वाले पानी का आकलन करने के लिए एचईसी-एचएमएस मॉडल अपनाया गया। अंत में एचईसी-आरएएस मॉडल की मदद से यह समझने की कोशिश की गई कि चेन्नई के अड्यार नदी बेसिन में बाढ़ का पानी किन क्षेत्रों में और किस हद तक फैल सकता है।
इस तरह शोधकर्ताओं ने वायुमंडल में मौजूद प्रदूषण के सूक्ष्म कणों से लेकर बारिश, जल प्रवाह और बाढ़ में डूबने वाले क्षेत्रों तक की पूरी प्रक्रिया का अध्ययन किया।
चेन्नई जैसे तेजी से बढ़ते तटीय शहरों में भारी बारिश के दौरान जल प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। यहां बारिश का पानी कहां और कितनी मात्रा में गिरेगा, इसका सटीक अनुमान जलाशयों के प्रबंधन के लिए बेहद जरूरी है।
आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर एस एन कुइरी के मुताबिक, चेन्नई जैसे महानगरों में बारिश का पूर्वानुमान जल संसाधनों के प्रबंधन से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बारिश का समय और उसका भौगोलिक फैलाव सीधे तौर पर जमीन पर बहने वाले पानी, जलाशयों में पानी की आवक और बाढ़ के खतरे को प्रभावित करता है।
इसलिए मौसम, जल विज्ञान और बाढ़ के पानी के फैलाव का एक साथ अध्ययन करने वाली प्रणाली शहरों को बेहतर फैसले लेने में मदद कर सकती है। खासकर मानसून के दौरान जलाशयों में कितना पानी जमा रखा जाए और कब कितना पानी छोड़ा जाए, ऐसे फैसलों के लिए सटीक पूर्वानुमान बेहद महत्वपूर्ण है।
हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन अभी किसी तैयार और इस्तेमाल योग्य बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली का विकल्प नहीं है। फिलहाल इसके नतीजे चेन्नई में 2015 की एक बड़ी बारिश और बाढ़ की घटना पर आधारित हैं। यह जांचना अभी बाकी है कि दूसरे वर्षों की भारी बारिश और अन्य शहरों में भी इसी तरह के परिणाम मिलते हैं या नहीं।
इसके लिए हवा में मौजूद एयरोसोल, सीसीएन और शहरी उत्सर्जन से जुड़े अधिक सटीक आंकड़ों की जरूरत होगी। साथ ही, इन मॉडलों में इस्तेमाल होने वाली जटिल गणनाओं को इतना तेज बनाना भी जरूरी होगा कि उनका इस्तेमाल वास्तविक समय में बाढ़ की चेतावनी देने के लिए किया जा सके।
यह अध्ययन आईआईटी मद्रास, जर्मनी के जीएफजेड हेल्महोल्ट्ज सेंटर फॉर जियोसाइंसेज, जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जाक्सा) और नेपाल की काठमांडू यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचुरल हैजर्ड्स एंड अर्थ सिस्टम साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं।
कुल मिलाकर देखें तो यह अध्ययन शहरी बाढ़ को समझने का एक नया नजरिया देता है। यह बताता है कि शहरों में बाढ़ का खतरा सिर्फ आसमान से बरसने वाले पानी पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उस हवा पर भी निर्भर हो सकता है जिसमें हम सांस लेते हैं। भविष्य में यदि इस वैज्ञानिक तरीके को और बेहतर बनाया जा सका, तो यह भारी बारिश से पहले लोगों को सतर्क करने और शहरों को बाढ़ से होने वाले नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।