

भारत का मानसून केवल स्थानीय मौसम या देश के प्रदूषण से तय नहीं होता, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में हवा कितनी साफ है, इसका भी उस पर गहरा असर पड़ता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में सामने आया है कि यदि दुनिया के सभी देश मिलकर वायु प्रदूषण कम करें, तो भारत में मानसूनी बारिश केवल दक्षिण एशिया के प्रयासों की तुलना में करीब 50 फीसदी अधिक बढ़ सकती है।
अध्ययन बताता है कि प्रदूषण कम होने पर सूर्य की अधिक ऊर्जा धरती तक पहुंचती है, जिससे सतह गर्म होती है और मानसूनी हवाएं मजबूत बनती हैं। हालांकि, यदि केवल चीन और पूर्वी एशिया अपने यहां प्रदूषण घटाते हैं, तो भारत के कुछ हिस्सों में मानसून का पैटर्न बदल सकता है और बारिश कम भी हो सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अब साफ हवा की लड़ाई केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और जल संसाधनों से जुड़ा वैश्विक विषय बन चुकी है।
यह अध्ययन याद दिलाता है कि दुनिया के एक हिस्से में लिए गए पर्यावरणीय फैसले हजारों किलोमीटर दूर भारत के खेतों, किसानों और करोड़ों लोगों के भविष्य को भी प्रभावित कर सकते हैं।
भारत का किसान जब उम्मीद भरी नजरों से आसमान की ओर देखता है, तो उसकी नजर सिर्फ बादलों पर नहीं, बल्कि अपनी फसल, परिवार और पूरे साल की आजीविका पर टिकी होती हैं।
लेकिन अब एक नई वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि भारत में मानसूनी बारिश केवल देश के मौसम या प्रदूषण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में हवा कितनी साफ है, इसका भी उस पर गहरा असर पड़ता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा की गई इस नई रिसर्च के मुताबिक यदि दुनिया भर में वायु प्रदूषण को कम किया जाए तो भारत में मानसून के दौरान केवल दक्षिण एशिया में प्रदूषण कम करने की तुलना में कहीं अधिक बारिश हो सकती है।
यानी भारत का मानसून अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक पर्यावरणीय नीतियों से भी प्रभावित होता है।
अध्ययन बताता है कि साफ हवा के लिए देशों के बीच सहयोग भारत में मानसून को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है। मतलब कि साफ हवा की लड़ाई अब केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक सहयोग का विषय बन चुकी है।
धूप, हवा और बारिश का वो गणित, जिसे प्रदूषण बिगाड़ देता है
वैज्ञानिकों के मुताबिक, वायु प्रदूषण सूर्य की किरणों को जमीन और समुद्र तक पूरी तरह पहुंचने से रोकता है। इससे धरती कम गर्म होती है और मानसून कमजोर पड़ जाता है।
लेकिन दूसरी तरफ जब किसी क्षेत्र में प्रदूषण कम होता है, तो धूप अधिक मात्रा में सीधे जमीन तक पहुंचती है। इससे सतह गर्म होती है, नतीजतन मानसूनी हवाओं के मजबूत होने से बारिश बढ़ने लगती है। चीन और पूर्वी एशिया में ठीक यही हो रहा है।
अध्ययन में पाया गया कि इन देशों में प्रदूषण कम होने से अधिक धूप जमीन तक पहुंचती है। इससे वहां की सतह का तापमान करीब एक डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। इसकी वजह से गर्मियों में मानसून के दौरान औसतन हर दिन 0.20 मिलीमीटर अधिक बारिश होती है।
लेकिन प्रकृति का यह संतुलन बेहद नाजुक है। एक देश की पर्यावरण नीति कभी-कभी दूसरे देश के मौसम पर भी असर डाल सकती है।
अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि यदि चीन और पूर्वी एशिया के देश अकेले अपने यहां ही प्रदूषण को कम करते हैं, तो उसका असर हजारों किलोमीटर दूर भारत में मानसून पर पड़ सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, चीन और पूर्वी एशिया में प्रदूषण कम होने से भारत के पश्चिम-मध्य और पूर्वी हिस्सों में मानसूनी हवाओं का पैटर्न बदल सकता है। इससे देश के इन हिस्सों में हर दिन बारिश में 0.2 से 0.6 मिलीमीटर तक की कमी आ सकती है। यानी हजारों किलोमीटर दूर प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए फैसले भारत में मानसून को प्रभावित कर सकते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंटल रिसर्च: क्लाइमेट में प्रकाशित हुए हैं।
दुनिया मिलकर कम करे प्रदूषण तो भारत को होगा सबसे ज्यादा फायदा
वैज्ञानिकों ने दस अलग-अलग जलवायु मॉडलों की मदद से यह समझने की कोशिश की है कि विभिन्न देशों में प्रदूषण कम होने से भारतीय मानसून पर क्या असर पड़ता है। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय परियोजना RAMIP के तहत दुनिया भर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए हजारों कंप्यूटर सिमुलेशन पर आधारित है।
नतीजों से पता चला कि यदि केवल दक्षिण एशिया में प्रदूषण कम किया जाए तो भारत में हर दिन औसतन 0.19 मिलीमीटर अतिरिक्त बारिश हो सकती है।
लेकिन यदि दुनिया भर के देश मिलकर प्रदूषण घटाएं, तो यह बढ़कर 0.28 मिलीमीटर प्रतिदिन तक पहुंच सकती है। यानी वैश्विक स्तर पर प्रदूषण को नियंत्रित करने से दक्षिण एशिया के अकेले प्रयास के मुकाबले भारत को करीब 50 फीसदी अधिक मानसूनी बारिश मिल सकती है।
इसका सबसे ज्यादा फायदा उत्तरी बंगाल की खाड़ी, पश्चिमी घाट और गंगा के मैदानी इलाकों में देखने को मिल सकता है।
हजारों किलोमीटर दूर लिए फैसलों से भी जुड़ी है किसानों की किस्मत
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता अंकित भंडेकर कहते हैं, "हवा का साफ होना हर जगह के लिए एक वरदान है। लेकिन रिसर्च दर्शाती है कि किसी एक देश की हवा साफ करने की नीति, अनजाने में किसी दूसरे देश की बारिश को प्रभावित कर सकती है।“
उनके अनुसार, भारत के करोड़ों किसान फसलों की पैदावार के लिए मानसून पर निर्भर हैं और मानसून पर ऐसे फैसलों का भी असर पड़ सकता है, जो हजारों किलोमीटर दूर लिए जाते हैं। ऐसे में अगर भारत-चीन मिलकर प्रदूषण को नियंत्रित करने की नीतियां बनाएं, तो हम इस नुकसान से बच सकते हैं।"
शोधकर्ताओं का कहना है कि अब केवल यह समझना पर्याप्त नहीं है कि बारिश कितनी होगी। यह जानना भी जरूरी है कि बारिश कब होगी, कितनी तीव्र होगी और भारी बारिश जैसी घटनाओं पर इन सबका क्या असर पड़ेगा।
यह जानकारी किसानों, जल प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियों और नीति-निर्माताओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगी, ताकि वे बदलते मौसम के अनुरूप बेहतर तैयारी कर सकें।
यह अध्ययन याद दिलाता है कि जलवायु और वायु प्रदूषण की चुनौतियां किसी एक देश की सीमाओं में नहीं बंधी हैं। दुनिया के एक कोने में लिए गए पर्यावरण संबंधी फैसले हजारों किलोमीटर दूर भारत के खेतों, किसानों और करोड़ों लोगों के भविष्य को भी प्रभावित कर सकते हैं।