

पृथ्वी की कक्षा अब एक विशाल 'कबाड़खाने' में तब्दील हो चुकी है, जहां 28,000 किलोमीटर प्रति घंटा की जानलेवा रफ्तार से दौड़ता 'स्पेस जंक' भविष्य के हर अंतरिक्ष मिशन के लिए काल बन गया है।
इस विनाशकारी खतरे और 'केसलर सिंड्रोम' की आशंका को देखते हुए शोधकर्ताओं ने 3D-प्रिंटेड 'स्पेस स्किन' के रूप में एक क्रांतिकारी समाधान पेश किया है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रेमेन के बिंकल कुमार शर्मा और हर्षिता भास्कर के अध्ययन के अनुसार, यह आधुनिक कवच 'काइनेटिक स्पंज' की तरह काम करता है। इसमें धातु के जालों और विशेष पॉलीमर की परतों का उपयोग किया गया है, जो किसी भी भीषण टक्कर की ऊर्जा को सोखने में सक्षम हैं।
लेजर पाउडर बेड फ्यूजन तकनीक से तैयार यह ढाल धातु की जटिल संरचना बनाई जाती है, जिससे यान का वजन 70 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। इससे न केवल अंतरिक्ष यान अधिक सुरक्षित होंगे, बल्कि उनके लॉन्च की लागत भी काफी कम हो जाएगी। इसमें एक खास ‘काइनेटिक स्पंज’ परत भी शामिल है, जो टकराव की ऊर्जा को सोख लेती है।
यह 'स्मार्ट स्किन' विकिरण और अत्यधिक तापमान से भी सुरक्षा देने की क्षमता रखती है। हालांकि इसकी बनावट में सुधार के लिए और परीक्षण जारी हैं, लेकिन यह तकनीक स्पष्ट करती है कि भविष्य की अंतरिक्ष यात्रा अब केवल इंजनों के दम पर नहीं, बल्कि इन अभेद्य सुरक्षा कवचों के भरोसे सुरक्षित होगी।
इंसान जैसे-जैसे अंतरिक्ष में अपनी पैठ बढ़ा रहा है, वैसे-वैसे पृथ्वी की कक्षा एक 'कबाड़खाने' में तब्दील होती जा रही है। दशकों से छोड़े गए उपग्रह के टूटे टुकड़े, रॉकेट के हिस्से, विस्फोटों के टुकड़े और पुराने हादसों का मलबा पृथ्वी की कक्षा में तेजी से घूम रहा है।
सच कहें तो अंतरिक्ष में 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ते मलबे के ये टुकड़े अब वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए बड़ी चिंता बन गए हैं। ऐसे में वैज्ञानिक एक नई तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसे 3डी प्रिंटेड 'स्पेस स्किन' के रूप में जाना जाता है, जो भविष्य में अंतरिक्ष यानों (स्पेसक्राफ्ट) और उपग्रहों (सैटेलाइट) को इस खतरनाक स्पेस जंक से बचा सकती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रेमेन से जुड़े बिंकल कुमार शर्मा और शोधकर्ता हर्षिता भास्कर द्वारा किए एक नए अध्ययन के अनुसार, यह आधुनिक सुरक्षा कवच अंतरिक्ष यान को मलबे के उन घातक हमलों से बचा सकता है जो किसी भी मिशन को पलक झपकते ही तबाह कर सकते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रीप्रिंट सर्वर arXiv पर प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन के मुताबिक अंतरिक्ष में घूमता यह मलबा भले ही आकार में बेहद छोटा हो सकता है, लेकिन उसका खतरा बेहद बड़ा है। इसके साथ ही प्राकृतिक रूप से भी सूक्ष्म उल्कापिंड मौजूद रहते हैं, जो क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं से टूटकर निकलते हैं।
क्यों है 'केसलर सिंड्रोम' का डर
ये कण इतनी तेज गति से चलते हैं कि किसी अंतरिक्ष यान से टकराने पर उसकी बाहरी दीवार में छेद कर सकते हैं। इससे उनके इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम खराब हो सकते हैं या फिर पूरा मिशन ही फेल हो सकता है।
वैज्ञानिकों द्वारा साझा जानकारी के मुताबिक इनमें से कुछ सूक्ष्म कण तो 72 किलोमीटर प्रति सेकंड तक की अविश्वसनीय गति से चलते हैं। वहीं अंतरिक्ष में मानव निर्मित मलबा करीब 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूम रहा है। इतनी तेज गति से एक मामूली कण भी गोली से कहीं ज्यादा खतरनाक बन जाता है।
वैज्ञानिकों को सबसे बड़ा डर 'केसलर सिंड्रोम' का है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें एक टकराव से नया मलबा पैदा होता है, फिर वह मलबा दूसरे यानों से टकराकर और ज्यादा कचरा बनाता है। यह सिलसिला इतना बढ़ सकता है कि पृथ्वी की कुछ कक्षाएं उपयोग के लायक ही न रहें।
अब जब निजी कंपनियां बड़ी संख्या में उपग्रह लॉन्च कर रही हैं और अंतरिक्ष मिशनों की संख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है, यह खतरा भी पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो गया है।
गौरतलब है कि हाल ही में भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में चेताया था कि अंतरिक्ष में पृथ्वी के चारों ओर घूम रहा 'स्पेस जंक' यानी पुराने उपग्रहों का मलबा और रॉकेट के बेकार हिस्से अब पहले से कहीं तेजी से पृथ्वी की ओर गिर रहे हैं।
अब तक कैसे बचाए जाते हैं अंतरिक्ष यान
अभी तक अंतरिक्ष यानों को बचाने के लिए वैज्ञानिक “व्हिपल शील्ड” का इस्तेमाल करते हैं। इसमें यान के बाहरी ढांचे से थोड़ी दूरी पर एक पतली धातु की परत लगाई जाती है। यह कुछ-कुछ गाड़ियों के बम्पर की तरह है। जब कोई मलबा इससे टकराता है, तो वह टूटकर बिखर जाता है या भाप बन जाता है, जिससे मुख्य यान सुरक्षित रहता है।
वहीं नई शील्ड में केवलर और सिरेमिक की परतें भी जोड़ी जाती हैं, जो टक्कर से पैदा हुई ऊर्जा को फैलाने में मदद करती हैं। लेकिन समस्या यह है कि ये शील्ड भारी होती हैं और अंतरिक्ष में अतिरिक्त वजन का मतलब लाखों डॉलर का अतिरिक्त खर्च और ईंधन की बर्बादी है। साथ ही इसकी वजह से उपकरणों के लिए कम जगह बचती है।
क्या है 3डी प्रिंटेड ‘स्पेस स्किन’
इसी चुनौती को हल करने के लिए वैज्ञानिक 3डी प्रिंटिंग से बने हल्के लेकिन मजबूत ढांचे विकसित कर रहे हैं। अध्ययन से पता चला है कि 'लेजर पाउडर बेड फ्यूजन' तकनीक के जरिए धातुओं के महीन पाउडर को लेजर से जोड़कर जटिल और बेहद मजबूत ढांचे तैयार किए जा सकते हैं।
यह तकनीक टोपोलॉजी ऑप्टिमाइजेशन नामक डिजाइन तकनीक के साथ मिलकर काम करती है, जिसमें अनावश्यक सामग्री को हटाकर केवल मजबूत ढांचा छोड़ा जाता है। इससे अंतरिक्ष यान की संरचना के वजन को 70 फीसदी तक घटाया जा सकता है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इसकी मदद से स्पेस मिशन पहले से कहीं अधिक किफायती और सुरक्षित हो जाएंगे।
'काइनेटिक स्पंज' जो सोख लेगा हर प्रहार
इस नए अध्ययन में एक 'काइनेटिक स्पंज' का जिक्र किया गया है। इसमें एक विशेष प्लास्टिक पॉलीमर (अल्ट्रा-हाई-मॉलिक्यूलर-वेट पॉलीइथिलीन) की परत होती है। जब मलबे का कोई टुकड़ा इस पर वार करता है, तो बाहरी धातु का जाल उसे टुकड़ों में तोड़ देता है और नीचे मौजूद पॉलीमर की परत उसकी पूरी ऊर्जा को किसी स्पंज की तरह सोख लेती है। इससे प्रभाव अंतरिक्ष यान तक नहीं पहुंच पाता।
इसके अलावा, वैज्ञानिक बोरोन कार्बाइड और ग्रेफाइट जैसे तत्वों पर भी परीक्षण कर रहे हैं, ताकि यह परत केवल टक्कर ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष के खतरनाक रेडिएशन (विकिरण) से भी सुरक्षा प्रदान करेगी। यानी यह केवल साधारण कवच नहीं, बल्कि कई तरह की सुरक्षा देने वाली स्मार्ट ढाल बन सकती है।
हालांकि भले ही यह तकनीक बेहद आशाजनक है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि 3डी प्रिंटेड धातुओं में सूक्ष्म छिद्र बन सकते हैं, जो उनकी मजबूती को कम कर सकते हैं। इसलिए इन्हें अंतरिक्ष मिशनों में इस्तेमाल करने से पहले और अधिक परीक्षण जरूरी हैं। फिर भी शोधकर्ताओं का मानना है कि जैसे-जैसे पृथ्वी की कक्षा और भी भीड़भाड़ वाली होती जाएगी, अंतरिक्ष यानों को बचाने के लिए ऐसी स्मार्ट सुरक्षा परतें अनिवार्य हो जाएंगी।
यानी भविष्य में अंतरिक्ष यात्रा की सफलता सिर्फ तेज रॉकेट या दूर के मिशनों पर नहीं, बल्कि ऐसे स्मार्ट यानों पर निर्भर करेगी जो खतरनाक होते जा रहे अंतरिक्ष में खुद को सुरक्षित रख सकें।