महाराष्ट्र: पंजारा नदी के 30 मीटर भीतर निर्माण पर उठे सवाल, एनजीटी ने वैज्ञानिक जांच के दिए आदेश

एनजीटी ने स्पष्ट किया कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करने वाले किसी भी निर्माण की अनुमति वैज्ञानिक जांच के बिना नहीं दी जा सकती।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दो अलग-अलग मामलों में पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि विकास और प्रशासनिक कार्यों में अब वैज्ञानिक आधार तथा तय समय-सीमा से कोई समझौता नहीं होगा।

  • महाराष्ट्र के धुले जिले में पंजारा नदी के भीतर करीब 30 मीटर तक किए गए निर्माण पर सुनवाई करते हुए ट्रिब्यूनल ने कहा कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित करने वाली किसी भी परियोजना को वैज्ञानिक अध्ययन के बिना आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

  • साथ ही, प्रस्तावित अध्ययन में छह महीने की देरी पर भी सवाल उठाते हुए संबंधित संस्थान से जवाब तलब किया है।

  • दूसरी ओर, कोलकाता में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के मुद्दे पर एनजीटी ने नगर निगम को दिसंबर 2026 तक सभी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट हर हाल में चालू करने का अंतिम निर्देश दिया और 15 जनवरी 2027 तक विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

  • इन दोनों आदेशों से स्पष्ट है कि ट्रिब्यूनल पर्यावरणीय सुरक्षा, नदी संरक्षण और स्वच्छ पेयजल जैसी सार्वजनिक हित की परियोजनाओं में न तो वैज्ञानिक मानकों की अनदेखी स्वीकार करेगा और न ही अनावश्यक प्रशासनिक देरी।

महाराष्ट्र के धुले जिले में पंजारा नदी पर बनाए जा रहे फ्रेंच कर्व आकार के पैदल यात्री पुल से नदी जल के प्रवाह पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका गहन वैज्ञानिक अध्ययन जरुरी है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पश्चिमी पीठ ने 9 जुलाई 2026 को यह आदेश दिया है।

न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की पीठ ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह मामला नदी क्षेत्र में करीब 30 मीटर तक किए गए निर्माण और संभावित अतिक्रमण से जुड़ा है। ऐसे में नदी जल के प्राकृतिक प्रवाह में आने वाली रुकावट को समझना बेहद जरूरी है।

केंद्रीय जल एवं विद्युत अनुसंधान केंद्र (सीडब्ल्यूपीआरएस), खड़कवासला ने इस अध्ययन के लिए 6 महीने का समय मांगा है, जिसपर भी ट्रिब्यूनल ने सवाल उठाया है।

एनजीटी ने सीडब्ल्यूपीआरएस को कोर्ट के समक्ष पेश होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि इस मामूली अध्ययन और रिपोर्ट सौंपने में इतना लंबा समय क्यों लगेगा।

इससे पहले एनजीटी द्वारा 22 जून 2026 को दिए आदेश का पालन करते हुए धुले और नासिक लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने सीडब्ल्यूपीआरएस का 30 जून 2026 का एक पत्र अदालत के सामने प्रस्तुत किया था। इस पत्र में नदी जल के प्रवाह की स्थिति में आने वाले बदलाव का आकलन करने के लिए गणितीय मॉडल अध्ययन (मैथमेटिकल मॉडल स्टडी) का प्रस्ताव दिया गया था।

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सीडब्ल्यूपीआरएस के मुताबिक इस पूरे अध्ययन पर 12 लाख रुपए का खर्च आएगा और 6 महीने का वक्त लगेगा। हालांकि, धुले और नासिक लोक निर्माण विभागने ने अदालत को बताया कि यदि अध्ययन में छह महीने का समय लगा तो परियोजना का उद्देश्य ही प्रभावित हो जाएगा और यह व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी हो सकती है।

ऐसे में एनजीटी के इस आदेश ने साफ कर दिया है कि विकास परियोजनाओं की रफ्तार पर्यावरणीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं बढ़ सकती। नदी के प्राकृतिक प्रवाह से जुड़े किसी भी निर्माण को वैज्ञानिक कसौटी पर परखे बिना आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

दिसंबर तक चालू होने चाहिए कोलकाता के सभी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, एनजीटी का नगर निगम को दिया निर्देश

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कोलकाता नगर निगम (केएमसी) को स्पष्ट शब्दों में कहा है कि शहर में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स को चालू करने की समय-सीमा में अब और ढिलाई नहीं बरती जाएगी। एनजीटी की पूर्वी पीठ ने 8 जुलाई 2026 को निर्देश दिया कि दिसंबर 2026 तक सभी प्लांट्स अनिवार्य रूप से चालू किए जाएं, ताकि लोगों को पाइपलाइन के जरिए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो एनजीटी ने 1 जुलाई 2025 को एक आदेश जारी कर कोलकाता नगर निगम से दिसंबर 2025 तक पाइप के जरिए पीने के पानी की आपूर्ति करने का लक्ष्य दिया था। साथ ही, निगम से 15 अप्रैल 2026 तक इस पर एक अनुपालन हलफनामा दायर करने को कहा गया था।

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हालांकि, कोलकाता नगर निगम द्वारा 9 अप्रैल 2026 को दाखिल की गई रिपोर्ट में यह सामने आया कि वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स का काम तय समय से पीछे चल रहा है और इनके दिसंबर 2026 के अंत तक ही पूरी तरह चालू होने की संभावना है। निगम की इस रिपोर्ट को संज्ञान में लेते हुए एनजीटी ने इस आवेदन का निपटारा कर दिया, लेकिन साथ ही दिसंबर 2026 की नई और अंतिम समय-सीमा भी तय कर दी।

ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि कोलकाता नगर निगम को 15 जनवरी 2027 तक हर हाल में सभी जरूरी विवरणों के साथ अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करनी होगी।

एनजीटी के इस आदेश से स्पष्ट है कि ट्रिब्यूनल अब पेयजल परियोजनाओं में होने वाली देरी को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहती। दिसंबर 2026 की समयसीमा और उसके बाद अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश से कोलकाता नगर निगम की जवाबदेही भी तय कर दी गई है।

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