

गंगा की अविरलता और स्वच्छता पर मंडरा रहे दोहरे संकट को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्नाव में ढहे पुल के मलबे से गंगा की धारा बाधित होने के आरोपों पर अदालत ने स्पष्ट और तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है, यह संकेत देते हुए कि केवल सतही सफाई नहीं, बल्कि नदी के प्रवाह को पूरी तरह बहाल करना अनिवार्य है।
वहीं हापुड़ के खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में बिना साफ किए औद्योगिक अपशिष्ट के गंगा तक पहुंचने की आशंका पर एनजीटी ने जर्जर ड्रेनेज सिस्टम को पूरी तरह बदलकर आधुनिक नेटवर्क विकसित करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत ने साफ कर दिया है कि गंगा से जुड़े मामलों में लापरवाही या आधे-अधूरे समाधान स्वीकार्य नहीं होंगे, चाहे वह नदी के प्रवाह में बाधा हो या प्रदूषण का लगातार बढ़ता खतरा।
इन दोनों आदेशों के जरिए एनजीटी ने प्रशासन और उद्योगों को चेतावनी दी है कि अब जवाबदेही तय होगी और गंगा की रक्षा के लिए ठोस, समयबद्ध और जमीनी कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
20 अप्रैल 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) को निर्देश दिया कि वह यह जांच करे कि क्या उन्नाव जिले के गंगा घाट पर पुल ढहने से जमा हुए मलबे के कारण गंगा नदी के प्राकृतिक प्रवाह में कोई बाधा उत्पन्न हो रही है या नहीं।
गौरतलब है कि यह मामला एक याचिकाकर्ता की शिकायत पर सामने आया है, जिसमें कहा गया कि ब्रिटिश काल में बना जर्जर पुल का बड़ा हिस्सा ढहने के बाद गंगा की अविरल धारा प्रभावित हो रही है। याचिका के साथ संलग्न तस्वीरों में स्पष्ट रूप से दिखाया गया कि टूटे हुए पुल का मलबा नदी के प्रवाह को रोक रहा है।
इस विषय में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन ने 10 अप्रैल 2026 को एक हलफनामा दाखिल किया। इस हलफनामा में बताया गया कि 30 मार्च 2026 को उन्नाव के जिलाधिकारी कार्यालय से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार, गंगा घाट पर गिरे हुए पुल के कारण बनी रुकावट को हटा दिया गया है।
हालांकि, अदालत के संज्ञान में यह भी आया है कि भले ही पुल के अवशेष हटा दिए गए हों, लेकिन नदी में बिखरा मलबा अब भी गंगा के प्रवाह में बाधा बना हुआ है। ऐसे में एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विस्तृत जांच और स्पष्ट स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
हापुड़: गंगा प्रदूषण पर सवाल, खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में ड्रेनेज सुधार की तैयारी तेज
उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीएसआईडीए) को हापुड़ जिले के यूपीएसआईडीसी खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में मौजूदा नालों की पूरी व्यवस्था बदलकर एक नया और आधुनिक स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज नेटवर्क विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं।
इसका उद्देश्य क्षेत्र में जलभराव की समस्या को पूरी तरह खत्म करना और जल निकासी को सुचारु बनाना है।
यह जानकारी उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) की 22 अप्रैल 2026 की निरीक्षण रिपोर्ट में सामने आई है, जो नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के 28 जनवरी 2026 के आदेश पर तैयार की गई है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में चल रहे कई उद्योग पर्यावरण नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। आरोप है कि इन उद्योगों से निकलने वाला बिना साफ किया हानिकारक गंदा पानी (एफ्लुएंट) खुले नालों, ग्रीन बेल्ट, खाली जमीन और पार्कों में छोड़ा जा रहा है। यह एफ्लुएंट आगे चलकर नालों के जरिए गंगा नदी तक पहुंच जाता है।
आवेदक का यह भी आरोप है कि इन उद्योगों में या तो एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) मौजूद ही नहीं हैं, और जहां हैं भी वहां भी ठीक से काम नहीं कर रहे। इसकी वजह से बिना ट्रीट किया हानिकारक अपशिष्ट खुले में बहाया जा रहा है।
साइट के निरीक्षण के बाद उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्पष्ट किया कि मौजूदा निकासी प्रणाली पुरानी और अव्यवस्थित हो चुकी है, इसलिए यूपीएसआईडीए को इसे नए स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज नेटवर्क से बदलना चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि यूपीएसआईडीए ने 17 फरवरी 2025 को आईआईटी कानपुर द्वारा तैयार एक योजना प्रस्तुत की थी। इस योजना के तहत हापुड़ जिले के IA मसूरी गुलावठी रोड (फेज-1, 2 और 3) में बाहरी और आंतरिक आरसीसी नालों तथा बॉक्स कलवर्ट का निर्माण किया जाना है, जिससे इस समस्या का समाधान होने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और पर्यावरणीय अनुपालन दोनों में गंभीर सुधार की जरूरत है, जिसके लिए प्रस्तावित नई ड्रेनेज योजना को समयबद्ध और प्रभावी तरीके से लागू करना अहम होगा।