

वाराणसी में गंगा और उसकी सहायक नदियों में घरेलू सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के लगातार हो रहे प्रवाह को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की गंगा सफाई रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पांच फरवरी 2026 को हुई सुनवाई में ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि बरसाती नालों को स्थायी रूप से टैप करना ना तो कानूनी है और ना ही नदी की पारिस्थितिकी के अनुकूल है।
यह मामला एनजीटी की प्रधानपीठ कर रही है। एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव, और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की पीठ ने यह टिप्पणी आशीष कुमार मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सौरभ तिवारी बनाम भारत संघ से जुड़े मामलों की संयुक्त सुनवाई में की। इन मामलों में वाराणसी और चंदौली में गंगा व वरुणा में गिर रहे सीवेज की शिकायत की गई है।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दाखिल स्टेट प्लान के अनुसार वाराणसी और चंदौली में कुल 76 नाले गंगा और वरुणा में गिरते हैं। इनमें से 33 नाले गंगा में गिरते हैं। जिनमें 26 पूरी तरह टैप हैं और 7 आंशिक या बिना टैप के हैं। वहीं, 43 नाले वरुणा में गिरते हैं। इनमें 19 नाले टैप और 24 नाले आंशिक या बिना टैप के हैं।
कुल 31 आंशिक या अनटैप्ड नालों से अब भी बिना उपचारित घरेलू सीवेज बह रहा है, जिसे लेकर ट्रिब्यूनल ने चिंता जताई है।
एनजीटी ने पाया कि कई स्थानों पर स्टॉर्म वॉटर ड्रेन्स को स्थायी रूप से सीवेज ले जाने के लिए टैप कर दिया गया है। ट्रिब्यूनल के अनुसार, यह व्यवस्था केवल अस्थायी हो सकती है, जब तक कि घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ने का काम पूरा न हो जाए।
नमामि गंगे मिशन (एनएमसीजी) ने सुनवाई के दौरान बताया कि उसने राज्यों को बरसाती नालों के अस्थायी टैपिंग की अनुमति दी है। इस पर एनजीटी ने निर्देश दिया कि एसटीपी को मंजूरी देते समय डीपीआर में स्पष्ट समयसीमा जोड़ी जाए ताकि यह व्यवस्था स्थायी न बन जाए।
सुनवाई के दौरान एक अहम मुद्दा अस्सी (नगवा) नदी को लेकर उठा। स्टेट प्लान में अस्सी नदी को “ड्रेन” मानते हुए उसके टैपिंग की योजना दिखाई गई है। एनजीटी ने स्पष्ट किया कि अस्सी गंगा की सहायक नदी है और रिवर गंगा (रीजन्युवेशन, प्रोटेक्शन एंड मैनेजमेंट) अथॉरिटीज ऑर्डर, 2016 के तहत किसी भी सहायक नदी को टैप करने की अनुमति नहीं है।
हालांकि राज्य सरकार ने कहा कि इसकी अनुमति एनएमसीजी से मिली है, लेकिन ट्रिब्यूनल ने एनएमसीजी से यह स्पष्ट करने को कहा है कि 2016 के आदेश के बावजूद यह अनुमति कैसे दी गई।
स्टेट प्लान के अनुसार, वाराणसी में कुल 7 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) संचालित हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता 420 एमएलडी है। इनमें से लगभग 84 प्रतिशत क्षमता का उपयोग हो रहा है।
एनजीटी ने यह आशंका जताई कि चूंकि ये एसटीपी बरसाती नालों के जरिए सीवेज प्राप्त कर रहे हैं, इसलिए इनके गंगा के फ्लड प्लेन जोन में स्थित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अब एनएमसीजी को यह रिकॉर्ड पर रखना होगा कि एसटीपी को मंजूरी देते समय यह कैसे सुनिश्चित किया गया कि वह बाढ़ क्षेत्र में नहीं हैं।
स्टेट प्लान बताता है कि वाराणसी में 4,14,809 घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ना प्रस्तावित है, हालांकि अब तक केवल 1,56,300 घर ही जुड़े हैं। यानी 60 प्रतिशत से अधिक घर अब भी सीवर नेटवर्क से बाहर हैं। ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार से 100 प्रतिशत कनेक्टिविटी की स्पष्ट समयसीमा प्रस्तुत करने को कहा है।
वहीं, राज्य के प्लान में चंदौली क्षेत्र में औद्योगिक नालों और उनके एसटीपी-ईटीपी की जानकारी तो दी गई है लेकिन यह नहीं बताया गया कि ये संयंत्र पर्यावरणीय मानकों का पालन कर रहे हैं या नहीं। एनजीटी ने इसे रिपोर्ट की गंभीर कमी माना है। एनजीटी ने उत्तर प्रदेश सरकार और एनएमसीजी को छह सप्ताह के भीतर विस्तृत प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 21 अप्रैल 2026 को होगी।