गंगा बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन पूरा: यूपी सरकार ने एनजीटी में पेश की रिपोर्ट

एनजीटी में जानकारी दी गई है कि गंगा के बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण की दिशा में बड़ी पहल करते हुए यूपी सरकार ने 13 जिलों में करीब 700 किलोमीटर हिस्से का सीमांकन पूरा कर लिया है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
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सारांश
  • उत्तर प्रदेश में नदियों के बाढ़ क्षेत्रों पर बढ़ते दबाव के बीच एनजीटी के सामने आए दो मामलों ने संरक्षण की चुनौती को फिर रेखांकित किया है।

  • एक ओर यूपी सरकार ने बताया है कि गंगा के उन्नाव से बलिया तक करीब 700 किलोमीटर लंबे बाढ़ क्षेत्र का 13 जिलों में भौतिक सीमांकन पूरा कर 7,350 पिलर लगा दिए गए हैं।

  • यह कदम बाढ़ क्षेत्र की स्पष्ट पहचान, अतिक्रमण रोकने और नदी के प्राकृतिक विस्तार को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

  • वहीं दूसरी ओर झांसी में पहुज नदी के बाढ़ क्षेत्र और ग्रीन बेल्ट के पास निर्माण को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

  • याचिका में आरोप है कि निर्माण के दौरान मलबा नदी में डालने से उसके प्राकृतिक प्रवाह में बाधा पहुंची है। एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है।

  • दोनों मामले एक ही बड़ी तस्वीर पेश करते हैं—नदी और उसके बाढ़ क्षेत्र की सीमाएं तय कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि जमीन पर उनका संरक्षण और नियमों का सख्त पालन भी उतना ही जरूरी है।

उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के करीब 700 किलोमीटर लंबे हिस्से के बाढ़ क्षेत्र की पहचान और सीमांकन का काम पूरा कर लिया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने यह जानकारी 25 अगस्त 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दी है।

राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि गंगा के बाढ़ क्षेत्र को सुरक्षित रखने और संरक्षित करने की दिशा में ठोस प्रगति हुई है। इसके तहत उन्नाव से बलिया तक फैले गंगा के सेगमेंट-बी, फेज-2 के करीब 700 किलोमीटर लंबे हिस्से का 13 जिलों में भौतिक सीमांकन पूरा कर लिया गया है। इस काम के लिए गंगा के चिन्हित बाढ़ क्षेत्र में कुल 7,350 पिलर लगाए गए हैं।

सीमांकन के लिए 700 किलोमीटर में लगाए गए 7,350 पिलर

हलफनामे में यह भी बताया गया है कि इन पिलरों के जरिए बाढ़ क्षेत्र की वास्तविक सीमा को जमीन पर स्पष्ट रूप से चिह्नित कर दिया गया है।

मामले की सुनवाई के दौरान एनजीटी ने याचिकाकर्ताओं को, यदि आवश्यक हो, तो जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इस मामले में अब अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को होगी।

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बता दें कि इससे पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने उत्तर प्रदेश सरकार को 31 मार्च, 2026 तक गंगा और यमुना नदियों के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन का काम पूरा करने का आदेश दिया था। प्रधान पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि बाढ़ क्षेत्र से जुड़ी सभी जानकारी अब सार्वजनिक रूप से उत्तर प्रदेश सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग और फ्लड मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम सेंटर (एफएमआईएससी) की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाए

गौरतलब है कि गंगा का बाढ़ क्षेत्र नदी के प्राकृतिक विस्तार और प्रवाह के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, इन क्षेत्रों में अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण नदी तंत्र और बाढ़ प्रबंधन के लिए लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं।

ऐसे में सीमांकन पूरा होने से बाढ़ क्षेत्र की पहचान और उसके संरक्षण के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।

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झांसी: पहुज नदी के किनारे निर्माण पर उठे सवाल, एनजीटी ने अधिकारियों से मांगा जवाब

उत्तर प्रदेश के झांसी में पहुज नदी के बाढ़ क्षेत्र और ग्रीन बेल्ट में प्रदूषण व अतिक्रमण का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सामने पहुंच गया है। 25 अगस्त 2026 को इस मामले पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने संबंधित अधिकारियों को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

आवेदक का आरोप है कि ‘सैनफ्रान ग्रुप’ द्वारा बनाया जा रहा ‘सैनफ्रान सरोवर हाइट्स’ प्रोजेक्ट पहुज नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा डाल रहा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस कथित अवैध निर्माण को रोकने में नाकाम रहे हैं।

याचिका के अनुसार, पहुज नदी खसरा नंबर 138 से होकर गुजरती है, जबकि निर्माण परियोजना खसरा नंबर 137 में स्थित है। आवेदक ने अपने दावों के समर्थन में नक्शा भी पेश किया है, जिसमें परियोजना को नदी के बिल्कुल किनारे बताया गया है।

क्या कुछ लगे हैं आरोप

याचिका के साथ तस्वीरें भी संलग्न की गई हैं। इनमें आरोप लगाया गया है कि निर्माण कार्य के दौरान मलबा नदी में डाला गया, जिससे पहुज का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ है। आवेदक का कहना है कि यह निर्माण नदी के बाढ़ क्षेत्र और आसपास के ग्रीन बेल्ट के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।

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मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने 24 अगस्त 2026 को संबंधित अधिकारियों से इस मामले पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अब अधिकारियों के जवाब के बाद यह साफ हो सकेगा कि नदी किनारे हो रहा निर्माण कानूनी नियमों और पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करता है या नहीं।

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