गंगा के फ्लड प्लेन से ‘कंस्ट्रक्शन फ्री जोन’ हटा, एनजीटी ने केंद्र को दिया नोटिस

आवेदक ने एनजीटी के समक्ष दलील दी है कि 2026 का संशोधन गंगा और उसकी सहायक नदियों के फ्लड प्लेन को लेकर 2016 में बनाए गए संरक्षण प्रावधान को कमजोर करता है
अविरल बहती गंगा; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
अविरल बहती गंगा; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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गंगा और उसकी सहायक नदियों के फ्लड प्लेन को कंस्ट्रक्शन फ्री जोन बनाए रखने के प्रावधान में किए गए बदलाव को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में चुनौती दी गई है। मामले में एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच ने केंद्र सरकार समेत अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर डॉ. अफरोज अहमद की बेंच ने 25 अगस्त 2026 को ओए नंबर 502/2026, कात्यायनी बनाम भारत संघ एवं अन्य, में यह आदेश दिया। आवेदक कात्यायनी ने स्वयं मामले की पैरवी की।

मामला जल शक्ति मंत्रालय की 7 अगस्त 2026 को जारी अधिसूचना एसओ 4427(ई) से जुड़ा है, जो 10 अगस्त को राजपत्र में प्रकाशित हुई। इस अधिसूचना के जरिए नदी गंगा (कायाकल्प, संरक्षण एवं प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016 में संशोधन किया गया है।

फ्लड प्लेन की परिभाषा में बदलाव

आवेदक ने एनजीटी के समक्ष दलील दी है कि 2026 का संशोधन गंगा और उसकी सहायक नदियों के फ्लड प्लेन को लेकर 2016 में बनाए गए संरक्षण प्रावधान को कमजोर करता है।

संशोधन में पैरा 3(1)(एए) के तहत पहली बार "एक्टिव फ्लड प्लेन" को परिभाषित किया गया है। इसके तहत नदी का वह क्षेत्र एक्टिव फ्लड प्लेन माना जाएगा जो पांच साल में एक बार आने वाली बाढ़ यानी वन-इन-फाइव-ईयर रिटर्न पीरियड की बाढ़ के दौरान जलमग्न होता है।

आवेदक के अनुसार इस बदलाव से नदी का फ्लड प्लेन एक व्यापक और एकीकृत क्षेत्र न रहकर अलग-अलग हिस्सों में बंट जाता है। इसमें एक्टिव फ्लड प्लेन पांच वर्षीय बाढ़ की सीमा तक, रेगुलेटरी जोन पांच और 25 वर्षीय बाढ़ की सीमाओं के बीच तथा वार्निंग जोन 25 और 100 वर्षीय बाढ़ की सीमाओं के बीच निर्धारित किया गया है।

याचिका में इस बदलाव को महत्वपूर्ण इसलिए माना गया है क्योंकि बाढ़ का मैदान केवल उस हिस्से तक सीमित नहीं होता जो अपेक्षाकृत कम अंतराल वाली बाढ़ में डूबता है। फ्लड प्लेन नदी के बाढ़ के पानी को फैलने, भूजल के पुनर्भरण और नदी के पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

'कंस्ट्रक्शन फ्री जोन' शब्द हटाने पर सवाल

आवेदक ने संशोधन के एक दूसरे प्रावधान पर भी आपत्ति जताई है। 2016 के आदेश के पैरा 4(ix) में गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारों तथा फ्लड प्लेन के संबंध में "शैल बी कंस्ट्रक्शन फ्री जोन" का प्रावधान था।

2026 के संशोधन में इन शब्दों को हटा दिया गया है। इसके स्थान पर कहा गया है कि नदी के तट और फ्लड प्लेन को प्रदूषण के स्रोतों और दबावों को कम करने तथा आवश्यक उपायों के जरिए उनके प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण कार्यों को संरक्षित करने के लिए बनाए रखा जाएगा।

आवेदक ने इस नए प्रावधान को "एस्पिरेशनल और अनइनफोर्सेबल" बताया है। उनका तर्क है कि स्पष्ट रूप से निर्माण-मुक्त क्षेत्र निर्धारित करने के बजाय संरक्षण के सामान्य उद्देश्य की भाषा इस्तेमाल करने से फ्लड प्लेन में निर्माण गतिविधियों पर प्रभावी नियमन कमजोर हो सकता है।

याचिका में इसी बदलाव को 2016 के संरक्षण ढांचे से सबसे महत्वपूर्ण विचलन के रूप में पेश किया गया है।

पुराने संरक्षण प्रावधानों का हवाला

आवेदक ने संशोधन को कई पुराने कानूनी और पर्यावरणीय प्रावधानों के संदर्भ में चुनौती दी है। इनमें 20 फरवरी 2009 की नेशनल रिवर नोटिफिकेशन एसओ 521(ई), 18 दिसंबर 2012 की भागीरथी इको-सेंसिटिव जोन अधिसूचना और एमसी मेहता बनाम भारत संघ मामले में एनजीटी का 13 जुलाई 2017 का आदेश शामिल है।

याचिका में पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन का भी हवाला दिया गया है। इस सिद्धांत के तहत प्राकृतिक संसाधनों को सरकार का निजी स्वामित्व वाला संसाधन न मानकर जनता के भरोसे में रखा गया संसाधन माना जाता है। आवेदक का कहना है कि गंगा का फ्लड प्लेन भी इसी संरक्षण दृष्टिकोण के तहत देखा जाना चाहिए।

इसी मुद्दे पर एक और मामला लंबित

एनजीटी ने अपने आदेश में यह भी दर्ज किया है कि इसी तरह का मुद्दा पहले से ओए नंबर 489/2026, डॉ. अमित कुमार बनाम भारत संघ एवं अन्य, में लंबित है। इसलिए दोनों मामलों को साथ सूचीबद्ध किया गया है।

25 अगस्त के आदेश में बेंच ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है और यह भी दर्ज किया है कि आवेदन में अंतरिम राहत की मांग की गई है। हालांकि, इस स्तर पर एनजीटी ने अधिसूचना पर कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है।

आवेदक को प्रतिवादियों को नोटिस की तामील कराने और अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले इसका शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।

दोनों मामलों की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 को होगी।

फिलहाल 7 अगस्त 2026 की अधिसूचना प्रभावी है। एनजीटी ने न तो इसके संचालन पर रोक लगाई है और न ही इसके प्रावधानों की वैधता पर कोई अंतिम राय दी है। मामले में केंद्र सरकार और अन्य प्रतिवादियों का जवाब आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि संशोधन के पीछे सरकार का नियामकीय और वैज्ञानिक आधार क्या है और फ्लड प्लेन में निर्माण तथा संरक्षण को लेकर नए ढांचे को किस तरह लागू किया जाना है।

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