

चेन्नई की चेम्बरमबक्कम झील में पहुंच रहे पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ गई है। झील की ओर जाने वाले 16 स्थानों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में 12 में टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया मिले, जबकि नौ नमूनों में घुली ऑक्सीजन का स्तर मानकों के अनुरूप नहीं था।
चार नमूनों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) भी निर्धारित सीमा से अधिक पाई गई। इसके अलावा, एक-एक नमूने में नाइट्रेट, नाइट्रोजन, आयरन और फॉस्फेट की मात्रा तय सीमा से ज्यादा मिली।
तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक, इन नतीजों से झील की ओर जाने वाले नालों और जलधाराओं में सीवेज की मिलावट के संकेत मिलते हैं।
इस स्थिति को देखते हुए जल संसाधन विभाग और चेन्नई मेट्रोपॉलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड को झील तक पहुंचने वाले अनधिकृत बरसाती नालों और अपशिष्ट जल की धाराओं को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रशासन अब प्रदूषण के सभी स्रोतों की मैपिंग, सीवेज की मात्रा का आकलन और जरूरत के अनुसार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की योजना पर काम कर रहा है। मकसद सिर्फ नालों को बंद करना नहीं, बल्कि झील में गंदे पानी की वापसी का रास्ता हमेशा के लिए रोकना है।
चेन्नई की महत्वपूर्ण झीलों में शामिल चेम्बरमबक्कम में गंदे पानी को जाने से रोकने के लिए अब अवैध रूप से जुड़े नालों और सीवेज चैनलों को बंद करने की तैयारी है।
जल संसाधन विभाग और चेन्नई मेट्रोपॉलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड को झील तक बिना इजाजत के पहुंचने वाले बरसाती नालों और अपशिष्ट जल की धाराओं को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि भविष्य में सीवेज झील तक न पहुंच सके।
यह जानकारी कांचीपुरम के जिला कलेक्टर की ओर से 16 सितंबर 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दाखिल स्थिति रिपोर्ट में दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के श्रीपेरंबदूर कार्यालय ने 7 अगस्त 2026 को झील की ओर जाने वाले नालों और चैनलों से लिए गए पानी के नमूनों की जांच के नतीजे जारी किए। ये नमूने 22 और 27 मई को किए गए निरीक्षण के दौरान 16 अलग-अलग स्थानों से लिए गए थे।
16 में से चार नमूनों में तय सीमा से अधिक थी बीओडी
जांच में झील तक पहुंचने वाले पानी की स्थिति बेहद चिंताजनक मिली। 16 में से चार नमूनों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) निर्धारित सीमा से अधिक थी। नौ नमूनों में पानी में घुली ऑक्सीजन यानी डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) बेहद कम पाई गई। एक-एक नमूने में नाइट्रेट, नाइट्रोजन, आयरन और फॉस्फेट निर्धारित सीमा से अधिक मिले। वहीं, 12 नमूनों में टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने माना कि ज्यादातर नमूनों में बीओडी, डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन और टोटल कॉलीफॉर्म की स्थिति मानकों के अनुरूप नहीं थी। इससे संकेत मिलता है कि झील की ओर जाने वाले कई नालों और जलधाराओं में सीवेज मिल रहा है। यानी जिस स्रोत को झील तक साफ पानी पहुंचाना चाहिए, उसमें कहीं-कहीं गंदे पानी की धाराएं शामिल हो रही हैं।
प्रदूषण के स्रोतों की होगी मैपिंग
प्रशासन ने माना है कि झील में प्रदूषण के कई स्रोत हैं और उनका स्थाई समाधान केवल किसी एक नाले को बंद करने से संभव नहीं होगा। इसलिए चेम्बरमबक्कम और पुझल (रेड हिल्स) झीलों के लिए एक व्यापक और दीर्घकालिक योजना तैयार करने की पहल शुरू की गई है।
कोसस्थलैयार बेसिन डिवीजन के कार्यकारी अभियंता ने इस संबंध में तमिलनाडु वाटर इन्वेस्टमेंट कंपनी लिमिटेड से व्यापक अध्ययन कराने के लिए संपर्क किया है। इस अध्ययन में झीलों तक पहुंचने वाले सभी आउटफॉल की मैपिंग, जहां कचरा जमा होता है उन स्थानों का सर्वेक्षण, प्रमुख आउटफॉल पर पानी की गुणवत्ता की जांच और प्रदूषण के स्रोतों की पहचान की जाएगी।
इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि किन जगहों पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की जरूरत है और उन्हें कहां स्थापित किया जा सकता है। अध्ययन के आधार पर झीलों में प्रदूषण कम करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना और परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
झील में कितना सीवेज पहुंच रहा है, यह भी पता चलेगा
इस योजना के तहत उन सभी स्थानों की पहचान और सर्वेक्षण करने का प्रस्ताव है, जहां से सीवेज सीधे जलाशय में पहुंच रहा है। इसके बाद यह मापा जाएगा कि रोजाना कितना सीवेज झील में प्रवेश कर रहा है। जहां जरूरत होगी, वहां सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएंगे।
इसके लिए तमिलनाडु वाटर इन्वेस्टमेंट कंपनी से अध्ययन और प्रस्ताव मांगा गया है। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद जरूरी एसटीपी स्थापित करने की दिशा में आगे की कार्रवाई की जाएगी।
समझना होगा कि चेम्बरमबक्कम झील महज पानी का एक जलाशय नहीं, बल्कि आसपास के पर्यावरण और लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण जलस्रोत है। इसमें पहुंचने वाला सीवेज सिर्फ पानी की गुणवत्ता को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि जलीय जीवन और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी खतरा पैदा करता है।
ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती गंदे पानी के इन रास्तों को केवल कुछ समय के लिए बंद करना नहीं, बल्कि उन्हें स्थाई रूप से रोकना है, ताकि झील में प्रदूषण की यह कहानी फिर न दोहराई जाए।