

दिल्ली की किचनर झील से लेकर उत्तर प्रदेश के देवरिया के फुलेहरा गांव तक, जलस्रोतों की बदहाली और उनकी सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दिल्ली में झील की सफाई पर लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद पानी की गुणवत्ता निर्धारित मानकों पर नहीं पहुंची। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट में फीकल कोलीफॉर्म, बीओडी और सीओडी जैसे महत्वपूर्ण मानकों की स्थिति चिंताजनक मिली है।
सफाई के लिए 2025 में करीब 14.09 लाख और जुलाई 2026 में करीब 22.58 लाख रुपए का काम आवंटित किए जाने के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। अब एनजीटी ने डीडीए से जवाब मांगा है।
वहीं, देवरिया के फुलेहरा गांव में 0.401 हेक्टेयर जमीन राजस्व रिकॉर्ड में तालाब के रूप में दर्ज होने और उस पर अतिक्रमण की पुष्टि के बाद एनजीटी ने कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट मांगी है।
दोनों मामले एक बड़ी तस्वीर सामने लाते हैं—जलस्रोतों की रक्षा केवल कागजी कार्रवाई या बजट खर्च करने से नहीं होगी।
जरूरत इस बात की है कि खर्च का असर जमीन पर दिखे, अतिक्रमण हटे और तालाब-झील अपने प्राकृतिक स्वरूप में लौटें। क्योंकि इन जलस्रोतों की अनदेखी सीधे पानी, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा को खतरे में डालती है।
दिल्ली की किचनर झील का पानी प्रदूषण की निर्धारित कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है। झील से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में फीकल कोलीफॉर्म, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) जैसे महत्वपूर्ण मानक तय सीमा के अनुरूप नहीं पाए गए हैं। यानी जिस झील को साफ और सुरक्षित होना चाहिए, उसका पानी अब प्रदूषण का बोझ उठा रहा है।
यह खुलासा दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की 17 अगस्त 2026 की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में 1 सितंबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान संज्ञान लिया गया।
लाखों खर्च, फिर भी साफ क्यों नहीं पानी?
मामले में आवेदक ने डीडीए के 16 फरवरी 2026 के हलफनामे का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि किचनर झील की सफाई के लिए करीब 22.58 लाख रुपए का ठेका दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद झील के पानी की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नजर नहीं आ रहा।
आवेदक ने यह भी बताया कि 11 फरवरी 2025 को झील की सफाई के लिए 14,08,670 रुपए की लागत का टेंडर स्वीकार किया गया। इसके बाद 30 जुलाई 2026 को 365 दिनों के लिए 22,58,372 रुपए की लागत से फिर सफाई का काम आवंटित किया गया।
एनजीटी ने डीडीए से मांगा जवाब
ऐसे में पानी की खराब गुणवत्ता और सफाई पर हुए खर्च को लेकर एनजीटी ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) से जवाब दाखिल करने को कहा है।
अधिकरण ने डीडीए से यह स्पष्ट करने को कहा कि जब झील की सफाई के लिए काम आवंटित किया गया और लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, तो इसके बावजूद पानी निर्धारित मानकों पर खरा क्यों नहीं उतर रहा है।
देखा जाए तो किचनर झील की स्थिति सिर्फ पानी की गुणवत्ता का सवाल नहीं है। यह इस बात की भी पड़ताल मांगती है कि सफाई के नाम पर खर्च हो रही रकम का असर जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है।
झीलें शहर की सांसों और पारिस्थितिकी का अहम हिस्सा हैं। ऐसे में अगर सफाई के बाद भी उनका पानी प्रदूषित बना रहे, तो सवाल सिर्फ झील की गंदगी का नहीं, बल्कि उसकी देखभाल और निगरानी की पूरी व्यवस्था का भी है।
उत्तर प्रदेश: तालाब पर कब्जे की पुष्टि, एनजीटी ने मांगी कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में तालाब की जमीन पर अवैध कब्जे का मामला एक बार फिर सामने आया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने देवरिया सदर तहसील के फुलेहरा गांव में जलस्रोत पर हुए अतिक्रमण के मामले की 1 सितंबर 2026 को सुनवाई की।
मामले में जिला प्रशासन की ओर से दाखिल जवाब ने साफ कर दिया है कि फुलेहरा गांव में 0.401 हेक्टेयर जमीन राजस्व रिकॉर्ड में तालाब (पोखरी) के रूप में दर्ज है। यानी जिस जमीन पर कब्जे का सवाल उठा है, वह कोई सामान्य निजी भूमि नहीं, बल्कि गांव के जलस्रोत का हिस्सा है।
प्रशासन की रिपोर्ट में तालाब की जमीन पर हुए अवैध अतिक्रमण की स्थिति और उसे हटाने के लिए की गई कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, संबंधित अधिकारियों ने कार्रवाई की आगे की प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एनजीटी से कुछ और समय मांगा है।
एनजीटी ने सरकारी अधिकारियों से मांगा जवाब
मामले में जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य विकास अधिकारी और सदर तहसीलदार समेत संबंधित अधिकारियों की ओर से जवाब दाखिल किया गया। अब एनजीटी इस मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर 2026 को करेगा।
यहां समझना होगा कि तालाब महज जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता। यह गांव की जल-सुरक्षा, भूजल रिचार्ज और पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण आधार होता है।
ऐसे जलस्रोतों पर अतिक्रमण महज सरकारी रिकॉर्ड में जमीन के इस्तेमाल का बदलाव नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के पानी और पर्यावरण के अधिकार पर भी चोट है। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर हैं कि तालाब की जमीन को कब्जे से कब पूरी तरह मुक्त कराया जाता है और जलस्रोत को उसका मूल स्वरूप कब वापस मिलता है।