पुणे की जीवनदायिनी मुला-मुथा नदी पर संकट, एनजीटी में दायर रिपोर्ट में खुलासा

एमपीसीबी रिपोर्ट के मुताबिक, नोटिस और शिकायतों के बावजूद मुला-मुथा नदी में कचरा की अवैध डंपिंग जारी है और ग्राम पंचायतों ने हालात सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
पुणे की जीवनदायिनी मुला-मुथा नदी; फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स
पुणे की जीवनदायिनी मुला-मुथा नदी; फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स
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सारांश
  • पुणे की जीवनदायिनी मुला-मुथा नदी आज गंभीर प्रदूषण संकट से जूझ रही है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि लोनी कालभोर और कदमवाकवस्ती ग्राम पंचायतों की लापरवाही के चलते नदी के किनारे और पाट में बड़े पैमाने पर कचरे की अवैध डंपिंग जारी है।

  • जांच में नदी और उसके किनारों पर प्लास्टिक, निर्माण मलबा, होटल का कचरा, थर्माकोल, पुराने कपड़े, मटन और चिकन दुकानों का अपशिष्ट तथा मृत पशुओं के अवशेष तक बिखरे मिले।

  • स्थानीय लोगों ने अधिकारियों को बताया कि कचरे में अक्सर आग लग जाती है, जिससे आसपास के गांवों, छात्रों और कर्मचारियों को जहरीले धुएं और असहनीय बदबू का सामना करना पड़ता है।

  • एमपीसीबी की वायु गुणवत्ता जांच में भी प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक पाया गया।

  • हैरानी की बात यह है कि नोटिस जारी होने और बार-बार निरीक्षण के बावजूद ग्राम पंचायतों ने न तो कचरा हटाया, न ही उसे नदी में जाने से रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाया।

  • रिपोर्ट केवल नदी प्रदूषण की कहानी नहीं कहती, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता की भी पोल खोलती है। अब देखना यह है कि प्रस्तावित कानूनी कार्रवाई मुला-मुथा को बचा पाती है या यह नदी कचरे और जहरीले धुएं के बीच यूं ही दम तोड़ती रहेगी।

पुणे की जीवनदायिनी मुला-मुथा नदी इस समय कचरे के बोझ तले दम तोड़ रही है, लेकिन स्थानीय प्रशासन गहरी नींद में सोया है। नदी किनारे लगातार हो रही कचरा डंपिंग को लेकर महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) ने गंभीर चिंता जताई है। 10 जून 2026 को दाखिल अपनी रिपोर्ट में बोर्ड ने कहा है कि लोनी कालभोर और कदमवाकवस्ती ग्राम पंचायतें नदी किनारे जमा हो रहे कचरे को हटाने या उसे रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही हैं।

यह पूरा विवाद 'एमआईटी आर्ट डिजाइन टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी' के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित मुला-मुथा नदी के पाट और 'गट नंबर 113' (लोनी कालभोर) से जुड़ा है।

रिपोर्ट के मुताबिक लोनी कालभोर ग्राम पंचायत हर दिन करीब 7 टन और कदमवाकवस्ती ग्राम पंचायत करीब 6 टन ठोस कचरा पैदा कर रही है। इसके बावजूद दोनों पंचायतों ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के तहत आवश्यक अनुमति तक नहीं ली है।

इस सन्दर्भ में 1 मार्च 2026 को जहरीले धुएं की खबरों और स्थानीय निवासी राम शिगरी की शिकायत के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया। जांच में नदी किनारे और नदी के भीतर बड़ी मात्रा में ठोस कचरा बेतरतीब ढंग से फैला मिला।

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स्थानीय लोगों ने अधिकारियों को बताया कि यहां अक्सर कचरे में आग लग जाती है, जिससे आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों, छात्रों और एमआईटी कॉलेज के कर्मचारियों को बदबू और जहरीले धुएं का सामना करना पड़ता है।

नदी में तैर रहे मरे जानवर और प्लास्टिक

जांच में नदी और उसके किनारों पर प्लास्टिक, पॉलीथीन, निर्माण एवं विध्वंस (सीएंडडी) से जुड़ा मलबा, होटलों का कचरा, थर्माकोल, पुराने कपड़े, मृत पशुओं के अवशेष तथा मटन और चिकन दुकानों से निकलने वाला अपशिष्ट बिखरा मिला। सड़ते और जलते कचरे से उठ रही दुर्गंध भी साफ तौर पर महसूस की गई।

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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 1 और 2 मार्च को कचरा स्थल के पास स्थित एमआईटी कॉलेज में वायु गुणवत्ता की निगरानी की। जांच में प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक पाया गया। इसके बाद 5 मार्च 2026 को बोर्ड ने पुणे जिला परिषद के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी, लोनी कालभोर ग्राम पंचायत और कदमवाकवस्ती ग्राम पंचायत के अधिकारियों को नियमों के उल्लंघन को लेकर नोटिस जारी किया।

ताजा स्थिति: अब भी सुधरने को तैयार नहीं प्रशासन

प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों ने जब 13 मई 2026 को दोबारा साइट का दौरा किया, तो हालात जस के तस थे। नदी और एमआईटी कॉलेज के पास से गुजरने वाले नाले में अभी भी भारी मात्रा में कचरा जमा था। कई जगह कचरे के ढेरों में आग लगने के प्रमाण भी मिले।

रिपोर्ट के अनुसार दोनों ग्राम पंचायतों ने न तो कचरा हटाया, न ही उसे नदी में जाने से रोकने का कोई इंतजाम किया। 'गेट नंबर 113' के लिए कानूनी मंजूरी लेने की बात तो दूर, पंचायतों ने बोर्ड के नोटिस का जवाब देना तक जरूरी नहीं समझा।

ऐसे में नियमों की लगातार अनदेखी को देखते हुए एमपीसीबी ने 4 जून 2026 को लोनी कालभोर और कदमवाकवस्ती ग्राम पंचायतों के खिलाफ जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1981 तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 के तहत प्रस्तावित कार्रवाई के निर्देश जारी किए हैं।

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सच कहें तो यह मामला केवल नदी में कचरा फेंकने का नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता की उस तस्वीर का है, जिसमें एक जीवनदायिनी नदी धीरे-धीरे कूड़े के ढेर में बदल रही है। अब सवाल यह है कि क्या कार्रवाई के ये नोटिस पुणे की जीवनरेखा कही जाने वाली मुला-मुथा को बचा पाएंगे, या नदी यूं ही कचरे और जहरीले धुएं के बीच दम तोड़ती रहेगी।

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