वैज्ञानिकों का दावा, हिमालयी इलाकों में बादल फटने से 72 घंटे पहले लग जाएगा पता

आईआईटी भुवनेश्वर के वैज्ञानिकों ने नया मॉडल विकसित किया, जो हिमालयी इलाकों में क्लाउडबर्स्ट व भारी बारिश की घटनाओं का 72 घंटे पहले तक सटीक पूर्वानुमान देने में सक्षम होने का दावा करता है।
शोध के अनुसार मॉडल ने 2023 हिमालयी आपदा के दौरान कई क्लाउडबर्स्ट घटनाओं को सफलतापूर्वक पहचानने का दावा किया।
शोध के अनुसार मॉडल ने 2023 हिमालयी आपदा के दौरान कई क्लाउडबर्स्ट घटनाओं को सफलतापूर्वक पहचानने का दावा किया।फोटो साभार: वर्षा सिंह
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सारांश
  • क्लाउडबर्स्ट एक अत्यंत तीव्र और स्थानीय बारिश की घटना है, जिसमें एक घंटे में 100 मिमी या उससे अधिक बारिश छोटे क्षेत्र में होती है।

  • नया एआई मॉडल 72 घंटे पहले भारी बारिश और क्लाउडबर्स्ट घटनाओं का संकेत देने में सक्षम होने का दावा करता है।

  • अध्ययन में मॉडल ने डब्ल्यूआरएफ मौसम प्रणाली की तुलना में अधिक सटीकता और बेहतर बारिश पूर्वानुमान परिणाम दिखाए हैं।

  • शोध के अनुसार मॉडल ने 2023 हिमालयी आपदा के दौरान कई क्लाउडबर्स्ट घटनाओं को सफलतापूर्वक पहचानने का दावा किया।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में आपदा प्रबंधन और समय पर चेतावनी प्रणाली को मजबूत बना सकती है।

भारत में जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य हर साल भारी बारिश, बादल फटने (क्लाउडबर्स्ट) और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं का सामना करते हैं। इन घटनाओं में जान-माल का बड़ा नुकसान होता है क्योंकि ये बहुत कम समय में और छोटे इलाकों में अचानक होती हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान मॉडल कई बार इन तीव्र और स्थानीय बारिश की घटनाओं को सही तरीके से पकड़ नहीं पाते।

इसी समस्या के समाधान की दिशा में एक नया शोध सामने आया है, जो भविष्य में आपदा प्रबंधन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।

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क्लाउडबर्स्ट या बादल फटना क्या होता है?

क्लाउडबर्स्ट एक बहुत ही तीव्र और अचानक होने वाली बारिश की घटना है, जिसमें बहुत कम समय में बहुत ज्यादा बारिश एक छोटे से इलाके में होती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, क्लाउडबर्स्ट तब माना जाता है जब किसी छोटे क्षेत्र (लगभग 20 से 30 वर्ग किलोमीटर) में, एक घंटे में 100 मिलीमीटर या उससे अधिक बारिश हो जाए। इसका मतलब यह है कि यह सामान्य भारी बारिश नहीं होती, बल्कि बहुत कम समय में होने वाली अत्यधिक बारिश होती है।

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क्लाउडबर्स्ट कैसे होता है?

क्लाउडबर्स्ट किसी खास प्रकार के बादल से नहीं होता, बल्कि यह एक मौसमीय प्रक्रिया है। यह तब बनता है जब गर्म और नम हवा तेजी से ऊपर उठती है, इसे संवहन कहते हैं। हिमालय जैसे पहाड़ों के कारण हवा ऊपर की ओर धकेली जाती है, इसे पर्वतीय उत्थान कहते हैं। ऊपर जाकर हवा ठंडी हो जाती है और बहुत तेजी से बादल बनकर भारी बारिश होने लगती है। कुल मिलाकर, जब नम हवा पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठती है और अचानक बहुत ज्यादा पानी छोड़ देती है, तो क्लाउडबर्स्ट होता है।

हिमालय में यह ज्यादा खतरनाक क्यों होता है?

भारतीय हिमालय में क्लाउडबर्स्ट बहुत ज्यादा नुकसानदायक साबित होते हैं, क्योंकि पहाड़ों की ढलान बहुत तेज होती है, जिससे बारिश का पानी बहुत तेजी से नीचे की ओर बहता है। इससे अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) आ सकता है। ज्यादातर गांव और शहर नदी घाटियों में बसे होते हैं, इसलिए पानी सीधे आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाता है। इसके अलावा, हिमालय की जमीन बहुत कमजोर और अस्थिर होती है, जिससे भूस्खलन और मलबे के बहाव की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं।

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आईआईटी भुवनेश्वर के नए शोध में समाधान

यह शोध आईआईटी भुवनेश्वर के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस अध्ययन को प्रतिष्ठित जर्नल न्यूरल कंप्यूटिंग एंड ऍप्लिकेशन्स में प्रकाशित किया गया। शोधकर्ताओं ने अगस्त 2023 में उत्तर-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में हुई भीषण बारिश और बादल फटने की घटनाओं का विश्लेषण किया, जिसमें 140 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और कई जगह भूस्खलन और बाढ़ आई थी।

डीप लर्निंग मॉडल की नई तकनीक

शोधकर्ताओं ने एक नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित मॉडल विकसित किया है, जिसे “ड्यूल-एन्कोडर क्रॉस-अटेंशन फ्यूजन ट्रांसफॉर्मर” कहा गया है। यह एक प्रकार का डीप लर्निंग सिस्टम है, जो मौसम से जुड़ी जटिल सूचनाओं को समझने और उनका विश्लेषण करने में सक्षम है।

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यह मॉडल अलग-अलग स्तरों पर मौसम के आंकड़ों, जिला स्तर और राज्य स्तर को एक साथ जोड़कर अध्ययन करता है। इससे यह छोटे हिस्सों में होने वाली तेज बारिश की घटनाओं को बेहतर तरीके से समझ सकता है।

इस शोध में पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान प्रणाली मौसम अनुसंधान और पूर्वानुमान मॉडल (डब्ल्यूआरएफ) की तुलना भी की गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पारंपरिक मॉडल कई बार पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाली अचानक बारिश की घटनाओं को ठीक से नहीं पकड़ पाता।

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क्या कहता है अध्ययन?

शोध के अनुसार, इस नए डीप लर्निंग मॉडल ने बारिश की मात्रा का अनुमान बहुत कम त्रुटि के साथ लगाया, जिसमें औसत गलती नौ मिलीमीटर से भी कम रही। इसके अलावा, मॉडल ने 2023 की आपदा अवधि के दौरान कई क्लाउडबर्स्ट की घटनाओं को पहचानने में सफलता दिखाई।

यह मॉडल 72 घंटे पहले तक भारी बारिश के संकेत देने में सक्षम पाया गया। अलग-अलग जिलों में इसकी सटीकता भी बेहतर रही, जैसे मंडी में लगभग 68 प्रतिशत, देहरादून में 67 प्रतिशत, हरिद्वार में 54 प्रतिशत और पौड़ी गढ़वाल में लगभग 78 प्रतिशत।

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शोध में यह भी कहा गया कि यह मॉडल बारिश के समय और तीव्रता में बदलाव को बेहतर तरीके से समझ पाया, जबकि पारंपरिक डब्ल्यूआरएफ मॉडल कई मामलों में इन घटनाओं को पहचान ही नहीं सका।

भविष्य की संभावनाएं और सावधानियां

यह शोध आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक अहम कदम माना जा रहा है। अगर ऐसे मॉडल को और विकसित किया जाए और वास्तविक समय मौसम प्रणाली में जोड़ा जाए, तो हिमालयी क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी जारी की जा सकती है। इससे जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह अभी एक शोध स्तर का मॉडल है। इसे पूरी तरह से व्यावहारिक मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में लागू करने से पहले और परीक्षणों तथा सुधारों की जरूरत होगी।

फिर भी यह अध्ययन दिखाता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भविष्य में मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन को अधिक सटीक और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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