ग्रीन तकनीक के खनिजों से बढ़ रहा जैव विविधता पर खतरा, नई रिपोर्ट में खुलासा

नई वैश्विक रिपोर्ट में खुलासा, हरित ऊर्जा के लिए जरूरी खनिजों का बढ़ता खनन जंगलों, वन्यजीवों और पृथ्वी की जैव विविधता पर डाल रहा है गंभीर प्रभाव।
2001 से 2022 के बीच खनन गतिविधियों से 16,268 वर्ग किलोमीटर जंगल नष्ट हुए, जिससे प्राकृतिक आवास और जैव विविधता प्रभावित हुई।
2001 से 2022 के बीच खनन गतिविधियों से 16,268 वर्ग किलोमीटर जंगल नष्ट हुए, जिससे प्राकृतिक आवास और जैव विविधता प्रभावित हुई।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • जापानी वैज्ञानिकों ने 70 हजार खनन स्थलों का अध्ययन कर बताया कि खनिज उत्खनन से वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय नुकसान बढ़ रहा है।

  • 2001 से 2022 के बीच खनन गतिविधियों से 16,268 वर्ग किलोमीटर जंगल नष्ट हुए, जिससे प्राकृतिक आवास और जैव विविधता प्रभावित हुई।

  • सोना और कोयला खनन जंगलों की कटाई के बड़े कारण बने, जबकि लिथियम जैसे हरित खनिज भी जैव विविधता के लिए खतरा हैं।

  • इलेक्ट्रिक वाहन और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए जरूरी खनिजों की बढ़ती मांग पर्यावरण संरक्षण के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही है।

  • नई रिपोर्ट सरकारों और कंपनियों को टिकाऊ खनन नीतियां बनाने तथा हरित विकास के साथ प्रकृति संरक्षण में मदद करेगी।

दुनिया को जलवायु परिवर्तन से बचाने के लिए हरित या ग्रीन तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और बैटरी स्टोरेज जैसी तकनीकों के लिए कई तरह के खनिजों की जरूरत होती है। लेकिन एक नए अध्ययन में सामने आया है कि इन जरूरी खनिजों के खनन से पर्यावरण और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

जापान के तोहोकू विश्वविद्यालय और नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरमेंटल स्टडीज (एनआईईएस) के वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में खनन गतिविधियों का एक विस्तृत अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों ने रिमोट सेंसिंग तकनीक और मशीन लर्निंग की मदद से करीब 70 हजार खनन स्थलों का वैश्विक नक्शा तैयार किया। इसमें 20 अलग-अलग प्रकार के खनिजों के खनन को शामिल किया गया।

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22 वर्षों में हजारों वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म

अध्ययन के अनुसार, साल 2001 से 2022 के बीच खनन गतिविधियों के कारण दुनिया में लगभग 16,268 वर्ग किलोमीटर जंगल नष्ट हुए। यह क्षेत्रफल चीन की राजधानी बीजिंग के आकार के लगभग बराबर है।

सबसे अधिक जंगलों का नुकसान दुनिया के प्रमुख वर्षावन क्षेत्रों में हुआ। इनमें दक्षिण अमेरिका का अमेजन क्षेत्र, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका का कांगो बेसिन शामिल हैं। ये क्षेत्र पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक इलाकों में गिने जाते हैं, जहां हजारों प्रकार के पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं।

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सोना और कोयला से जंगलों को सबसे ज्यादा नुकसान

नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया कि सोना और कोयला जैसे पारंपरिक खनिज जंगलों की कटाई के बड़े कारण हैं। इन खनिजों के लिए बड़े स्तर पर जमीन की खुदाई की जाती है, जिससे वन क्षेत्र प्रभावित होते हैं और कई जीवों का प्राकृतिक आवास खत्म हो जाता है।

हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि केवल जंगलों के नुकसान से ही पर्यावरणीय खतरे का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। कुछ खनिज ऐसे हैं जिनसे जंगल कम नष्ट होते हैं, लेकिन वे जैव विविधता के लिए बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं।

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ग्रीन ऊर्जा के खनिज भी पैदा कर रहे चिंता

लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे खनिज आज की हरित तकनीकों के लिए बेहद जरूरी हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में किया जाता है। लेकिन इनके खनन से भी पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, लिथियम का खनन कई बार ऐसे इलाकों में होता है जहां नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद होते हैं। उदाहरण के लिए, नमक वाले मैदानों और आर्द्र क्षेत्रों में लिथियम निकालने की प्रक्रिया वहां मौजूद जल व्यवस्था और जीव-जंतुओं को प्रभावित कर सकती है। इसका मतलब यह है कि किसी क्षेत्र में पेड़ कम कटने के बावजूद वहां की जैव विविधता को बड़ा नुकसान हो सकता है।

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हरित भविष्य के लिए संतुलन जरूरी

अध्ययन में अध्ययनकर्ता के हवाले से कहा गया है कि नई तकनीकों की मदद से अब दुनिया भर में खनन के प्रभावों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। उन्होंने बताया कि हरित तकनीकों की बढ़ती मांग के कारण नए खनिजों की जरूरत बढ़ रही है, लेकिन उनके पर्यावरणीय प्रभावों को समझना भी जरूरी है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया को कार्बन उत्सर्जन कम करने के साथ-साथ प्रकृति की रक्षा पर भी ध्यान देना होगा। इलेक्ट्रिक वाहन और नवीकरणीय ऊर्जा जरूरी हैं, लेकिन इनके लिए इस्तेमाल होने वाले खनिजों का जिम्मेदारी से उत्पादन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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नीति बनाने में मदद करेगा नया अध्ययन

शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया यह वैश्विक डेटाबेस सरकारों और कंपनियों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। इसकी मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन से खनिज और कौन से क्षेत्र पर्यावरण के लिए ज्यादा जोखिम वाले हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनमें खनिजों की जरूरत और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सके। यह अध्ययन दिखाता है कि एक स्वच्छ और हरित भविष्य बनाने के लिए केवल नई तकनीक अपनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन संसाधनों की पूरी यात्रा को समझना भी जरूरी है जिनसे ये तकनीकें बनती हैं।

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