भारत की 30 प्रतिशत भूमि मरुस्थल में तब्दील, 56 लाख हेक्टेयर से अधिक घास के मैदान हुए गायब

विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस: चारागाह संरक्षण, भूमि क्षरण, जल संकट, जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा, भारत की 30 फीसदी प्रभावित भूमि और पुनर्स्थापन प्रयास
भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण से विश्व की आधे चारागाह खतरे में, खाद्य सुरक्षा और जल संसाधनों पर गंभीर संकट बढ़ता जा रहा है।
भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण से विश्व की आधे चारागाह खतरे में, खाद्य सुरक्षा और जल संसाधनों पर गंभीर संकट बढ़ता जा रहा है।फोटो साभार: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण से विश्व की आधे चारागाह खतरे में, खाद्य सुरक्षा और जल संसाधनों पर गंभीर संकट बढ़ता जा रहा है।

  • चारागाह दुनिया के दो अरब लोगों की आजीविका से जुड़े हैं, पशुपालन और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

  • भारत में लगभग 30 प्रतिशत भूमि मरुस्थलीकरण से प्रभावित है, जिससे कृषि उत्पादन, जल उपलब्धता और ग्रामीण जीवन प्रभावित हो रहा है।

  • वैश्विक स्तर पर सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं, जलवायु परिवर्तन के कारण भूमि की उत्पादकता और जैव विविधता तेजी से घट रही है।

  • भारत की राष्ट्रीय योजना 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर भूमि पुनर्स्थापित करने और कार्बन सिंक बढ़ाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय।

हर साल 17 जून को “विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकने का दिवस” मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों, सरकारों और संस्थाओं में भूमि संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण और सूखे जैसी समस्याएं आज पूरी दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। इनसे न केवल पर्यावरण प्रभावित होता है, बल्कि मानव जीवन, कृषि उत्पादन और जल उपलब्धता पर भी गहरा असर पड़ता है। यह दिवस सभी को टिकाऊ भूमि उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में प्रेरित करता है।

चारागाह का महत्व

चारागाह वे विशाल प्राकृतिक क्षेत्र होते हैं जहां घास, झाड़ियां और प्राकृतिक वनस्पति पाई जाती है। ये क्षेत्र पृथ्वी के कुल भूमि क्षेत्र का आधे से भी अधिक भाग कवर करते हैं। इनका महत्व केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं। दुनिया भर में लगभग दो अरब लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चारागाह पर निर्भर हैं। इनमें चरवाहे और आदिवासी समुदाय शामिल हैं, जो पीढ़ियों से इन क्षेत्रों की देखभाल और संरक्षण करते आए हैं।

चारागाह पशुपालन के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग 70 प्रतिशत पशु चारा इन्हीं क्षेत्रों से हासिल होता है। इसलिए ये क्षेत्र खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक माने जाते हैं। इसके साथ ही ये जल चक्र को संतुलित रखने, जैव विविधता को संरक्षित करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

साल 2026 की थीम और संदेश

इस साल 2026 के लिए थीम “चारागाह: पहचानो, सम्मान करो, पुनर्स्थापित करो” है। इस थीम का उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि चारागाह केवल खाली जमीन नहीं हैं, बल्कि ये जीवन और प्रकृति का आधार हैं। इनका संरक्षण करना और इनके पारंपरिक संरक्षकों के ज्ञान का सम्मान करना बहुत जरूरी है। साथ ही, जो क्षेत्र खराब हो चुके हैं उन्हें फिर से हरा-भरा बनाने की आवश्यकता है।

यह संदेश इस बात पर जोर देता है कि यदि हम समय रहते कदम नहीं उठाते हैं, तो आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा, जल संकट और जलवायु असंतुलन और अधिक गंभीर हो सकते हैं। इसलिए टिकाऊ भूमि प्रबंधन और सामुदायिक भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है।

भूमि क्षरण की बढ़ती समस्या

आज दुनिया के कई इलाकों में भूमि क्षरण तेजी से बढ़ रहा है। अनुमान के अनुसार, लगभग आधे चारागाह या तो पहले से खराब हो चुके हैं या खतरे में हैं। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, पशुपालन, जैव विविधता और ग्रामीण जीवन पर पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में सूखा और मरुस्थलीकरण के कारण लोगों को पलायन भी करना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। इसलिए जल और भूमि संरक्षण की नीतियों को मजबूत करना आवश्यक हो गया है।

भारत में स्थिति और चुनौतियां

भारत में भी मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एक बड़ी समस्या बन चुके हैं। देश के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से में भूमि क्षरण या मरुस्थलीकरण देखा जा रहा है। यह स्थिति लाखों लोगों की आजीविका, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों को प्रभावित कर रही है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत ने अपने घास के मैदानों का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा खो दिया है। यह लगभग 56.5 लाख हेक्टेयर के बराबर है। इसके अलावा देश में 10.5 करोड़ हेक्टेयर से अधिक भूमि क्षतिग्रस्त अवस्था में है, जो भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 32 प्रतिशत है। यह समस्या कुछ ही राज्यों में अधिक केंद्रित है, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन भी बढ़ रहा है।

राष्ट्रीय प्रयास और आगे की दिशा

भारत सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की है, जो 2022 से 2030 तक लागू की जा रही है। इसका उद्देश्य 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर खराब भूमि को पुनर्स्थापित करना है। इसके साथ ही वनीकरण और पेड़ लगाने की गतिविधियों को बढ़ाकर कार्बन अवशोषण क्षमता भी बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

सरकार का यह भी प्रयास है कि अन्य देशों के साथ अनुभव साझा कर टिकाऊ भूमि प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण होगा बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।

मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण आज केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चुनौती भी बन चुके हैं। चारागाह का संरक्षण और पुनर्स्थापन भविष्य की पीढ़ियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि हम अभी सही कदम उठाते हैं, तो हम एक संतुलित, हरित और सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in