इंसान नहीं, कुत्तों के टीकाकरण से रुकेंगी रेबीज से होने वाली मौतें: केरल में किए अध्ययन ने दिखाई राह

रिसर्च में सामने आया है कि यदि केरल में 70 फीसदी कुत्तों का टीकाकरण हो तो तीन साल में इंसानों में रेबीज से होने वाली मौतें पूरी तरह रोकी जा सकती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी रुझानों के मुताबिक यह बीमारी हर साल एशिया में करीब 35,172 लोगों की जाने ले रही है। इनमें अकेले भारत में करीब 59.9 फीसदी मौतें होती हैं। यानी दुनिया में रेबीज से होने वाली कुल मौतों में से करीब 35 फीसदी भारत में हो रही हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी रुझानों के मुताबिक यह बीमारी हर साल एशिया में करीब 35,172 लोगों की जाने ले रही है। इनमें अकेले भारत में करीब 59.9 फीसदी मौतें होती हैं। यानी दुनिया में रेबीज से होने वाली कुल मौतों में से करीब 35 फीसदी भारत में हो रही हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • रेबीज से इंसानों की जान बचाने की सबसे कारगर रणनीति शायद इंसानों को ज्यादा टीके लगाने में नहीं, बल्कि बीमारी के स्रोत को रोकने में छिपी है।

  • केरल में हुए एक नए अध्ययन ने दिखाया है कि अगर राज्य के करीब 70 फीसदी कुत्तों का टीकाकरण सुनिश्चित कर दिया जाए, तो तीन साल के भीतर इंसानों में रेबीज से होने वाली मौतों को लगभग शून्य तक लाया जा सकता है।

  • यह निष्कर्ष ऐसे समय में सामने आया है, जब केरल में हर साल करीब 10 लाख लोगों को कुत्ते या अन्य जानवरों के काटने के बाद बचाव के लिए पीईपी दी जाती है, फिर भी 2025 में रेबीज से 33 लोगों की मौत हुई।

  • अध्ययन के मुताबिक, सभी बच्चों को पहले से रेबीज का टीका देने की तुलना में कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण ज्यादा प्रभावी और किफायती है।

  • मॉडल के अनुसार, बच्चों को नियमित प्री-एक्सपोजर टीका देने पर 10 वर्षों में करीब एक करोड़ डॉलर खर्च होंगे, जबकि इससे 10 से भी कम अतिरिक्त मौतें रोकी जा सकेंगी। इसके विपरीत, कुत्तों का पर्याप्त टीकाकरण वायरस को इंसानों तक पहुंचने से पहले ही रोक सकता है।

  • यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया में हर साल करीब 59 हजार लोग रेबीज से मरते हैं और इनमें भारत की हिस्सेदारी बेहद बड़ी है।

  • ‘जीरो बाय 30’ के लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए कुत्तों का टीकाकरण, समय पर पीईपी और कमजोर समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच—इन तीनों को साथ लेकर चलना जरूरी होगा।

मासूम बच्चों की जान बचाने के लिए क्या केवल इंसानों का टीकाकरण काफी है? या फिर उस समस्या की जड़ पर वार करने की जरूरत है, जहां से यह खतरा पैदा होता है? केरल में सामने आते रेबीज के मामलों के बीच प्रतिष्ठित जर्नल 'लैंसेट रीजनल हेल्थ' में प्रकाशित एक नई रिसर्च ने एक बहुत ही मानवीय और व्यावहारिक रास्ता दिखाया है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो और केरल के स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा किए गए इस अध्ययन के मुताबिक, इंसानों या बच्चों को पहले से टीका देने के बजाय कुत्तों का शत-प्रतिशत टीकाकरण करना ही रेबीज को हमेशा के लिए खत्म करने का सबसे प्रभावी और किफायती तरीका है।

इसमें केरल के चिकित्सा शिक्षा निदेशालय, केरल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, स्वास्थ्य एवं पशुपालन विभाग और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस के शोधकर्ता भी शामिल थे।

हर साल करीब 10 लाख लोगों को मिल रहा है इलाज

केरल में पशुओं के काटने के बाद बचाव के लिए पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) करीब 10 लाख लोगों को हर साल मुफ्त दी जाती है। राज्य में इस टीके का कोर्स पूरा करने की दर भी देश के सबसे बेहतर राज्यों में है। इसके बावजूद 2025 के दौरान केरल में रेबीज से 33 लोगों की मृत्यु हुई थी, जिनमें बच्चे भी शामिल थे।

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रेबीज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जब इसके लक्षण सामने आने लगते हैं, तब यह बीमारी गंभीर रूप लेने लगती है। लेकिन समय रहते टीका लगने पर इससे पूरी तरह बचा जा सकता है।

दुनिया में हर साल रेबीज करीब 59,000 जिंदगियों को निगल रही है, जिसमें भारत की सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी रुझानों के मुताबिक यह बीमारी हर साल एशिया में करीब 35,172 लोगों की जाने ले रही है। इनमें अकेले भारत में करीब 59.9 फीसदी मौतें होती हैं। यानी दुनिया में रेबीज से होने वाली कुल मौतों में से करीब 35 फीसदी भारत में हो रही हैं।

2030 तक कुत्तों से फैलने वाली रेबीज से इंसानों की एक भी मौत न हो, इसी लक्ष्य के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘जीरो बाय 30’ अभियान शुरू किया है।

बच्चों को पहले से टीका लगाने पर खर्च ज्यादा, फायदा बहुत कम

केरल में लगातार हो रही मौतों के बीच यह सवाल उठता रहा है कि क्या बच्चों को कुत्ते के काटने से पहले ही रेबीज का टीका यानी प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस दे दिया जाए।

लेकिन स्टडी के मॉडल के मुताबिक, अगर सभी बच्चों को नियमित रूप से यह टीका दिया जाए तो अगले 10 वर्षों में करीब एक करोड़ डॉलर का अतिरिक्त खर्च आएगा, जबकि इससे 10 से भी कम अतिरिक्त मौतें रोकी जा सकेंगी। इसके मुकाबले कुत्तों का टीकाकरण बढ़ाने से कहीं बड़ा असर देखने को मिला।

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70 फीसदी कुत्तों का टीकाकरण, तीन साल में मौतें लगभग शून्य

शोधकर्ताओं के गणितीय मॉडल के अनुसार, अगर राज्य में 70 फीसदी कुत्तों का टीकाकरण हो जाए तो करीब तीन साल के भीतर इंसानों में रेबीज से हर साल होने वाली मौतें लगभग शून्य तक लाई जा सकती हैं। यानी किसी बच्चे के काटे जाने के बाद उसे बचाने की कोशिश करने से भी ज्यादा प्रभावी रणनीति यह है कि वायरस को इंसान तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया जाए।

यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने कुत्तों के बड़े पैमाने पर और लगातार टीकाकरण को रेबीज खत्म करने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बताया है।

सरकारी अनुमान से पांच गुणा ज्यादा हो सकती है कुत्तों की संख्या

स्टडी में एक और महत्वपूर्ण बात यह सामने आई है केरल में आवारा कुत्तों की संख्या सरकारी आंकड़ों में दर्ज अनुमान से करीब पांच गुणा अधिक हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने रेबीज निगरानी से जुड़े आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया है कि राज्य में कुत्तों की कुल संख्या करीब 23 लाख हो सकती है। वहीं अगर कुत्तों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है, तो मौजूदा टीकाकरण अभियान वास्तव में कुल आबादी के छोटे हिस्से तक ही पहुंच पा रहे होंगे।

इसका सीधा असर यह पड़ सकता है कि टीकाकरण का कवरेज कागज पर जितना दिखाई देता है, जमीन पर उसका प्रभाव उतना मजबूत न हो।

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सही इलाज के साथ बेहतर रणनीति से बच सकते हैं करोड़ों रुपए

स्टडी में यह भी पाया गया कि डब्ल्यूएचओ की सिफारिश के मुताबिक एक सप्ताह वाले पीईपी रेजिमेन को अपनाने से केरल अगले 10 वर्षों में करीब 63 लाख डॉलर बचा सकता है। खास बात यह है कि शोधकर्ताओं के अनुसार इससे मौत का जोखिम नहीं बढ़ेगा।

इस तरह एक तरफ कुत्तों का टीकाकरण बढ़ाना और दूसरी तरफ काटे जाने के बाद लोगों को समय पर और समान रूप से पीईपी उपलब्ध कराना, दोनों मिलकर ज्यादा प्रभावी रणनीति बन सकते हैं।

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता मार्था लुका का कहना है, “रेबीज से होने वाली मौतें पूरी तरह रोकी जा सकती हैं। उनके मुताबिक केरल ने इंसानों में रेबीज की रोकथाम पर पहले ही बड़ा निवेश किया है, लेकिन इसके बावजूद हर साल ऐसी मौतें हो रही हैं जिन्हें रोका जा सकता था।“

उन्होंने जानकारी दी कि, जहां पीईपी की पहुंच पहले से अच्छी है, वहां बच्चों को नियमित तौर पर पहले से टीका लगाने की तुलना में कुत्तों के टीकाकरण में लगातार निवेश करना मौतों को रोकने का बेहतर रास्ता है।

ग्लासगो विश्वविद्यालय की प्रोफेसर कैटी हैम्पसन के मुताबिक केरल में आवारा कुत्तों की वास्तविक संख्या कम आंकी गई है। ऐसे में जरूरी टीकाकरण कवरेज हासिल करना और मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कुत्तों की संख्या का बेहतर आकलन करने और आवारा कुत्तों तक टीकाकरण पहुंचाने के प्रभावी तरीके विकसित करने को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई।

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उन्होंने कहा कि “कुत्तों का टीकाकरण केवल कुत्तों की रक्षा नहीं करता, बल्कि पूरे समुदाय को सुरक्षित करता है, क्योंकि इससे संक्रमण के इंसानों तक पहुंचने से पहले ही उसकी कड़ी टूट जाती है।“

दूरदराज के लिए भी जरूरी है समाधान

शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि इसका मतलब यह नहीं है कि प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस की जरूरत कभी नहीं होगी। कुछ बेहद जोखिम वाले समूहों, खासकर दूरदराज और आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह अब भी उपयोगी हो सकता है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच मुश्किल है।

केरल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज की प्रोफेसर जिनिया का कहना है कि जिन समुदायों के लिए काटे जाने के बाद समय पर अस्पताल पहुंचना मुश्किल है, उनके लिए प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस भी आसानी से उपलब्ध हो, यह जरूरी नहीं। ऐसे में बीमारी को उसके स्रोत पर रोकना, यानी कुत्तों का टीकाकरण ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है।

उनके अनुसार, यह केवल इंसानों को बीमारी से बचाने की बात नहीं है, बल्कि इंसान, पशु और पर्यावरण सभी के स्वास्थ्य को एक साथ देखने वाले ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण की जरूरत है।

संदेश सिर्फ केरल के लिए नहीं

शोधकर्ताओं ने 2026 से 2035 तक केरल में रेबीज के रोकथाम की अलग-अलग रणनीतियों का अध्ययन किया है। इसमें बच्चों को नियमित प्री-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस देने, पीईपी के अलग-अलग तरीकों और कुत्तों के विभिन्न टीकाकरण स्तरों की तुलना की गई है।

नतीजा साफ है, जब कुत्तों का पर्याप्त टीकाकरण होता है तो वायरस के इंसानों तक पहुंचने का रास्ता बंद होने लगता है।

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वैज्ञानिकों के मुताबिक रेबीज के खिलाफ लड़ाई में हर काटे गए व्यक्ति को बचाना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि ऐसी स्थिति ही कम से कम पैदा हो। यही इस शोध का सबसे मानवीय संदेश है, हर बच्चे को कुत्ते के काटने के बाद डर और इलाज की दौड़ में डालने के बजाय, बीमारी को उसके स्रोत पर ही रोक दिया जाए।

यह रणनीति केरल से आगे उन तमाम देशों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां रेबीज का खतरा बना हुआ है और इलाज तक पहुंच सीमित है। ऐसे में लगातार बड़े पैमाने पर कुत्तों का टीकाकरण कम लागत में पूरी आबादी को सुरक्षा देने का अहम रास्ता बन सकता है।

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