

दुनिया एक बार फिर उस खतरे के करीब खड़ी है, जिसकी याद हमें कोविड-19 ने दिलाई थी, लेकिन इस बार चेतावनी कहीं ज्यादा स्पष्ट है।
एक नए वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, वन्यजीव व्यापार में शामिल 41 फीसदी जंगली स्तनधारी जीव ऐसे रोगजनक लिए चलते हैं जो इंसानों को संक्रमित कर सकते हैं, जबकि व्यापार न की जाने वाली प्रजातियों में यह आंकड़ा महज 6.4 फीसदी दर्ज किया गया। यह अंतर बताता है कि जंगल से बाजार तक की यह यात्रा खुद एक “बीमारी की सीढ़ी” बनती जा रही है।
शोध यह भी दिखाता है कि जितना लंबा कोई जानवर इस व्यापार का हिस्सा रहता है, महामारी का जोखिम उतना ही बढ़ता जाता है।
इसके साथ ही हर गुजरते दशक के साथ नए रोगजनकों के इंसानों तक पहुंचने की आशंका और मजबूत होती जाती है। विशेष रूप से लाइव-एनिमल मार्केट्स इस खतरे के सबसे संवेदनशील केंद्र बन चुके हैं, जहां तनाव, भीड़ और मिश्रित प्रजातियों का संपर्क संक्रमण को तेज कर देता है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है—अगर वन्यजीव व्यापार पर सख्त नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो अगली महामारी किसी प्रयोगशाला से नहीं, बल्कि जंगल से निकलकर सीधे बाजार की भीड़ में जन्म ले सकती है।
दुनिया एक बार फिर उस खतरे के मुहाने पर खड़ी है, जिसकी आहट हमें कोविड-19 के दौरान मिल चुकी है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार खतरा किसी लैब से नहीं, बल्कि जंगलों से बाजार तक फैले वन्यजीव व्यापार से पैदा हो रहा है। मतलब कि दुनिया भर में वन्यजीवों का फलता-फूलता व्यापार अब केवल जैव विविधता के लिए ही नहीं, इंसानों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
इस बारे में एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चेताया है कि यह कारोबार दबे पांव अगली महामारी की नींव रख रहा है। अध्ययन में खुलासा हुआ है कि वन्यजीव व्यापार में शामिल करीब आधे जंगली स्तनधारी ऐसे रोगजनक (पैथोजन्स) अपने साथ लिए घूमते हैं, जो इंसानों में खतरनाक बीमारियां फैला सकते हैं।
प्रतिष्ठित जर्नल साइंस में प्रकाशित इस शोध के मुताबिक, वन्यजीव व्यापार में शामिल स्तनधारियों की 2079 प्रजातियों में से 41 फीसदी प्रजातियां कम से कम एक रोगजनक इंसानों के साथ साझा करती हैं, जबकि जिन प्रजातियों का व्यापार नहीं होता, उनमें यह आंकड़ा सिर्फ 6.4 फीसदी है।
कैसे जंगली जीवों का व्यापार बना महामारी का जरिया
मतलब कि जिन जंगली जानवरों की खरीद-फरोख्त होती है, उनमें ऐसे रोगाणु ज्यादा पाए गए, जो इंसानों को बीमार कर सकते हैं। रिसर्च दर्शाती है कि जिन स्तनधारियों का व्यापार होता है, उनके जरिए इंसानों तक बीमारी पहुंचने की आशंका करीब डेढ़ गुना अधिक होती है। इसी तरह जो जानवर इंसानों के आसपास रहते हैं या भोजन के रूप में उपयोग होते हैं, उनमें भी यह जोखिम ज्यादा होता है, लेकिन इसमें व्यापार की भूमिका और भी बड़ी है।
आपको जानकार हैरानी होगी कि दुनिया में उभर रही 60 फीसदी से अधिक संक्रामक बीमारियां जूनोटिक होती हैं, यानी वे जानवरों से इंसानों में फैलती हैं।
हाल के बड़े वैश्विक प्रकोप जैसे एचआईवी, इबोला, सार्स, मर्स और कोविड-19 इसी तरह की बीमारियां हैं। देखा जाए तो वन्य जीवों का व्यापार, जंगलों का होता विनाश, पशुपालन इंसानों और जंगली जीवों के बीच की दूरी कम कर देते हैं। इससे जानवरों से इंसानों में बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
अध्ययन में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि जितने लंबे समय तक कोई प्रजाति वन्यजीव व्यापार का हिस्सा रहती है, उतना ही अधिक इंसानों में उनसे रोगों के फैलने का खतरा बढ़ता जाता है।
लाइव एनिमल मार्केट: बीमारियों के सबसे बड़े हॉटस्पॉट
निष्कर्ष दर्शाते हैं कि वन्यजीव व्यापार में बिताए हर 10 साल के दौरान कोई प्रजाति औसतन इंसानों के साथ एक नया रोगजनक साझा करती है। यानी समय के साथ यह व्यापार वायरस, बैक्टीरिया और अन्य संक्रमणों के इंसानों तक पहुंचने के लिए एक खतरनाक पुल बनता जा रहा है।
जिंदा बाजारों में बेची जाने वाली प्रजातियां इंसानों के लिए कहीं अधिक जोखिम पैदा करती हैं। ये प्रजातियां उन जानवरों की तुलना में औसतन डेढ़ गुणा ज्यादा रोगजनक साझा करती हैं जिन्हें केवल मांस, फर या अन्य उत्पादों के लिए खरीदा-बेचा जाता है। यह भी सामने आया है कि वन्यजीवों के अवैध व्यापार का खतरा और भी ज्यादा गहरा है, इससे जुड़ी प्रजातियां कानूनी व्यापार में शामिल प्रजातियों की तुलना में 1.4 गुणा अधिक बीमारी फैलाने की क्षमता रखती हैं।
हालांकि जीवों का केवल अवैध व्यापार ही नहीं, कानूनी व्यापार भी जोखिम भरा है। शोधकर्ताओं ने पुष्टि की है कि रोगों के फैलने का खतरा केवल अवैध व्यापार तक सीमित नहीं है।
गौरतलब है कि इन लाइव-एनिमल मार्केट में अलग-अलग क्षेत्रों और प्रजातियों के जानवरों को तंग, गंदे और तनावपूर्ण परिस्थितियों में एक साथ रखा जाता है। ऐसे माहौल में रोग एक प्रजाति से दूसरी और फिर इंसानों तक आसानी से पहुंच सकते हैं।
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने वैश्विक वन्यजीव व्यापार के चार दशकों के रिकॉर्ड और रोगजनकों से जुड़े डेटाबेस का विश्लेषण किया है। अध्ययन में वन्य जीवों के व्यापार में शामिल 2,079 स्तनधारी प्रजातियों की जांच की गई। साथ ही 1.9 लाख से अधिक स्तनधारी-पैथोजन संबंधों का आकलन किया गया है।
अनुमान है कि दुनिया भर में वन्यजीवों के कानूनी व्यापार से हर साल करीब 22,000 करोड़ डॉलर की कमाई होती है। वहीं अवैध व्यापार भी बेहद मुनाफे का कारोबार है, जिसकी कीमत हर साल करीब 2,300 करोड़ डॉलर तक आंकी गई है।
इस व्यापार में जंगली जानवरों व उनके उत्पादों की तस्करी ड्रग्स और हथियारों की तरह होती है। हाथी और बाघ जैसे जानवरों के शिकार ने भले ही दुनिया का ध्यान खींचा हो, लेकिन इसके अलावा भी कई ऐसी प्रजातियां हैं जिन्हें मांस के लिए या पालतू जानवर के रूप में बेचा जाता है और इनमें से कई इंसानों में खतरनाक बीमारियां फैलाने का बड़ा जोखिम रखती हैं।
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉक्टर कॉलिन कार्लसन का कहना है, “वन्यजीव व्यापार हमारे स्वास्थ्य को हमारी सोच से कहीं अधिक तेजी और लंबे समय से प्रभावित कर रहा है। अब हमारे पास साफ वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि यह हमेशा मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम भरा है।” उन्होंने आगाह किया है कि “कोविड-19 जैसी महामारी पैदा करने वाली परिस्थितियां आज भी दुनिया भर के कई वन्यजीव बाजारों में मौजूद हैं।”
कई बड़ी महामारियों का रहा है वन्यजीव व्यापार से संबंध
वैज्ञानिकों ने याद दिलाया है कि एचआईवी, इबोला और कोविड-19 जैसी कई खतरनाक महामारियों के तार वन्यजीवों से जुड़े हैं। ऐसे में अगर वन्यजीवों के तेजी से फैलते व्यापार पर रोक न लगाई गई तो आने वाले समय में दुनिया को और भी गंभीर व घातक महामारियां झेलनी पड़ सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि बीमारी का असली खतरा व्यापार की शुरुआत से ही पैदा हो जाता है, जब जानवरों का शिकार होता है, उन्हें पकड़ा जाता है, उनकी खाल उतारी जाती है, परिवहन किया जाता है और बाजारों तक पहुंचाया जाता है। ऐसे में यदि भविष्य की महामारियों को रोकना है तो वन्यजीव व्यापार की मात्रा सीमित करनी होगी और जीवित जानवरों की खरीद-फरोख्त तथा अवैध तस्करी पर सख्त नियंत्रण जरूरी है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल वन्यजीव व्यापार पर रोक लगा देना ही काफी नहीं होगा, क्योंकि पालतू और घरेलू जानवरों का वैश्विक कारोबार भी बीमारियों के प्रसार का बड़ा कारण है। फिर भी शोधकर्ताओं का मानना है कि वन्यजीव बाजारों में बेहतर साफ-सफाई, कड़ी निगरानी और समझदारीपूर्ण नियम लागू कर भविष्य की महामारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
2030 तक एक और महामारी को जन्म दे सकती हैं जूनोटिक बीमारियां
संयुक्त राष्ट्र ने भी अपनी एक रिपोर्ट में चेताया है कि नई उभरती जूनोटिक बीमारियां 2030 तक एक और महामारी को जन्म दे सकती हैं। रिपोर्ट में हालिया अध्ययनों का हवाला देते हुए लिखा है कि जूनोटिक स्पिलओवर की घटनाएं सालाना पांच से आठ फीसदी बढ़ रही हैं। अनुमान है कि 2020 की तुलना में 2050 तक सबसे आम रोगजनकों के कारण मनुष्यों में 12 गुणा अधिक मौतें होंगी।
पिछले 100 वर्षों से जुड़े आंकड़ों को देखें तो औसतन हर साल दो वायरस अपने प्राकृतिक वातावरण से निकलकर इंसानों में फैल रहे हैं, लेकिन प्रकृति के विनाश की बढ़ती दर इनके फैलने के खतरे को और बढ़ा रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) में कार्यक्रम निदेशक अमित खुराना के मुताबिक जूनोटिक बीमारियों का खतरा जलवायु परिवर्तन के कारण और अधिक बढ़ गया है। मनुष्यों में 60 फीसदी से अधिक संक्रामक रोग जूनोटिक हैं।
उनके मुताबिक जूनोटिक बीमारियों की वजह से 260 करोड़ लोग प्रभावित हो रहें हैं। इतना ही नहीं यह हर साल 30 लाख से ज्यादा लोगों की जान ले रही हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि कुछ जूनोटिक बीमारियां 2050 तक 12 गुणा ज्यादा लोगों की जान ले सकती हैं।
यह अध्ययन एक स्पष्ट चेतावनी है, इंसानी लालच और प्रकृति से बिगड़ता रिश्ता नई बीमारियों के द्वार खोल रहा है। ऐसे में अगर जंगली जीवों का व्यापार इसी तरह बदस्तूर जारी रहा, तो अगली महामारी किसी लैब से नहीं, बल्कि बाजार में बिकते किसी जंगली जानवर से आ सकती है।