

वैज्ञानिकों ने आक्रामक कोलोरेक्टल कैंसर के फैलाव से जुड़ी नई आणविक प्रक्रिया खोजी, जिससे बीमारी को समझने में मदद मिलेगी।
सोरएलए, एचईआर2 और एचईआर3 प्रोटीन की भूमिका सामने आई, जो कैंसर कोशिकाओं के आसपास के ऊतकों से जुड़ने में मदद करते हैं।
ट्यूमर स्फीयर की उलटी संरचना कैंसर कोशिकाओं को सुरक्षा देती है, जिससे उनका फैलाव और उपचार से बचाव आसान हो सकता है।
एचईआर2 और एचईआर3 को निशाना बनाने वाली एंटीबॉडी ने प्रयोगशाला में कैंसर कोशिकाओं की मृत्यु बढ़ाई और पेरिटोनियम से जुड़ाव घटाया।
नई खोज से भविष्य में पेरिटोनियल मेटास्टेसिस के जोखिम वाले मरीजों की पहचान और आक्रामक कैंसर के नए उपचार में मदद मिल सकती है।
फिनलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू और फ्रांस के गुस्ताव रूसी संस्थान के शोधकर्ताओं ने कोलोरेक्टल कैंसर के एक आक्रामक रूप के फैलने से जुड़ी एक अहम आणविक प्रक्रिया का पता लगाया है। यह अध्ययन खास तौर पर म्यूकिनस कोलोरेक्टल एडेनोकार्सिनोमा पर किया गया है। यह बीमारी कोलोरेक्टल कैंसर के करीब 10 से 15 प्रतिशत मामलों में पाई जाती है। यह बीमारी कम उम्र के लोगों और महिलाओं में अन्य प्रकारों की तुलना में अधिक देखी जाती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस कैंसर की एक खास बात यह है कि इसकी कोशिकाएं पेट के अंदर छोटे-छोटे समूहों के रूप में फैल सकती हैं। इन समूहों को ट्यूमर स्फीयर कहा जाता है। ये कोशिकाएं पेट की अंदरूनी परत, जिसे पेरिटोनियम कहा जाता है, तक पहुंचकर वहां नए ट्यूमर बना सकती हैं।
ट्यूमर की बदलती बनावट
नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि ट्यूमर स्फीयर अपनी बनावट बदल सकते हैं। इनमें से कुछ स्फीयर उलटी संरचना यानी ‘इनवर्टेड स्ट्रक्चर’ अपना लेते हैं। इसमें म्यूकस या बलगम की एक परत कैंसर कोशिकाओं के बाहर बन जाती है।
यह बाहरी परत कैंसर कोशिकाओं के लिए एक तरह की सुरक्षा का काम कर सकती है। इससे कोशिकाओं को शरीर में आगे बढ़ने, आसपास के ऊतकों में घुसने और कुछ मामलों में कीमोथेरेपी के असर से बचने में मदद मिल सकती है। यही कारण है कि म्यूकिनस कोलोरेक्टल कैंसर का इलाज और इसके फैलाव को रोकना चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
तीन प्रोटीन की अहम भूमिका
शोधकर्ताओं ने इस प्रक्रिया में तीन प्रोटीनों की महत्वपूर्ण भूमिका पहचानी है। इनके नाम सोरएलए, एचईआर2 और एचईआर3 हैं। जब ट्यूमर स्फीयर शरीर के आसपास के ऊतकों में मौजूद कोलेजन के संपर्क में आते हैं, तो इन प्रोटीनों से जुड़ी एक आणविक प्रक्रिया शुरू होती है।
इस प्रक्रिया के बाद कैंसर कोशिकाएं अपनी पहले की उलटी संरचना से बदलकर सामान्य या पारंपरिक संरचना की ओर जाने लगती हैं। साथ ही, उनकी आसपास के ऊतकों से चिपकने की क्षमता बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बदलाव कैंसर कोशिकाओं के पेरिटोनियम में जमने और आगे फैलने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकता है।
मरीजों के नमूनों से भी मिला प्रमाण
शोधकर्ताओं ने केवल प्रयोगशाला में ही इस प्रक्रिया का अध्ययन नहीं किया। उन्होंने मरीजों से लिए गए ट्यूमर नमूनों का भी विश्लेषण किया। इन नमूनों में पाया गया कि सामान्य संरचना वाले ट्यूमर स्फीयर में सोरएलए, एचईआर2 और एचईआर3 का स्तर इनवर्टेड स्फीयर की तुलना में अधिक था।
इससे प्रयोगशाला में मिले निष्कर्षों को मरीजों के वास्तविक ट्यूमर से भी जोड़ने में मदद मिली। हालांकि वैज्ञानिक अभी यह नहीं कह रहे हैं कि इन प्रोटीनों के स्तर के आधार पर तुरंत किसी मरीज के इलाज का फैसला किया जा सकता है।
इलाज की नई संभावना
शोधकर्ताओं ने एचईआर2 और एचईआर3 को निशाना बनाने वाली चिकित्सीय एंटीबॉडी का भी प्रयोग किया। प्रयोगशाला में तैयार किए गए ट्यूमर स्फीयर पर इन दवाओं का इस्तेमाल किया गया। परिणामों में कैंसर कोशिकाओं की मृत्यु बढ़ी, ट्यूमर स्फीयर में उलटी संरचना को बढ़ावा मिला और पेरिटोनियम से चिपकने की उनकी क्षमता कम हुई।
यह परिणाम भविष्य में उपचार की एक नई दिशा की उम्मीद पैदा करता है। अगर आगे के अध्ययनों में भी ऐसे ही परिणाम मिलते हैं, तो एचईआर2 और एचईआर3 को निशाना बनाने वाली रणनीतियां कुछ मरीजों में कैंसर के फैलाव को धीमा करने में उपयोगी हो सकती हैं।
अभी और शोध जरूरी
यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू की शोधकर्ता मेरी पेलकोनेन के अनुसार, ये परिणाम कैंसर के फैलाव को धीमा करने का संभावित रास्ता दिखाते हैं, लेकिन इसके लिए आगे शोध और क्लिनिकल ट्रायल जरूरी हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में ऐसे मरीजों की पहचान करने में मदद कर सकती है, जिनमें पेरिटोनियल मेटास्टेसिस यानी कैंसर के पेट की अंदरूनी परत तक फैलने का खतरा अधिक है। साथ ही, यह आक्रामक कोलोरेक्टल कैंसर के लिए नए उपचार विकसित करने का आधार भी बन सकती है।
फिलहाल यह खोज शुरुआती वैज्ञानिक चरण में है। फिर भी, कैंसर कोशिकाएं किस तरह अपनी संरचना बदलती हैं और शरीर में फैलने के लिए आसपास के वातावरण का इस्तेमाल करती हैं, इसे समझने की दिशा में यह अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।